श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक  ज्ञानवर्धक आलेख आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारितापर चर्चा।

☆ आलेख ☆ आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

भूमिका

देश केवल भूगोल नहीं होता, बल्कि वह अपने नागरिकों की चेतना, सोच और संघर्ष से बनता है। मनुष्य और राष्ट्र एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। किसी भी देश में राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में वहाँ के सामाजिक हालात और साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता, विशेषकर उर्दू पत्रकारिता, ने जनमानस को जागृत करने, राजनीतिक चेतना को विकसित करने तथा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए जनता को मानसिक रूप से तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

1857 की क्रांति के संदर्भ में यदि उस समय की परिस्थितियों का अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि उर्दू समाचार पत्रों ने उच्च और निम्न—दोनों वर्गों के भारतीयों को एक साझा मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की।

1857 का विद्रोह और उर्दू पत्रकारिता

अतीक सिद्दीकी ‘इंडियन न्यूज़पेपर’ की समीक्षा करते हुए ‘नटराज’ के हवाले से लिखते हैं कि उन्नीसवीं सदी का छठा दशक ब्रिटिश भारत के इतिहास में अत्यंत निर्णायक था। 1757 की प्लासी की लड़ाई से आरंभ हुआ अंग्रेज़ी प्रभुत्व 1856 में अवध के विलय के साथ अपने चरम पर पहुँच गया। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 1857 का महासंग्राम फूटा, जिसे अंग्रेज़ों ने “ग़दर” कहा, जबकि भारतीयों के लिए यह स्वतंत्रता का प्रथम संगठित प्रयास था।

1857 की असफलता के पश्चात् अनेक उर्दू समाचार पत्रों की नीति में अस्थायी नरमी आई। कुछ पत्रों ने राजनीति के स्थान पर पश्चिमी कला और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित किया, किंतु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित होने के बाद भी भारतीयों का असंतोष कम नहीं हुआ।

विद्रोह की पृष्ठभूमि और अख़बारों की भूमिका

ब्रिटिश शासन की धोखेबाज़ नीतियों से भारतीय सैनिक और जनता अत्यंत क्षुब्ध थे। विद्रोह की निश्चित तिथि 31 मई तय की गई थी, परंतु मेरठ में घटनाएँ पहले ही भड़क उठीं। मंगल पांडे द्वारा बैरकपुर में अंग्रेज़ अधिकारी पर गोली चलाना विद्रोह का संकेत बन गया। इस घटना से पहले ही उर्दू अख़बार जनता को मानसिक रूप से तैयार कर चुके थे।

लॉर्ड कैनिंग ने स्वयं स्वीकार किया कि देशी अख़बारों ने जनता को विद्रोह के लिए उकसाया। उनके अनुसार,

“देशी समाचार पत्रों ने जानबूझकर ऐसी खबरें प्रकाशित कीं, जिनसे भारतीय जनता विद्रोह के लिए प्रेरित हुई।”

प्रमुख उर्दू समाचार पत्र और पत्रिकाएँ

1857 और उसके बाद अनेक उर्दू पत्र-पत्रिकाएँ पूरी तरह राजनीतिक स्वरूप में सामने आईं। इनमें प्रमुख थे—

  • दिल्ली उर्दू अख़बार (मौलाना मोहम्मद बाकर)
  • सहर सामरी (1856)
  • अवध अख़बार (मुंशी नवल किशोर)
  • तरक़ीब-ए-बगावत
  • शोला-ए-तूर
  • दबदबा-ए-सिकंदरी
  • अख़बार आलमताब, खैरख़्वाह-ए-ख़लक, शम्स-उल-अख़बार आदि

इन सभी का स्वर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अंग्रेज़-विरोधी था। इन पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और स्वतंत्रता के लिए जन-भावना को सशक्त बनाया।

दिल्ली उर्दू अख़बार और मौलाना मोहम्मद बाकर

‘दिल्ली उर्दू अख़बार’ उस समय का सर्वाधिक प्रभावशाली समाचार पत्र था। इसके संपादक मौलाना मोहम्मद बाकर न केवल पत्रकार थे, बल्कि सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। 1857 की असफलता के बाद अंग्रेज़ों ने अख़बार बंद कर दिया और मौलाना मोहम्मद बाकर को गोली मार दी गई।

इमदाद साबरी लिखते हैं कि मौलाना बाकर ने कलम और तलवार—दोनों से अंग्रेज़ों का मुकाबला किया। बहादुर शाह ज़फर ने इस अख़बार का नाम ‘अख़बार-ए-ज़फर’ रखने का प्रस्ताव भी दिया था।

अवध अख़बार की ऐतिहासिक भूमिका

लखनऊ से प्रकाशित अवध अख़बार उस दौर का एक अत्यंत प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्र था। इसमें राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक और आर्थिक विषयों पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे। यह अख़बार कुशासन की आलोचना करता था और देशभक्तों के बलिदान को उजागर करता था।

रतननाथ सरशार, मिर्ज़ा हैरत देहलवी, सैयद अहमद शेहरी जैसे प्रतिष्ठित लेखक इससे जुड़े थे। अवध अख़बार ने राष्ट्रप्रेम की भावना को व्यापक रूप से फैलाया।

विद्रोह के बाद दमन और पत्रकारों का संघर्ष

1857 के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन नीति अपनाई। विशेषकर मुसलमानों को निशाना बनाया गया। ‘शोला-ए-तूर’ जैसे अख़बारों ने इन अत्याचारों का हृदयविदारक विवरण प्रकाशित किया। नवाब जिया उद्दोला की त्रासदी इसका उदाहरण है, जिनकी पूरी संपत्ति जब्त कर ली गई और परिवार को नष्ट कर दिया गया।

बीसवीं सदी और उर्दू पत्रकारिता

बीसवीं सदी के प्रारंभ में राजनीतिक आंदोलन तेज़ हो गए। बंगाल विभाजन, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, होम रूल आंदोलन आदि ने उर्दू पत्रकारिता को नई दिशा दी।

‘वतन’, ‘तर्रक़ी’, ‘ज़माना’, ‘मुख़बीर-ए-आलम’, ‘उर्दू-ए-मौल्ला’, ‘हिंदुस्तानी’, ‘ज़मींदार’ और ‘आज़ाद’ जैसे पत्रों ने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक समर्थन दिया।

हसरत मोहानी की ‘उर्दू-ए-मौल्ला’ ने स्वदेशी आंदोलन का खुला समर्थन किया और कांग्रेस तथा वामपंथी विचारधारा के प्रति सहानुभूति दिखाई।

ज़मींदार और राष्ट्रवादी चेतना

‘ज़मींदार’ पत्रिका मौलाना ज़फर अली खान के संपादन में जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुई। इसने विदेशी शासन का भय दूर किया और निर्भीक राजनीतिक पत्रकारिता की मिसाल कायम की। यह पत्रिका कांग्रेस और संयुक्त राष्ट्रवाद की समर्थक रही।

निष्कर्ष

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उर्दू पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह प्रतिरोध, बलिदान और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उपकरण थी। उर्दू पत्रकारों ने कठोर दमन, फाँसी और संपत्ति की जब्ती के बावजूद अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। उनकी कलम ने भारतीय जनता को संघर्ष के लिए प्रेरित किया और स्वतंत्रता की नींव मजबूत की।

उर्दू पत्रकारिता का यह योगदान भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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