श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय  “पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ”

☆ पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ☆  श्री जयपाल ☆

=1=

पृथ्वी

यह पृथ्वी

किसी शेषनाग के सिर पर नहीं

नंदी बैल के सींगों पर भी नहीं

स्त्री के हाथों पर टिकी हुई है

=2=

पृथ्वी और स्त्री

पृथ्वी

जब तक स्त्री के हाथों में रहेगी

सुरक्षित रहेगी

पुरुष के हाथ तो खून से रंगे हैं

=3=

विस्थापित बहनें

बहने विस्थापित कर दी गई

कहा गया उनकी शादी हो गई है

विस्थापन का दर्द दिल में दबाये

उन्होंने बसाए घर-परिवार

गांव-नगर-बस्तियां

ताकि विस्थापित न रहे कोई दुनिया में

 

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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