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श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि – संस्मरण – अनजाने में पढ़ा ‘उबूंटू’ का पाठ ☆

(किशोर अवस्था का एक संस्मरण आज साझा कर रहा हूँ।)

पढ़ाई में अव्वल पर खेल में औसत था। छुटपन में हॉकी खूब खेली। आठवीं से बैडमिंटन का दीवाना हुआ। दीवाना ही नहीं हुआ बल्कि अच्छा खिलाड़ी भी बना। दीपिका पदुकोण के दीवानों (दीपिका के विवाह के बाद अब भूतपूर्व दीवानों) को मालूम हो कि मैं उनके पिता प्रकाश पदुकोण के खेल का कायल था। तब दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण तो था नहीं, अख़बारों में विभिन्न टूर्नामेंटों में उनके प्रदर्शन पर खेल संवाददाता जो लिख देता, वही मानस पटल पर उतर जाता। 1980 में ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैम्पियनशिप जीतने के बाद तो प्रकाश पदुकोण मेरे हीरो हो गए। हवाई अड्डे पर लेने आई  अपनी मंगेतर उज्ज्वला करकरे (अब दीपिका की माँ) के साथ प्रकाश पदुकोण की अख़बार में छपी फोटो आज भी स्मृतियों में है।

अलबत्ता आप खेल कोई भी खेलते हों, एक सर्वसामान्य खेल के रूप में क्रिकेट तो भारत के बच्चों के साथ जुड़ा ही रहता है।

दसवीं की एक घटना याद आती है। स्कूल छूटने के बाद नौवीं के साथ क्रिकेट मैच खेलना तय हुआ। यह एक-एक पारी का टेस्ट मैच होता था। औसतन दो-ढाई घंटे में एक पारी निपट जाती थी। शायद आईसीसी को एकदिवसीय और टी-20 मैचों की परिकल्पना हमारे इन मिनी टेस्ट मैचों से ही सूझी।

शनिवार या संभवतः  महीने का अंतिम दिन रहा होगा। स्कूल जल्दी छूट गया। छोटी बहन उसी स्कूल में सातवीं में पढ़ती थी। मैं उसे साइकिल पर अपने साथ लाता, ले जाता था। शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण अनेक बार मैं छुट्टी के बाद भी लम्बे समय तक स्कूल में रुकता। मेरे कारण उसे भी ठहरना पड़ता। वह शांत स्वभाव की है। उस समय भी बोलती कुछ नहीं थी पर उसकी ऊहापोह मैं अनुभव करता।

आज मैच के कारण देर तक उसके रुकने की स्थिति बन सकती थी। मैं दुविधा में था। ख़ैर, मैच शुरू हुआ। मैं अपनी टीम का कप्तान था। उन दिनों कक्षा के मॉनीटर को खेल में भी कप्तानी देना चलन में था। टॉस हमने जीता। अपनी समझ से बल्लेबाजी चुनी। ओपनिंग जोड़ी मैदान में उतरी। उधर बहन गुमसुम बैठी थी। हमारा घर लगभग 7 किलोमीटर दूर था। सोचा साइकिल भगाते जाता हूँ और बहन को घर छोड़ कर लौटता हूँ। तब तक हमारे बल्लेबाज प्रतिद्वंदियों को छक कर धोएँगे।

बहन को घर छोड़कर लौटा तो दृश्य बदला हुआ था। टीम लगभग ढेर हो चुकी थी। 7 विकेट गिर चुके थे। जैसे-तैसे स्कोर थोड़ा आगे बढ़ा और पूरी टीम मात्र 37 रनों पर धराशायी हो गई।

पाले बदले। अब गेंदबाजी की ज़िम्मेदारी हमारी थी। कक्षा में बेंच पर कुलविंदर साथ बैठता था। अच्छा गेंदबाज था और घनिष्ठ मित्र भी। उससे गेंदबाजी का आरम्भ कराया। दो-तीन ओवर बीत गए। सामने वाली टीम मज़बूती से खेल रही थी।

गेंदबाजी में परिवर्तन कर कुलविंदर की जगह सरबजीत को गेंद थमाई। यद्यपि वह इतना मंझा हुआ गेंदबाज नहीं था पर मैच शुरू होने से पहले मैंने उसे गेंदबाजी का अभ्यास करते देखा था। भीतर से लग रहा था कि इस पिच पर सरबजीत प्रभावी साबित होगा।

सरबजीत प्रभावी नहीं घातक सिद्ध हुआ। एक के बाद एक बल्लेबाज आऊट होते चले गए। दूसरे छोर से कौन गेंदबाजी कर रहा था, याद नहीं। वह विकेट नहीं ले पा रहा था पर रन न देते हुए उसने दबाव बनाए रखा था। हमें छोटे स्कोर का बचाव करना था। वांछित परिणाम मिल रहा था, अतः मैंने दोनों गेंदबाजों के स्पैल में कोई परिवर्तन नहीं किया।

उधर बाउंड्री पर फील्डिंग कर रहे कुलविंदर की नाराज़गी मैं स्पष्ट पढ़ पा रहा था पर ध्यान उसकी ओर न होकर टीम को जिताने पर था। यह ध्यान और साथियों का खेल रंग लाया। प्रतिद्वंदी टीम 33 रनों पर ढेर हो गई। सरबजीत को सर्वाधिक विकेट मिले। कुलविंदर ने दो-चार दिन मुझसे बातचीत नहीं की।

अब याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि टीम को प्रधानता देने का जो भाव अंतर्निहित था, वह इस प्रसंग से सुदृढ़ हुआ। हिंदी आंदोलन परिवार के अधिकारिक अभिवादन ‘उबूंटू’ (हम हैं, सो मैं हूँ) से यह प्रथम प्रत्यक्ष परिचय भी था।

‘उबूंटू!’

©  संजय भारद्वाज

(महाशिवरात्रि 2018, प्रातः 8 बजे)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
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Rita Singh

सुंदर संस्मरण, एक लंबे अंतराल के बाद आपका संस्मरण पढ़कर न केवल आनंद मिला बल्कि आपके भीतर टीमबिल्डिंग की जो कला है वह बी स्पष्ट परिलक्षित होती है।काश आप जैसे विचारशील और दृष्टिकोण रखनेवालों की संख्या अधिक होती तो शायद राजनीति का चेहरा भी परिष्कृत होता। बहुत सुंदर संस्मरण

अलका अग्रवाल

उबूंटू के भाव ‘हम हैं तो मैं हूँ’ के भाव को चरितार्थ करती भावना पर आधारित क्रिकेट के खेल में टीम की जीत को सर्वोपरि स्थान देने का संस्मरण अत्युत्तम है। हार्दिक बधाई संजय जी।

माया कटारा

‘ उबूंटू ‘ का आरंभ , उसके सही क्रियान्वयन को पढ़ते समय , दलीय भावना को अग्रता देनेवाले बैडमिंटन खिलाड़ी का प्रयास स्तुत्य , प्रेरणास्पद …
उबूंटू. …..