श्री परम शिवम
(श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी कविता – प्रकृति.)
☆ कविता – प्रकृति ☆ श्री परम शिवम ☆
प्रकृति स्त्रैण है
सहसा नहीं खुलती
प्रतीक्षा करती
थाहती है-
संसार की चोट खाते मर्म में संरक्षित विस्मयों की, विकलता की
अजानी दिशाओं की अलौट को पुकार माने मन
और जानने पर लहलहा उठे पुलक की, विह्वलता की
निश्छल जिज्ञासा की
ग़ैर लोलुप, ग़ैर-गिद्ध, ग़ैर-धंधाई दृष्टि की
देह में घुले काव्य, रस, ताप, वृष्टि की
हम से परखती हम को
तब प्रस्तुत करती स्वयं को
लिखा विधना ने जितना, नहीं उतना
उससे भी प्रचुर
निर्धारित से अधिक
नियति से अधिक
सृष्टा से अधिक
मृत्यु रचने वाला, छोटे मन का एक अधिनायक लगता ईश्वर
प्रकृति सबको जीवनाती-उदारती विराट गणतंत्र है
ये स्त्री, ईश्वर से मुक्त है
उससे स्वतंत्र है
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© श्री परम शिवम्
डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






