(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं?…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८७ ☆
☆तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं? ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
तपन जब अपने चरम पर होती है, तब मन किसी तर्क से नहीं, केवल अनुभव से चलता है। धूप में दो कदम चलते ही भीतर एक ही पुकार उठती है — “काश कहीं कोई पेड़ मिल जाए… बस एक पल की छाँव मिल जाए।” यह चाह केवल शरीर की थकान नहीं होती, यह आत्मा की प्यास भी होती है।
कभी आपने ध्यान दिया है—कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ पेड़ों की हरियाली सिर पर छतरी-सी तनी रहती है। उन्हीं रास्तों से गुजरते हुए, चाहे आप खुले में हों या गाड़ी के भीतर, गर्मी का तीखापन जैसे कहीं खो जाता है। हवा वही होती है, सूरज वही होता है, पर एहसास बदल जाता है। वहाँ धूप जलाती नहीं, बस छूकर निकल जाती है।
और दूसरी ओर, वे रास्ते जहाँ पेड़ नहीं हैं—जहाँ केवल कंक्रीट है, तपती ज़मीन है, और बिन छाँव का विस्तार है। वहाँ आप गाड़ी के भीतर बैठकर एसी चला लें, फिर भी भीतर कहीं न कहीं गर्मी का एक अदृश्य बोझ बना रहता है। जैसे वातावरण ही तपकर भीतर उतर रहा हो।
यह अंतर केवल तापमान का नहीं, यह प्रकृति के स्पर्श का अंतर है।
पेड़ केवल छाया नहीं देते, वे वातावरण को संतुलित करते हैं। उनकी पत्तियाँ हवा को ठहराती हैं, उसे शीतल बनाती हैं, और उनकी जड़ें धरती में जल को थामे रखती हैं। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, वहाँ धरती की नमी जीवित रहती है, वहाँ जीवन की साँसें गहरी होती हैं।
हरियाली दरअसल प्रकृति का वह मौन संगीत है, जो बिना शब्दों के हमें सुकून देता है। जब हम पेड़ों के बीच से गुजरते हैं, तो केवल शरीर नहीं, मन भी ठंडा होता है। जैसे कोई अदृश्य हाथ हमारे माथे को सहला रहा हो और कह रहा हो—“ठहरो, सब ठीक है।”
शायद इसी कारण, जब जीवन की भागदौड़ और गर्मी दोनों हमें थका देती हैं, तब हम अनायास ही हरियाली की ओर खिंचते हैं। क्योंकि पेड़ों की छाँव में केवल विश्राम नहीं, एक गहरा अपनापन मिलता है—एक ऐसा अपनापन, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ देता है।
तो इस तपते समय में, जब हर कोई सुकून की तलाश में है, क्यों न हम खुद भी उस सुकून का कारण बनें?
एक पेड़ लगाएँ, एक पौधे को बढ़ने दें, ताकि आने वाले समय में जब कोई राहगीर उस रास्ते से गुजरे, तो उसे भी वही शीतलता मिले, वही राहत मिले—जो हम आज तलाश रहे हैं।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय कहानी – “एकला चलो रे” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१३ ☆
कथा कहानी – एकला चलो रे श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहानी
दोपहर की तीखी धूप पुणे के इस औद्योगिक क्षेत्र की कंक्रीट सड़कों पर कोलतार पिघला रही थी। साठ पार कर चुके ब्रजेश चाचा ने अपनी पुरानी साइकिल के पैडल पर थोड़ा और दबाव डाला। कैरियर पर सजे टिफिन और भारी-भरकम थैले हैंडल पर लटके हुए हैं। नीले-सफेद कपड़े के थैले आपस में टकराकर एक परिचित लय पैदा कर रहे थे।
सफेद गांधी टोपी के नीचे से बहते पसीने को उन्होंने अपनी खादी की कमीज की आस्तीन से पोंछा और ठीक बारह बजे साधना जी के घर के सामने साइकिल रोक दी।
साधना जी दरवाजे पर ही डिब्बा हाथ में लिए खड़ी थीं। उन्होंने गरम और ताजे भोजन का स्टील का डिब्बा चाचा के हाथ में थमाते हुए बड़ी आत्मीयता से कहा कि चाचा, बाहर धूप बहुत तेज हो गई है, आप दो मिनट बैठ क्यों नहीं जाते, थोड़ा ठंडा पानी पी लीजिए। इस उम्र में आप इतनी कड़ी मेहनत करते हैं, अब तो बेटे भी कमाने लगे हैं, अब आराम क्यों नहीं करते।
ब्रजेश चाचा ने डिब्बे को सलीके से थैले में रखते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया कि बहुरानी, इस धूप से मेरा पुराना नाता है। अगर आज मैं सुस्ताने बैठ गया, तो कारखाने में भूखे पेट मशीन चला रहे उस नौजवान इंजीनियर का भरोसा टूट जाएगा जो घर के स्वाद की आस में बैठा है। आराम तो उस दिन होगा जिस दिन यह सांसें रुकेंगी, जब तक पैरों में दम है, यह चाचा और उसकी सायकिल का चक्का घूमता रहेगा।
साधना जी उनकी इस निष्ठा को देखकर अवाक रह गईं। बरसों पहले जब ब्रजेश चाचा ने मुंबई के डिब्बावालों की कार्यप्रणाली से प्रेरित होकर पुणे के इस नए विकसित होते इंडस्ट्रियल एरिया में अकेले दम पर टिफिन पहुँचाने का फैसला किया था, तब लोगों ने इसे दीवानगी कहा था। कोई संगठन नहीं था, कोई नेटवर्क नहीं था, बस एक साइकिल और एक अटूट संकल्प था।
रवींद्रनाथ टैगोर के एकला चलो रे के मंत्र को उन्होंने अपने जीवन का सत्य बना लिया था।
शहर धीरे-धीरे बदल गया और फैक्ट्रियों के आस-पास चमचमाते रेस्तरां और ऑनलाइन फूड डिलीवरी वाले लड़के मोटरसाइकिल पर दौड़ने लगे। कई लोगों ने चाचा को सलाह दी कि अब इस बुढ़ापे में जान जोखिम में डालने की क्या जरूरत है, तकनीक के इस दौर में अब आपकी इस पुरानी व्यवस्था को कौन पूछेगा। लेकिन चाचा जानते थे कि मशीनी ऐप्स कभी भी उस माँ, पत्नी या गृहणी के हाथ के बने भोजन की ममता और शुद्धता को उस भूखे कर्मचारी तक नहीं पहुँचा सकते, जो उनका डिब्बा खोलते ही अपनी थकान भूल जाता है। यह उनके लिए महज एक रोजगार नहीं, बल्कि एक पवित्र मानवीय सरोकार था जिसे उन्होंने अपने हाथों से बनाया था।
साइकिल का स्टैंड हटाते हुए चाचा ने साधना जी को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि यह डिब्बा सिर्फ पेट नहीं भरता बहुरानी, यह घर को दफ्तर से जोड़ता है, और इस बूढ़े को जिंदा रखता है। इतना कहकर उन्होंने पैडल मारा और देखते ही देखते वह धूप से तपती सड़क पर कारखानों की ओर बढ़ गए। हवा में उनकी सफेद टोपी दूर से ही चमक रही थी, मानो वह थकती और हारती हुई दुनिया को यह संदेश दे रही हो कि जब कोई साथ न दे, तब भी अपने कर्तव्य पथ पर अकेले बढ़ते रहना ही जीवन का असली संगीत है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कथा कहानी – लिव-इन रिलेशनशिप।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९४ – कथा कहानी – लिव-इन रिलेशनशिप☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
उस फ्लैट की दीवारों पर लगे आधुनिक चित्रों में रंग तो बहुत थे, पर चमक गायब थी। विवान और समायरा आमने-सामने बैठे थे, जैसे किसी युद्ध के मैदान में दो थके हुए सिपाही संधि का इंतज़ार कर रहे हों। कमरे का सन्नाटा इतना भारी था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। “क्या अब सब खत्म हो गया?” समायरा ने धीमे से पूछा। उसकी आवाज में वह कंपन था, जो किसी पुरानी इमारत के गिरने से पहले महसूस होता है। विवान ने हाथ में पकड़े कॉफी मग को देखा, जिसमें झाग मर चुका था। “खत्म तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन हमने समझौतों को प्रेम का नाम दिया था,” उसने सपाट लहजे में जवाब दिया। उनके बीच का रिश्ता उस रेंट एग्रीमेंट की तरह था, जिसकी मियाद खत्म हो चुकी थी। वे साथ तो थे, पर वैसे ही जैसे किसी स्टेशन पर खड़ी दो अलग-अलग दिशाओं में जाने वाली गाड़ियाँ—दूरी शून्य, पर मंजिलें मीलों दूर।
विवान की बातों में वह चुभती हुई सच्चाई थी, जो हंसाती कम और अंदर तक छीलती ज्यादा थी। उसने कहा, “समाज को अंगूठा दिखाना आसान है समायरा, पर खुद की परछाईं से नजरें मिलाना मुश्किल।” समायरा उसे देखती रही। उसे याद आया कि कैसे वे ‘आजादी’ का झंडा लेकर इस घर में आए थे, यह सोचकर कि सात फेरों के बंधन पुराने जमाने की बेड़ियाँ हैं। पर आज वही आजादी उसे किसी कालकोठरी की तरह लग रही थी। लिव-इन रिलेशनशिप उनकी जिंदगी का पूरा सच बयान कर रही थी। “क्या तुम मेरे साथ चलोगे?” “कहाँ? जहाँ से हम भागकर आए थे?” “नहीं, जहाँ सचमुच का घर होता है।” “घर ईंटों से नहीं, विश्वास की पवित्र अग्नि से बनता है, जो हमने कभी जलाई ही नहीं।” उनका दर्शन अब उस सूखी हुई नदी की तरह था, जिसके तल पर केवल कंकड़-पत्थर और टूटे हुए वादे बचे थे।
विवान ने कमरे के कोने में रखे एक बड़े से सूटकेस की ओर इशारा किया। “इसमें क्या है?” समायरा की धड़कनें तेज हो गईं। विवान ने उसे धीरे से खोला। उसमें शादी का एक पुराना जोड़ा, कुमकुम की डिब्बी और मंगलसूत्र रखा था। “यह सब क्या है विवान? तुम तो कहते थे कि ये सब ढकोसले हैं?” समायरा की आँखों से आँसू बह निकले। विवान की आँखों में एक अजीब सी वीरानगी थी। “ये मेरी माँ के हैं। मैंने सोचा था कि शायद किसी दिन हम इस ‘लिव-इन’ की दहलीज लांघकर उस पवित्र दुनिया में कदम रखेंगे, जहाँ रिश्तों को पहचान मिलती है। पर हमने तो इस घर को केवल एक होटल बना दिया, जहाँ हम अपनी थकान मिटाते थे। सच तो यह है कि जब दो बदन पल भर की खुशी के लिए एक दूसरे की थकान मिटाने की मियाद बन जाएँ, तब वहाँ यादें कभी नहीं बनतीं।” रात गहराती गई। सांसें रुकने लगी थीं। वे दोनों उस सत्य के सामने खड़े थे, जो उन्होंने खुद ही बड़ी कुशलता से छिपा रखा था।
पूरा घर एक अजीब सी रोशनी से भरा हुआ था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। पुलिस और कुछ लोग अंदर दाखिल हुए। समायरा चिल्लाई, “यह सब क्या है?” पर किसी ने उसकी आवाज नहीं सुनी। पुलिस अधिकारी ने विवान की ओर इशारा किया, जो सोफे पर बेजान पड़ा था। पास ही समायरा की भी देह पड़ी थी। वे दोनों महीनों पहले ही एक सामूहिक अवसाद में जान दे चुके थे। यह पूरी बातचीत, यह पूरा झगड़ा और यह पछतावा दरअसल उनकी भटकती हुई रूहों का संवाद था, जो उस घर की चारदीवारी में कैद हो गई थीं। जिस ‘लिव-इन’ को वे जीवन की नई शुरुआत मान रहे थे, वह वास्तव में उनकी मृत्यु का कारण बन चुका था। सच तो यह है कि जो अब तक जिंदा लग रहे थे, वे केवल यादों का एक डिजिटल अवशेष थे। उनकी स्वतंत्रता ने उन्हें ऐसी जगह पहुँचा दिया था, जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपके भावप्रवण एवं विचारणीय “गर्मी के दोहे” ।)
जय प्रकाश की कविता # १४४ ☆ गर्मी के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अदृश्य शक्ति…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “सीख… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६४ ☆
लघुकथा – सीख… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
बनवारी लाल जी सरकारी स्कूल में एकाउंटेंट के पद से रिटायर हुए थे। जितना वेतन मिलता था उससे कम पेंशन मिलती थी। दवाइयों और छोटे मोटे खर्च का निर्वहन हो जाता। उनका बेटा राहुल एक छोटी-सी कंपनी में नौकरी करता था। वेतन बहुत कम था। उसके वेतन और बनवारीलाल जी की पैंशन से घर की जरूरतें पूरी तो हो जातीं पर कोई अचानक जरूरत सामने आ जाए तो बहुत परेशानी होती। ऐसे समय राहुल की पत्नी सीता कई बार बच्चों की फीस, कपड़े और राशन के खर्च को लेकर परेशान हो जाती। बच्चे बड़े हो रहे थे तो खर्च बढ़ रहा था परंतु आमदनी नहीं बढ़ रही थी। इसको लेकर राहुल और सीता अक्सर चर्चा किया करते कि समझ नहीं आता आगे कैसे चलेगा। राहुल की चिंता यह भी थी कि वह अपने पिता को यथेष्ट सुख नहीं दे पा रहा था।
बनवारी लाल जी यह सब सुनते देखते और दुखी भी होते। कहीं नौकरी कर सकते थे पर बेटा पसंद नहीं करेगा यह सोचकर रुक जाते। सोचते सोचते उन्हें एक युक्ति सूझी। टीचर नहीं रहे तो क्या छोटे बच्चों को पढा तो सकते हैं। अपने छोटे पोते का ट्यूशन बच जाएगा। उन्होंने अपने बक्स से कुछ किताबें और कॉपियाँ निकालीं और मोहल्ले के बच्चों को शाम को मुफ्त पढ़ाना शुरू कर दिया। उनका पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि बच्चे बहुत रुचि लेने लगे। बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। मोहल्ले के लोगों को भी अच्छा लगने लगा। कुछ लोगों ने बनवारी लाल जी से आग्रह किया कि वे नियमित ट्यूशन लें और फीस भी देने लगे।
घर में थोड़ी अतिरिक्त आमदनी होने से खुशी की एक लहर दौड़ गई घर का माहौल बदल गया था।
बनवारी लाल जी ने स्वयं कुछ करके सबको ऐसी सीख दी कि लोगों ने समय व्यर्थ करना बंद कर दिया और कुछ न कुछ अतिरिक्त काम करने लगे। बनवारी लाल जी कहते कि कमाई छोटी-बड़ी नहीं होती, मन छोटा नहीं होना चाहिए। अब रात में सोने से पहले हर घर से हँसी की आवाज सुनाई देने लगीं हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नौतपा…।)
“बहुत अधिक गर्मी है मोना और तरुण तुम लोग कहाँ जा रहें हो?” सुनीता जी ने कहा।
मोना ने कहा – “मम्मी जी हम जब भी कही घूमने जाते हैं तो आप अवश्य रोक टोक करती हो?”
तरुण ने कहा – “माँ बच्चों की स्कूल की छुट्टी है इसलिए पास की पार्क में जा रही है। वहां पर वाटर पार्क और चिड़ियाघर घूम कर आएगे।”
मोना ने गुस्से से कहा – “आप की माँ तो हमें कहीं घूमने नहीं जाने देती हैं?”
तरुण की माँ सुनीता ने कहा-
“बेटा तुम लोग घूमने जाओ मुझे कोई एतराज नहीं है पर नौतपा लगा है इसलिए मना कर रही हूँ।”
मोना ने कहा -“क्या नया नाटक है नौतपा क्या है?”
सुनीता जी ने कहा- “मोना बच्चों को भी बुला लो मैं बताती हूँ कि यह नौतपा क्या है यह जानकारी सभी को रहनी चाहिये।”
तरुण ने बच्चों को बुला लिया और बोला “माँ बोलो हम सभी सुनेंगे।”
सुनीता जी ने कहा-ज्येष्ठ मास में जब सूर्य, रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण में होता है, तो पहले 9 दिनों तक सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं। बहुत अधिक गर्मी पड़ती है उसी को नौतपा कहते हैं 9 दिन अधिक तकनीक से वर्षा अच्छी होती है यदि इस बीच पानी गिर गया तो वर्षा कम होती है।”
मोना ने कहा – “हमारे घूमने जाने पर आप क्यों रोक लगा रही हैं?”
“बेटा उन दिनों बहुत अधिक धूप सीधी पड़ती है गर्मी अधिक रहती है लू चलती है लू लग जाने के कारण तुम और बच्चे बीमार हो जाओगे तुम्हारी चिंता है इसलिए कह रही हूँ, यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन ना हो तो गूगल में देख लो क्योंकि आजकल सारी बातें तो तुम गूगल की ही मानती हो न”
सुनीता जी ने धीमी स्वर में कहा वह गंभीर हो गई।
मोना तुरंत गूगल में देखने लग गई और उसने कहा कि- “माँ आप सही कह रही हैं, गूगल बता रहा है कि इन दोनों मांगलिक कार्य भी नहीं होते इसीलिए मेरी बड़ी बहन अपनी बेटी की शादी बाद में कर रही है।”
इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे वातावरण में भीषण तपिश बढ़ जाती है।
तरुण ने कहा- “माँ की बात में मानता हूँ तो तुम्हें गुस्सा आता है माँ सही कहती है चलो मौसम अच्छा होगा बारिश में तो हम सब मिलकर घूमने चलेंगे।”
बच्चों ने कहा “हमने देखा दादी की बात कितनी सही है तुम्हारे चक्कर में हम घूमने जाते और बीमार पड़ जाते घर में आराम से हम सब खाएंगे और नौतपा के विषय में भी हमने कितनी अच्छी जानकारी ली लिख लिख कर स्कूल में सबको बताऍंगे।”
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २४ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
मागच्या भागात आपण रविंद्रनाथांचे वडील देवेंद्रनाथांविषयी थोडी माहिती घेतली. रविंद्रनाथांच्या जीवनावर प्रभाव टाकणाऱ्या प्रमुख व्यक्तींपैकी एक म्हणजे देवेंद्रनाथ! त्यांनी बंगालचं सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विश्व समृद्ध केलं. त्यांच्याविषयी आणखी माहिती आज घेऊया.
ब्राह्मोसमाजाचे अनुयायी देवेंद्रनाथांचा उल्लेख महर्षी देवेंद्रनाथ असा करीत. तत्त्वबोधिनी पत्रिका ह्या ब्राह्मो समाजाचे मुखपत्र असलेल्या मासिकाद्वारे बंगाली गद्याच्या वाटचालीस गती देऊन त्यांनी मोठाच हातभार लावला. भारदस्त वैचारिक गद्यलेखनाची परंपरा बंगालीत ह्या पत्रिकेने सुरू झाली. ऋग्वेदाच्या बंगाली अनुवादास प्रथम देवेंद्रनाथांनीच हात घातला. संस्कृत व्याकरणही बंगाली भाषेत प्रथम त्यांनीच लिहिले. ‘स्वरचित जीवनचरित’ हे त्यांचे आत्मचरित्र फारच मनोरंजक आहे. त्यांच्या ह्या आत्मचरित्राचे पुढे त्यांची मुले, सत्येंद्रनाथ आणि इंदिरा देवी ह्या दोघांनी ‘देवेंद्रनाथ ठाकूरेर स्वरचित जीवनचरित’ नावाने इंग्रजीत भाषांतरही केले.
देवेंद्रनाथांच्या मुलांनी देखिल विविध विषयात आंतरराष्ट्रीय किर्ती मिळवली. द्विजेंद्रनाथ कवि, दार्शनिक और गणितज्ञ म्हणून प्रसिद्ध झाले. सत्येंद्रनाथ पहले भारतीय ICS अधिकारी बनले. ज्योतिरिंद्रनाथ नाटककार, संगीतकार व संपादक झाले. रवींद्रनाथांनी नोबेल पुरस्कार मिळवून जागतिक किर्ती प्राप्त केली. त्यांची कन्या स्वर्णकुमारी देवी देखिल प्रसिद्ध कवयित्री, कादंबरीकार व संपादक होत्या.
देवेंद्रनाथांच्या नातवंडांपैकी अनेकजण लेखक, चित्रकार, संगीतकार, संपादक, राजकारणी वा समाजकारणी आहेत.
देवेंद्रनाथांच्या अंतःकरणात वास्तव्य करणारा साहित्यिकच द्विजेंद्रनाथ व रवींद्रनाथ यांचा साहित्यगुरू होय. देवेद्रनाथांमधील खरा साहित्यिक त्यांच्या स्वतःच्या आनुषंगिक लेखनात व्यक्त झालेला नसून, तो त्यांनी आप्तेष्टांना व स्नेह्यासोबत्यांना अनौपचारिकपणे लिहिलेल्या पत्रांमधून आणि त्यांच्या आत्मचरित्रातून व्यक्त झाला आहे. अक्षयकुमार दत्त, ईश्वरचंद्र विद्यासागर यांच्या बरोबरीने देवेंद्रनाथही, स्वतःच्या नकळत नव्या बंगाली गद्याची जडणघडण करीत होते. त्यांची ही गद्यशैली त्यांच्या मुलांनी, विशेषतः द्विजेंद्रनाथ व रवींद्रनाथ यांनी उचलली व खूपच विकसित केली.
सर्व प्रकारच्या ऐहिक सुखसंपत्तीची अनुकूलता असूनही उपनिषदांतील तत्त्वज्ञानाच्या गाढ व्यासंगामुळे आणि जन्मजात ईशप्रेमामुळे देवेंद्रनाथांच्या अंगी विरक्ती बाणलेली होती. शिक्षणप्रसार व लोककल्याणकारी कार्यात देवेंद्रनाथांनी आपले सर्व जीवन वेचले. सर्वतत्त्वदीपिका सभा, तत्त्वबोधिनी सभा, हिंदू हितार्थी विद्यालय, समाजोन्नतिविधायिनी सुहृदसमिती इ. संस्था त्यांनी स्थापन केल्या आणि त्यांद्वारे धार्मिक, सामाजिक, राजकीय व शैक्षणिक जागृती केली. हिंदू महाविद्यालयाच्या कार्यकारी समितीवर असताना त्यांनी अनेक समाजोपयोगी कामे केली.
बोलपूर येथील ब्रह्मचर्याश्रम देवेंद्रनाथांनीच स्थापन केला होता. रवींद्रनाथांनी पुढे त्याचे रूपांतर जगप्रसिद्ध ‘शांतिनिकेतन’मध्ये व नंतर ‘विश्वभारती’मध्ये केले.
देवेंद्रनाथांचा मृत्यू वयाच्या ८८ व्या वर्षी १९ जानेवारी १९०५ रोजी त्यांच्या राहत्या घरी झाला.
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☆ गीत : ७० ☆
IS it beyond thee to be glad with the gladness of this rhythm? To be tossed and lost and broken in the whirl of this fearful joy?
All things rush on, they stop not, they look not behind, no power can hold them back, they rush on.
Keeping steps with that restless, rapid music, seasons come dancing and pass away ⎯colours, tunes, and perfumes pour in endless cascades in the abounding joy that scatters and gives up and dies every moment.
THAT I should make much of myself and turn it on all sides, thus casting coloured shadows on thy radiance ⎯ such is thy maya.
Thou settest a barrier in thine own being and then callest thy severed self in myriad notes. This thy self-separation has taken body in me
The poignant song is echoed through all the sky in many-coloured tears and smiles, alarms and hopes; waves rise up and sink again, dreams break and form. In me is thy own defeat of self.
This screen that thou hast raised is painted with innumerable figures with the brush of the night and the day. Behind it thy seat is woven in wondrous mysteries of curves,
casting away all barren lines of straightness.
The great pageant of thee and me has overspread the sky. With the tune of thee and me all the air is vibrant, and all ages pass with the hiding and seeking of thee and me.
HE it is, the innermost one, who awakens my being with his deep hidden touches.
He it is who puts his enchantment upon these eyes and joyfully plays on the chords of my heart in varied cadence of pleasure and pain.
He it is who weaves the web of this maya in evanescent hues of gold and silver, blue and green, and lets peep out through the folds his feet, at whose touch I forget myself.
Days come and ages pass, and it is ever he who moves my heart in many a name, in many a guise, in many a rapture of joy and of sorrow.