(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘कबिरा आप ठगाइए…। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६८ ☆
☆ लघुकथा – कबिरा आप ठगाइए…☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
गरीब किसानों की आत्महत्या की खबर उसे द्रवित कर देती थी| अपनी माँगों के लिए किसानों के देशव्यापी आंदोलन में भी कई किसान मारे गए। नेताओं के कोरे वादे किसानों को आश्वस्त नहीं कर पाए। आत्महत्या का सिलसिला नहीं थमा। वह कई बार सोचता कि क्या कर सकता हूँ इनके लिए ? पैसों से हाथ तंग है, बस किसी तरह दाल – रोटी चल रही है परिवार की। क्या करूँ कि किसी किसान परिवार की कुछ तो मदद कर सकूँ। यही सोच-विचार करता हुआ वह घर से सब्जी लेने के लिए निकल पड़ा।
सब्जी मंडी बड़े किसानों और व्यापारियों से भरी पड़ी थी। भीड़ में किनारे एक बुढ़िया बैठी दिखाई दी, जिसके सामने थोड़े टमाटर और एक-दो सब्जियाँ रखी थीं। वह उसी की तरफ बढ़ गया और पास जाकर बोला—
“सब्जी ताजी है ना माई ?”
बुढ़िया ने बड़ी आशा से पूछा- “ हाँ,का चाही बेटवा!”
जमीन पर बिछाए बोरे पर रखे टमाटर के ढेर पर नजर डालकर वह बोला – “ ऐसा करो ये सारे टमाटर दे दो, कितने हैं ये ?”
बुढ़िया ने तराजू के एक पलड़े पर बटखरा रखा और दूसरे पलड़े पर बोरे पर रखे हुए टमाटर उलट दिए, बोली – “अभी तौल देते हैं भैया। ” तराजू के काँटे को देखती हुई बोली – “दो किलो हैं।”
“किलो का क्या भाव लगाया माई ? “
“चालीस रुपया ”
“चालीस रुपया किलो ?” एकबारगी वह चौंक गया। कीमत तो ज्यादा थी ही, टमाटर भी ताजे नहीं थे। सब्जी बिना मोल भाव के वह नहीं खरीदता था। यह तो घाटे का सौदा है ? तभी उसकी नजर बुढ़िया के चेहरे पर पड़ी जो बिक्री होने की आस से खुश नजर आ रही थी। उसने और कुछ सोचे बिना टमाटर थैले में डलवा लिए और चल दिया।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०३ ☆
☆आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय…
एक नीम, एक घर और स्मृतियों का संसार
रास्ते में चलते हुए कभी-कभी कोई दृश्य हमारी गति को धीमा कर देता है। दूर तक फैली हरियाली के बीच खिले कप के आकार जैसे पीले फूल, सड़क के दोनों ओर खड़े वृक्ष और कहीं अपनी जड़ों को धरती के ऊपर उतारते बरगद। प्रकृति के ऐसे दृश्य मन को किसी अनकही शांति से भर देते हैं। लगता है, सुकून की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं; वह हमारे आसपास ही बिखरा है। बस, उसे देखने के लिए मन का कुछ देर ठहरना जरूरी है।
ऐसे ही किसी रास्ते पर जब नीम दिखाई देता है, तो मेरी दृष्टि कुछ पल उसके साथ ठहर जाती है। उस क्षण मैं केवल सामने खड़े वृक्ष को नहीं देखती, मेरा मन अपने घर के आँगन तक पहुँच जाता है।
हमारा घर पुश्तैनी है। उसकी कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रही है। पिता ने अपने पिता से सुना था कि जब इस घर को लिया गया, तब भी आँगन के बीचोंबीच नीम का वृक्ष मौजूद था। घर के पास कभी एक तालाब हुआ करता था। समय के साथ आसपास का परिवेश बदला, घर में लोग आए और पीढ़ियाँ आगे बढ़ती रहीं, लेकिन नीम वहीं बना रहा। घर की संरचना भी कुछ इस तरह रही कि वह आँगन के केंद्र में अपना स्थान बनाए रख सका। मानो घर ने अपने विस्तार में इस वृक्ष के लिए जगह नहीं छोड़ी, बल्कि उसी को केंद्र मानकर अपना संसार रचा हो।
मेरे जन्म से पहले का यह नीम मेरे बचपन का सहज साथी रहा है। उसके होने को मैंने कभी किसी विशेष घटना की तरह नहीं देखा। वह घर में उतना ही स्वाभाविक था, जितनी सुबह आँगन में उतरती धूप। शायद आत्मीयता इसी तरह जन्म लेती है—बिना किसी घोषणा के, हमारे जीवन में चुपचाप जगह बनाती हुई।
आज जब कहीं रास्ते में नीम दिखाई देता है, तो उसकी पत्तियाँ जैसे मुझे अपनी ओर बुलाती हैं। मन में एक परिचित-सा भाव जागता है, जिसे किसी एक शब्द में व्यक्त करना कठिन है। क्या वह बचपन की स्मृति है, घर की गंध है या उस समय का आकर्षण, जो बीत जाने के बाद भी हमारे भीतर जीवित रहता है? शायद इन सबका मिला-जुला रूप है। इतना अवश्य जानती हूँ कि किसी अनजान रास्ते पर दिखाई देने वाला नीम भी मुझे मेरे अपने नीम तक पहुँचा देता है।
समय के साथ मनुष्य का जीवन बदलता है। घरों में रहने वाले लोग बदलते हैं, उनकी दिनचर्याएँ बदलती हैं और नई स्मृतियाँ पुरानी स्मृतियों की जगह बनाती हैं। लेकिन कुछ उपस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनका हमारे जीवन में होना ही एक स्थिरता देता है। हमारे घर का नीम मेरे लिए ऐसी ही उपस्थिति है। वह पीढ़ियों के बदलते जीवन के बीच अपनी जगह बनाए रहा। शायद इसी निरंतरता ने उसके साथ मेरे संबंध को इतना गहरा किया कि आज उसकी पत्तियों में भी घर की पुकार सुनाई देती है।
अब समझ में आता है कि कुछ वृक्ष केवल धरती में जड़ें नहीं जमाते, वे हमारे जीवन में भी अपनी जड़ें उतार देते हैं। हम उनसे जुड़ते कब हैं, इसका कोई निश्चित क्षण नहीं होता। एक दिन बस इतना महसूस होता है कि उनसे दूर होकर भी हम उनसे अलग नहीं हुए हैं।
मेरे लिए नीम का वृक्ष आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय है — समय, जो पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ता रहा, लेकिन जिसकी छाया में मेरा बचपन आज भी कहीं सुरक्षित है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना में राष्ट्रीयता और लोक-संवेदना” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३६ ☆
आलेख – यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना में राष्ट्रीयता और लोक-संवेदना श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
राष्ट्रीयता केवल भौगोलिक सीमाओं, कोरे अतीत के गौरव या सतही उत्सवधर्मी उद्घोषों से अधिक उस देश के जनजीवन, सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक आकांक्षाओं और सामूहिक भविष्य के प्रति पूरी तरह सजग रहना है।
हिंदी नवगीत की सशक्त परंपरा के हस्ताक्षर यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में आकार लेती है। उनके गीत केवल निजी भावनाओं की सुकुमार अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने समय की विसंगतियों, व्यवस्था की नब्ज़ और मनुष्य की जिजीविषा को स्वर देते हैं। उनके राष्ट्रीयता के स्वर राष्ट्रप्रेम के भावुक धरातल से आगे बढ़कर एक प्रखर ‘राष्ट्रबोध’ और सामाजिक उत्तरदायित्व में दृष्टव्य है।
इस राष्ट्रबोध का तीखा और जीवंत रूप उनकी बहुचर्चित रचना ‘आ रहा है ज्वार देखो!’ में उभरता है। कविता का आरंभ ही पाठक को सतही दृश्यों से परे देखने की चेतावनी देता है, जब कवि आगाह करता है कि “लहर की अठखेलियों पर भूल मत जाओ हक़ीक़त है अभी सोया समुन्दर आ रहा है ज्वार देखो!”।
यहाँ समुद्र और ज्वार महज़ प्राकृतिक उपादान नहीं हैं, बल्कि यह उस जनमानस की अदम्य ऊर्जा और परिवर्तन की संभावना का प्रतीक हैं जिसे सत्ताएँ अक्सर निष्क्रिय मान लेती हैं। इसी क्रम में, कविता जब यह व्यंग्य कसती है कि “नाम सेवा का लिया था मिल गयी जागीरदारी”, तो वह सीधे तौर पर उन विडंबनाओं को बेनकाब करती है जहाँ जनसेवा का पाखंड विशेषाधिकारों और सत्ता-सुख में बदल जाता है। राही की राष्ट्रीय चेतना का आधार अंधसमर्थन कतई नहीं है । उनकी निष्ठा हमेशा सत्ता के बजाय जनहित के साथ है, जो तंत्र को उसके मूल उत्तरदायित्व का स्मरण कराती है। संकट और धुएँ के अंधेरे के बीच ज्वार का यह रूपक इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविता निराशा का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत संकटों से जूझने की सामूहिक जिजीविषा का दस्तावेज है।
किंतु राष्ट्र केवल राजनीतिक तंत्र या इतिहास की सीमाओं तक सीमित नहीं होता। उसकी वास्तविक और जीवंत आत्मा गाँवों, कस्बों, लोकभाषाओं, श्रम-संस्कृति और पीढ़ियों से संचित स्मृतियों में बसती है। राही की कविता ‘यादें’ इस सांस्कृतिक आयाम को बेहद आत्मीयता से उजागर करती है। अमराइयों, चौपालों, घरेलू लोकाचार और खेतों-मेड़ों के दृश्य केवल अतीत के सुंदर चित्र भर नहीं हैं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक संसार के पुनर्सृजन हैं जिसने भारतीय समाज को सींचा है। भारत की बहुलता ही उसकी शक्ति है। अलग-अलग बोलियाँ, रीति-रिवाज और जीवन-पद्धतियाँ मिलकर राष्ट्रीय संस्कृति का ताना-बाना बुनती हैं। राही की कविता में अतीत की स्मृति और वर्तमान की चुनौती के बीच एक सुंदर संतुलन दिखाई देता है। स्मृति मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखती है, जबकि वर्तमान उसे समकालीन विडंबनाओं से टकराने की शक्ति देता है।
इसी वैचारिक स्वायत्तता को उनकी एक अन्य रचना ‘भोगा और जिया’ और अधिक स्पष्ट करती है। परंपरा का अर्थ उनके लिए पुराने मूल्यों का अंधानुकरण करना नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से गुजरकर उन्हें नए संदर्भों में परखना है। आधुनिकता का आशय भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाना नहीं है। इसी प्रसंग में उनकी यह पंक्ति अत्यंत गहरी दृष्टि रखती है—
“किसी ध्वजा की छत्र-छाँव में रथ यह नहीं रुका है।” यह एक स्वतंत्र रचनाकार का उद्घोष है जो किसी एक संकीर्ण राजनीतिक आग्रह या वैचारिक दबाव के आगे अपनी विवेकशीलता और आलोचनात्मक दृष्टि का समर्पण नहीं करता। लोकतांत्रिक समाज में असहमति, सवाल पूछना और संवाद करना ही राष्ट्र को जीवंत रखता है।
शिल्प के स्तर पर भी राही के नवगीत इस वैचारिक गहराई को अत्यंत प्रभावी बनाते हैं। लंबी बहसों या नारों के स्थान पर वे आग, धुआँ, क्षितिज, समुद्र और लोक-स्मृतियों के सघन बिंबों का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जो सीधे पाठक की संवेदना को झकझोरता है।
यतींद्रनाथ राही का काव्य हमें यह बताता है कि राष्ट्र से सच्चा प्रेम करना केवल उसकी जय-जयकार करना मात्र नहीं होता, बल्कि उसकी वास्तविकताओं को पहचानना, उसकी सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना, व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाना और उसके बेहतर भविष्य के प्रति ईमानदार रहना है। उनकी राष्ट्रीय चेतना संकीर्णता से मुक्त होकर मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय के विशाल फलक पर सार्थक होती है।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पर्व कहाँ ?” ।)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – संसार का सबसे पुराना सत्य…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “अब तक हो पहेली की तरह…“)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “दृष्टि दोष…“।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मुखौटा !)