श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – संभावना…
श्री संजय भारद्वाज
एक रोज़
आँखों को ढककर
कोहनियों से,
खुली आँखों से
मैं देखने लगा अंधेरा,
तब जाना-
अंधेरे में भी टिमटिमाते रहते हैं
जुगनू-से कुछ सितारे,
कहीं उठती दिखती है एक लौ,
लौ के आलोक में कालापन,
कभी फ़िरोज़ी, कभी हरा,
कभी नीला-सा हो जाता है,
कभी सूर्योदय की रंगत,
कभी सूर्यास्त की संगत,
बदलते रंगों में
किसी न किसी रोशनदान से
भेदा जाता रहता है अंधेरा,
इतना स्याह नहीं होता समय
कि परिश्रम से मिला
निवाला हड़प पाए,
ध्यान रहे-
अंधेरा कभी इतना घुप्प नहीं होता
कि उजाले की संभावना को
निगल जाए..!
© संजय भारद्वाज
1713 बजे, 3.10.2025
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
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