सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – २‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २६ ☆
आलेख – परशुराम जी – २ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
हमारे 18 पुराण हैंl इन सभी पुराणों में जीव, जगत, जगदीश और मोक्ष को बहुत ही अच्छी तरह समझाया हैl
सनातन धर्म में सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग और कलियुग का ज्ञान अलौकिक हैl हमारे सनातन धर्म का विज्ञान इतना परिपूर्ण है कि सृष्टि की निर्मिति कैसे हुई? प्रकृति और पुरुष क्या है? इसका विस्तृत वर्णन हमें पढ़ने को मिलता हैl काल गणना भी बहुत ही उत्तम तरीके से दर्शाई गई हैl हमारे सभी पुराण तत्व चिंतन, तत्व ज्ञान, भक्ति सभी दृष्टि से अपूर्व हैl खासियत ये है कि ये सभी संवाद रूप में हैंl
वेदों को अपौरुषेय कहते हैं क्यूंकि इन्हें किसी मानव ने नहीं लिखेl ये ईश्वर के श्वास से प्रकट हुए हैंl
कहते हैं समय के प्रारम्भ में परब्रह्म के दो भाग हुएl l पहला- पुरुष और दूसरी- प्रकृतिl पुरुष ने अपने आप को तीन भागों में विभाजित कियाl पहला ब्रह्म – सृजनकर्ता, दूसरा विष्णु – वहनकर्ता और तीसरा शिव – विलीनकर्ताl इन तत्वों को शक्ति प्रदान करने हेतु प्रकृति ने स्वयं को भी तीन भागों में विभाजित कियाl पहली लक्ष्मी, दूसरी सरस्वती और तीसरी शिवाl
पुरुष अर्थात आत्माl ये नाशरहित, नित्य एवं अजन्मी हैl इसे शस्त्र नहीं काट सकताl आग नहीं जला सकती और पवन भी इसे सुखा नहीं सकतीl इस तरह ये अच्छेद, अदाह्य, अकलेद्य एवं अशोध्य हैl साथ ही नित्य सर्वव्यापी, अचल और स्थिर हैl यह अचिन्त्य हैl विकार रहित हैl
पुरुष चेतन हैl चैतन्य जगाता हैl ऊर्जावान करता हैl यह त्रिगुणातीत हैl यह ज्ञान स्वरूप हैl जगत से परे हैl बंधन से मुक्त हैl वहीं प्रकृति पूरा ब्रम्हाण्ड, पूरी सृष्टि हैl प्रकृति में सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण साम्य अवस्था में थेl पर ईश्वर ने इसमें चेतना डाली और सृष्टि का निर्माण हुआl प्रकृति जड़ हैl नाशवान हैl यह भोग्य हैl यही बंधन का मूल कारण हैl अर्थात प्रकृति या सृष्टि कहें एवं पुरुष ये दोनों ही तत्व बुनियादी हैं, मौलिक हैं, चिरंतन हैं एवं नित्य हैंl दोनों एकदूसरे के अधीन हैं एक दूसरे पर आधारित हैंl
– क्रमशः
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




