हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२८ ☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सुनना और सहना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये कैसा जग का व्यापार  / स्वर- यश कीर्ति , सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२८ ☆

☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘हालात सिखाते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह ही होता है’ गुलज़ार इस कथन के माध्यम से समय व परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हैं। वैसे यह तथ्य महिलाओं पर अधिक लागू होता है, क्योंकि ‘औरत को सहना है, कहना नहीं और यही उसकी नियति है।’ उसे तो अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्राप्त नहीं है। वैसे कोर्ट-कचहरी में भी आरोपी को अपना पक्ष रखने की हिदायत ही नहीं दी जाती; अवसर भी प्रदान किया जाता है। परंतु औरत की नियति तो उससे भी बदतर है। बचपन से उसे समझा दिया जाता है कि यह घर उसका नहीं है और पति का घर उसका होगा। परंतु पहले तो उसे यह सीख दी जाती थी कि ‘जिस घर से डोली उठती है, उस घर से अर्थी नहीं उठती। इसलिए तुम्हें इस घर में अकेले लौट कर नहीं आना है।’ सो! वह मासूम आजीवन उस घर को अपना समझ कर सजाती-संवारती है, परंतु अंत में उस घर से उस अभागिन को दो गज़ कफ़न भी नसीब नहीं होता और उसके नाम की पट्टिका भी कभी उस घर के बाहर दिखाई नहीं पड़ती।

परंतु समय के साथ सोच बदली है और आठ से दस प्रतिशत महिलाएं सशक्त हो गई हैं– शेष वही ढाक के तीन पात। कुछ महिलाएं समानता के अधिकारों का दुरुपयोग भी कर रही हैं। वे ‘लिव इन व मी टू’ के माध्यम से हंसते-खेलते परिवारों में सेंध लगा रही हैं तथा दहेज व घरेलू हिंसा आदि के झूठे इल्ज़ाम लगा पति व परिवारजनों को सीखचों के पीछे पहुंचा अहम् भूमिका वहन कर रही हैं। यह है परिस्थितियों के परिर्वतन का परिणाम, जैसा कि गुलज़ार ने कहा है कि समानता का अधिकार प्राप्त करने के पश्चात् महिलाओं की सोच बदली है। वे अब आधी ज़मीन ही नहीं, आधा आसमान लेने पर  आमादा हो रही हैं। मुझे स्मरण हो रही हैं स्वरचित पंक्तियां ‘मौसम भी बदलते हैं, हालात बदलते हैं/ यह समाँ बदलता है, जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं, दिल को सुक़ून/  ग़र साथ हो सुरों का, नग़मात बदलते हैं।’ जी हां! यही सत्य है जीवन का– समय के साथ- साथ व्यक्ति की सोच भी बदलती है। वैसे स्मृतियों में विचरण करने से दिल को सुक़ून नहीं मिलता। परंतु यदि सुरों अथवा संगीत का साथ हो, तो उन नग़मों की प्रभाव-क्षमता भी अधिक हो जाती है।

‘संसार में मुस्कुराहट की वजह लोग जानना चाहते हैं; उदासी की वजह कोई नहीं जानना चाहता।’ यहां ‘सुख के सब साथी, दु:ख में ना

कोय।’ सो! इंसान सुखों को इस संसार के लोगों से सांझा नहीं करना चाहता, परंतु दु:खों को बांटना चाहता है। उस स्थिति में वह आत्म- केंद्रित रहते हुए दूसरों से संबंध-सरोकार रखना पसंद नहीं करता। अक्सर लोग सत्ता व धन- सम्पदा व सम्मान वाले व्यक्ति का साथ देना पसंद करते हैं; उसके आसपास मंडराते हैं, परंतु दु:खी व्यक्ति से गुरेज़ करते हैं। यही है ‘दस्तूर- ए-दुनिया।’

‘हौसले भी किसी हक़ीम से कम नहीं होते/ हर तकलीफ़ में ताकत की दवा देते हैं।’ मानव का साहस, धैर्य व आत्मविश्वास किसी वैद्य से कम नहीं होता। वे मानव को मुसीबतों में उनका सामना करने की राह सुझाते हैं। जैसे एक छोटी-सी दवा की गोली रोग-मुक्त करने में सहायक सिद्ध होती है, वैसे ही  संकट काल में सहानुभूति के दो मीठे बोल संजीवनी का कार्य करते हैं। ‘मैं हूं ना’ यह तीन शब्द से उसे संकट-मुक्त कर देते हैं। इसलिए मानव को विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए तथा हार होने से पहले पराजय को नहीं स्वीकारना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला कहते हैं ‘हिम्मतवान् वह नहीं, जिसे डर नहीं लगता, बल्कि वह है जो डर को जीत लेता है’ तथा वैज्ञानिक मैडम क्यूरी का मानना है कि ‘जीवन डरने के लिए नहीं: समझने के लिए है। सकारात्मक संकल्प से ही हम मुश्किलों से बाहर निकल सकते हैं।’ सो! संसार में वीर पुरुष ही विजयी होते और कायर व्यक्ति का जीना प्रयोजनहीन होता है। इसके साथ हम सकारात्मक सोच व दृढ़-संकल्प से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। नैपोलियन का यह संदेश अनुकरणीय है कि ‘समस्याएं भय व डर से उत्पन्न होती हैं। यदि डर की जगह विश्वास ले ले, तो वे अवसर बन जाती हैं। वे विश्वास के साथ आपदाओं का सामना कर उन्हें अवसर में बदल डालते थे।’ इसलिए हर इंसान को अपने हृदय से डर को बाहर निकाल फेंकना चाहिए। यदि आप साहस-पूर्वक यह पूछते हैं–’इसके बाद क्या’ तो प्रतिपक्ष के हौसले पस्त हो जाते हैं। जिस दिन मानव के हृदय से भय निकल जाता है; वह आत्मविश्वास से आप्लावित हो जाता है और आकस्मिक आपदाओं का सामना करने में स्वयं को समर्थ पाता है। हमारे हृदय का भय का भाव ही हमें नतमस्तक होने पर विवश करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यही संदेश दिया है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है।’ हमारी सहनशीलता ही उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। जब हम उसके सम्मुख डटकर खड़े हो जाते हैं, तो वह अपनी झेंप मिटाने के लिए अपना रास्ता बदल लेता है। यह अकाट्य सत्य है कि हमारा समर्पण ही प्रतिपक्ष के हौसलों को बुलंद करता है।

मौन नव निधियों की खान है; विनम्रता आभूषण है। परंतु जहां आत्म-सम्मान का प्रश्न हो, वहाँ उसका सामना करना अपेक्षित व श्रेयस्कर है। ऐसी स्थिति में मौन को कायरता का प्रतीक स्वीकारा जाता है। सो! वहाँ समझौता करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भले ही सुनना व सहना हमें हालात सिखाते हैं, परंतु उन्हें नतमस्तक हो स्वीकार कर लेना पराजय है।

‘यदि तुम स्वयं को कमज़ोर समझते हो, तो कमज़ोर हो जाओगे। यदि ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो ताकतवर’– स्वामी विवेकानंद जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। हमारी सोच ही हमारा भविष्य निर्धारित करती है। इसलिए जीवन में नकारात्मकता को जीवन में कभी भी घर न बनाने दो। रोयटी बेनेट  के अनुसार चुनौतियाँ व प्रतिकूल परिस्थितियाँ हमें हमारा साक्षात्कार कराने हेतु आती हैं कि हम कहां हैं? तूफ़ान हमारी कमज़ोरियों पर आघात करते हैं, लेकिन तभी हमें अपनी शक्तियों का आभास होता है। समाजशास्त्री प्रौफेसर कुमार सुरेश के शब्दों में ‘अगर हमारा परिवार साथ है, तो हमें मनोबल मिलता है और हम हर संकट का सामना करने को तत्पर रहते हैं।’ अरस्तु के शब्दों में ‘श्रेष्ठ व्यक्ति वही बन सकता है, जो दु:ख और  चुनौतियों को ईश्वर की आज्ञा मानकर आगे बढ़ता है।’ सो! मानव को उन्हें प्रभु-प्रसाद व अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल स्वीकारना चाहिए। माता देवकी व वासुदेव को 14 वर्ष तक काराग़ार में रहना पड़ा। देवकी के कृष्ण से प्रश्न करने पर उसने उत्तर दिया कि इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। आप त्रेतायुग में माता कैकेयी व पिता वासुदेव दशरथ थे। आपने मुझे 14 वर्ष का वनवास दिया था। इसलिए आपकी मुक्ति भी 14 वर्ष पश्चात् ही संभव थी। सो! ‘जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा, अच्छा ही होगा। इसलिए मानव को कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिए और हर परिस्थिति का खुशी से स्वागत् करना चाहिए। समय कभी थमता नहीं; निरंतर गतिशील रहता है। इसलिए मन में कभी मलाल को मत आने दो। यह समाँ भी गुज़र जाएगा और उलझनें भी समयानुसार सुलझ जाएंगी। उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला दें, तो सब अच्छा ही होगा। औचित्य-अनौचित्य में भेद करना सीखें और विपरीत परिस्थितियों में प्रसन्न रहें, क्योंकि शरणागति ही शांति पाने का सर्वोत्तम साधन है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतप्रणय वल्लरी..

? रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हिरणी के इस चंचल मन को

हवा वसंती महकाती।

खिलता हरसिंगार चमन में,

हम गाते गीत प्रभाती।।

*

सौरभ सरिता उर में बहती,

खिलती आशा की कलियाँ।

पिया कहे सिंगार सलौना,

चाहत में डूबी अँखियाँ।।

यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं,

मुस्कानें सब मदमाती।

*

प्रणय वल्लरी झूम रही है,

अंग-अंग यौवन छाया।

सजा कुंतलों पर गजरा है,

देख मदन भी बौराया।।

प्रेम तूलिका लिखती पाती,

भेद खोलकर हर्षाती।

*

प्रीति हमारी यह मधुमासी,

प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।।

संबंधों के गठबंधन में,

भ्रमरों की बारातें हैं।।

मधुरस छलके तृषित अधर से,

धड़कन -धड़कन इतराती।

*

प्रियतम तेरी बनी मेनका,

आशाएँ आलिंगन की।

मन राधा बन बैठा व्याकुल,

राह तके अनुमोदन की।।

लगती आग मिलन की ऐसी,

प्रेम क्षितिज में इठलाती।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२८ ☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – इंतजार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

खिड़की से नित झाँकती, नई नवेली नार ।

सपने मन में सज रहे, चलती मधुर बयार ।।

आकर खिड़की पर दिखी, उसकी मधु मुस्कान।

मन में उसके जग रहे, नये-नये अरमान।।

 *

नयन निहारे प्यार से, देख रही है राह।

आ जाओ मेरे सजन, बस इतनी-सी चाह।।

 *

रस्ता उनका देखती, कब आओगे श्याम।

इंतजार होता नहीं, मिले नहीं आराम।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१० ☆ संतोष के मुक्तक… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – संतोष के मुक्तक  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१० ☆

संतोष के मुक्तक☆ श्री संतोष नेमा ☆

औरों  को  जो  ज्ञान   बांटते

अपनी सीख से स्वयं भागते

देखें  गर  वो  अपना  अंतस

गुण अवगुण को स्वयं छांटते

*

रंग   बदलते   चेहरे   देखे

घाव  हृदय  पर  गहरे देखे

बहुरुपिया  है यहाँ आदमी

सच  पर हमने  पहरे  देखे

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆ राधेय ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  ‘राधेय’।)

☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆

? कविता – राधेय ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में, कल मुझे भी मरना है l

वध तो होगा ही है मेरा, अब फिर क्यूँ पीछे हटना है ll

*

भविष्य कहेगा मित्रता में, क्यों दिया दुर्योधन का साथ?

वचन बद्ध था रहा सदा मैं, सभी अपनों का छूटा हाथ ll

*

रश्मिरथि होकर भी जग में, बहुत हुआ बदनाम l

क्या गुनाह था माधव मेरे, नहीं  मिला पाण्डु पुत्र  नाम ll

*

था अर्जुन से शूरवीर पर, गुरु अहम ने किया दूर l

धर्म अधर्म के बीच धनंजय, आपका व्यवहार रहा सदा ही क्रूर ll

*

माता कुंती ने ममता की, छाँव कभी न डाली थी l

पांचो पुत्र रहे सदा सलामत, यही कसम उन्होंने खाली थी ll

*

आज धंस गया भू में पहिया, परशुराम का श्राप धरे l

तभी केशव ने आज्ञा दी थी, पार्थ गांडीव तीर भरे ll

*

धराशायी ये सूत पुत्र था, करके मैदिनी का आलिंगन l

सूर्यदेव भी देख वत्स को, अस्ताचल  करते चिंतन ll

*

कहती हूँ  जागो जगवालों, बच्चों को इतिहास सुनाओ l

सुर्य पुत्र की सुनो कहानी, क्या था राधेय यह बतलाओ ll

*

कहती हूँ अद्धभुत वीर तुम, अर्पित श्रद्धा सुमन तुम्हें l

द्रवित हुआ है मन मेरा, सदा करूँ मैं नमन तुम्हें ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २९ – कविता – कुछ पता नहीं… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता कुछ पता नहीं…।)

☆ शशि साहित्य # २९ ☆

? कविता – कुछ पता नहीं…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

इस छोर को तो थामा मैंने,

उस छोर का कुछ पता नहीं…

 

क्यों डर रही पतंग हवा में,

पकड़ कुछ ढीली,

कुछ पता नहीं…

 

थी अब तक खुशियां मेरी मुट्ठी में,

रेत की तरह फिसल रही,

कुछ पता नहीं…

 

जो मेरे भी इंतजार में तड़प उठे,

उन तरसती निगाहों का,

कुछ पता नहीं…

 

हम तो चले थे कदम ब कदम पीछे तेरे,

कब मिटा दिए निशां लहरों ने,

कुछ पता नहीं…

 

उतावली हो रही बहारें,

महकने को मचलने को…

मगर अब इंतजार…

कुछ पता नहीं…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०० – जागा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव #३००  – विजय साहित्य ?

☆ जागा…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

विषय : माझा गाव

 (वृत्त : लवंगलता – मात्रा विभाग : ८-८-८-४ = २८)

गावासंगे नाळ जोडली शिवार माझी आई

वेशीवरची, दाट बाभळी, आठवणींची शाई…!१

*

गावदेवता नव्या मंदिरी वाट पाहते जेव्हा

उरूस जत्रा, जमतो मेळा, माळावरती तेव्हा…!२

*

सहा ऋतूंचे, सहा सोहळे, पार वडाचा पाही

नदी किनारी,औदुंबर तो,‌ सवे‌ ऋतूंच्या राही…!३

*

घरे गावची, नटली थटली, शहरी वारा, प्याली

सुख सोयींनी, रमा पाहुणी, वाजत गाजत आली…!४

*

शाळा,रस्ते , ग्राम चावडी, कात टाकली वाटे

जुन्या नव्याची, ऊन सावली, उरात क्षणभर दाटे…!५

*

रूप बदलले मम गावाचे, नसे बदलली,माया

परस्परांच्या, दिठी मिठीला आतुर होते, काया…!६

*

जितराबाने, भरला गोठा, दुध दुभत्याने,चरवी

सणवाराला,आपुलकीने, भरून जाते पडवी…!७

*

अजून येतो, वास फुलांना, साद घालती वाटा

अजून येते,धावत कोणी, रूतता पाई काटा…!८

*

संस्कारांची, जुनाट वसने, गावकुसावर, मुरली

पाय धुळीच्या, पायघड्यांवर, माया ममता,उरली…!९

*

गाव घराचे,नवीन वासे, माणुसकीचा धागा

अजून ठेवली मम गावाने, हृदयामध्ये जागा…!१०

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – २७ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – २७ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

पंढरपूरचे वर्णन

संत तुकारामांच्या पाच हजाराहून अधिक अभंग असलेल्या या गाथेत आपण त्यांनी हाताळलेले विविध विषय आजपर्यंत पाहिले, त्यावर विचार केला आणि जमेल तेवढा अभ्यास केला. पंढरपूर हे तुकारामांचे माहेर, माऊली विठ्ठलाचे निवासस्थान! माहेर कोणाला प्रिय नसते? तुकाराम महाराजांनाही ते अत्यंत प्रिय! अशा त्यांच्या या माहेराचे वर्णन महाराजांनी अनेक अभंगातून केल्याचे गाथा वाचताना लक्षात येते. अशाच माहेरच्या वर्णनाच्या आणि मोठेपणाच्या काही अभंगांचा आपण आज परामर्श घेऊया.

पांडुरंग कुठे, कसा आणि कशासाठी उभा आहे, हे तुकाराम महाराज सामान्य माणसाला सांगत आहेत. ते म्हणतात,

 आता उघडी डोळे/ जरी अद्यापी न कळे/

 तरी मातेचिया खोळे/ दगड आला पोटासी/

 मनुष्य देह ऐसा निध/ साधीलते साधे सिद्ध/

 करुनी प्रबोध/ संत पार उतरले//

 नाव चंद्रभागे तिरी/ उभी पुंडलिकाचे द्वारी

 * कर धरूनिया करी/ उभा उभी पालवी*//

 * तुका म्हणे फुकासाठी/ पायी घातलीया मिठी*/

 होतो उठा उठी/ लवकरीच उतार//

या अभंगातून सामान्य संसारी माणसाला ते डोळे उघडायला सांगतात. तुला काहीच कसे कळत नाही, खरोखरच तुझ्या आईच्या पोटी तू दगड म्हणूनच जन्माला आलास का? असा प्रश्न त्याला विचारतात. ते म्हणतात, ” अरे तुला माणसाचा जन्म मिळाला आहे, त्याचा तू सदुपयोग का करून घेत नाहीस? या देहात तुझी सिद्धी करून घेशील ती तुला साधेल, ” असा बोध करून संत स्वतः विवेक करून संसाराच्या पार उतरले आहेत. तुला तरायचे असेल तर एक नौका आहे, ती चंद्रभागेच्या तिरावर पुंडलिकाच्या दारात कमरेवर हात ठेवून उभी आहे, आणि ती सर्वांना उभ्या-उभ्याच बोलावीत आहे. या नौकेला कोणत्याही प्रकारचे भाडे मोजावे लागत नाही. एकनिष्ठ भावाने देवाच्या पायाला मिठी घातल्यास या भवसिंधुतून पार पडता येते. ” थोडक्यात काय तर पंढरपुरासी, चंद्रभागेच्या काठी पांडुरंग प्रपंचाची नौका पार करून देण्यासाठी भक्तांच्या सेवेला हजर आहे.

महाराजांचा विठ्ठल चरणी किती हा दृढ विश्वास आहे, हे या अभंगातून सहज समजते.

रे नामाची भरली पेठ/ वाहती वाट मार्ग/

वघेची येती वाण/ अवघे शकुन लाभाचे//

अडचणी केल्या दुरी/ देण्या उरी घेण्याच्या/

तुका म्हणे जोडी झाली/ ते आपुली आपणा//

या अभंगात पंढरपूरचे वर्णन करताना महाराज म्हणतात–

पंढरी ही भक्तांना इनाम म्हणून मिळालेली पेठ आहे. या पेठेत भक्तांचे थवेच्या थवे आहेत, तिकडे जाण्याचे मार्गही भक्तांनी भरलेले आहेत

(आषाढी- कार्तिकी वारीचा यात संदर्भ असावा) या पेठेत सर्व काही उपलब्ध आहे. लाभाचे शकून भक्तगणांना होतात. भक्तांच्या देण्या घेण्याच्या सर्व अडचणी दूर केलेल्या आहेत.. लाभ करून घेतला, जे जे या पंढरपुर क्षेत्री गेले, त्या सर्वांना फायदा झालेला आहे.

अनुपम असे कार्तिकी वारीचे वर्णन तुकाराम महाराज या अभंगात करतात.

कार्तिकीचा सोहळा/ चला जाऊ पाहू डोळा*/

आले वैकुंठ जवळा/ सन्निध पंढरीये//

पीक पिकले घुमरी/ प्रेम न समाये अंबरी/

अवघी मातली पंढरी/ घरोघरी सुकाळ//

चालती स्थिर स्थिर/ गरुड टकयांचे भार/

गर्जती गंभीर/ टाळ श्रुती मृदुंग//

मिळाली या भद्र जाती/ कशा आनंदे डुलती/

शूर उठावती/ एक एक आगळे//

नामामृत कल्लोळ/ वृंदे कोंदली सकळ/

आले वैष्णव दळ/ कळी काळ कापती//

आज करिती ब्रह्मादिक/ देखुनी वाळवंटीचे सुख/

धन्य धन्य मृत्यू लोक/ म्हणती भाग्याचे कैसे//

स्मरण मुक्ती वाराणसी/ पितृ ऋण गया नासी/

धार नाही पंढरीसी/ पायापाशी विठोबाच्या//

तुका म्हणे आता/ काय करणे आम्हा चिंता/

सकळ सिद्धीचा दाता/ तो सर्वथा नुपेक्षी//

कार्तिकीच्या वारीचे वर्णन करताना सोबतच्या भक्तांना उद्देशून म्हणतात,

चला हो आपण हा वारीचा सोहळा आपल्या डोळ्यांनी पाहू या. या पंढरपुरात प्रत्यक्ष वैकुंठ आपल्याजवळ आले आहे. हरी नामाचा घोष आसमंतात घुमतो आहे, हेच मोठे पीक पिकले आहे. प्रेम आकाशात मावेनासे झाले आहे. हरीच्या प्रेम भावनेने सर्व पंढरपूर दुमदुमले आहे. घरोघरी परमार्थाचा सुकाळ चालू आहे. वैष्णव जन आनंदाने भजन करत हळूहळू थांबत थांबत चालत आहेत. त्यांनी गरुडचिन्हे असलेले ध्वज धारण केले आहेत. टाळ, मृदुंग, एकतारी, वीणा यांच्या साथीने श्रीहरीच्या नामाची गर्जना चालू आहे. मोठमोठे हत्ती गजदळात जसे डोलत असावेत, तसे एकाहून एक श्रेष्ठ विष्णू भक्त आघाडीवर चालत आहेत. भक्त जन समुदाय हरिनामाच्या अमृतघोशाने न्हाऊन निघाला आहे. विष्णू भक्तांचे हे सैन्य पाहून कली आणि काळ थरथर कापत आहेत. पंढरीच्या वाळवंटातील भजनाचे सुख आपल्याला मिळावे अशी सर्व देवांची इच्छा आहे. मृत्युलोक धन्य आहे, तेथील लोक भाग्यवान आहेत. काशीमध्ये मरण आले तर मुक्ती मिळते, पण या पंढरपुरात सर्व काही रोखीने इथेच मिळते. मग चिंता कशाची?

हा संपूर्ण अभंग वाचताना आपणही त्या वारीचाच एक भाग आहोत अशी भावना दृढ होते आणि देवाच्या द्वारी मुक्ती मिळाल्याचा पराकोटीचा आनंद मिळतो.

हे भू वरील वैकुंठ कसे आहे ते आता तुकारामांच्या वाणीतून ऐकूया.

जया दोषा परिहार/ नाही नाही धुंडीता शास्त्र/

ते हरती अपार/ पंढरपूर देखीलिया//

ज्या दोषांची प्रायश्चित्ते कोणत्याही शास्त्रात सापडत नाहीत, अशी पातके जरी हातून घडली तरी नुसत्या पंढरपुराच्या दर्शनाने ती नाहीशी होतात असा महिमा आहे.

धन्य धन्य भीमातीर/ चंद्रभागा सरोवर/

पद्म तिर्थी विठ्ठल वीर/ क्रीडा स्थळ वेणू नाद//

सकळ तीर्थांचे माहेर/ भू वैकुंठ निर्विकार/

नामाचा गजर/ असूर काळ कापती//

पंढरपूर हे भूतलीचे वैकुंठ आहे, सर्व तीर्थांचे जन्मस्थान आहे, तेथे कोणताही विकार नाही, तेथे हरी नामाचा गजर होतो त्यामुळे असुरांना, कळी काळाला कंप सुटतो.

नाही उपमा द्यावया/ समतुल्य आणिक ठाया/

धन्यवाद जया/ जे पंढरपूर देखती//

या क्षेत्राला दुसरी कशाचीही उपमा देता येत नाही. ज्यांना ज्यांना पंढरपूरचे दर्शन झाले, ते सर्व धन्य होत.

उपजोनी संसारी/ एक वेळ पाहे पा पंढरी/

महादशा कैची उरी/ देवभक्त देखीलिया//

जन्माला येऊन एकदा तरी पंढरीचे दर्शन घ्यावे. येथील पांडुरंग आणि भक्त पुंडलिक यांच्या दर्शनाने महापातके नष्ट होतात.

ऐसी विष्णूची नगरी/ चतुर्भुज नर नारी/

सुदर्शन घरटी करी/ रीघ न पुरे कळी काळा//

ते सुख वर्णावया गती/ एवढी कैची मज मती/

जे पंढरपुरा जाती/ ते पावती वैकुंठ//

अशी ही विष्णूची नगरी आहे. तेथील स्त्री-पुरुष चतुर्भुज संपन्न आहेत. सुदर्शन त्यांचे रक्षण करीत आहे, त्यामुळे काळाला इथे प्रवेश नाही. तुकाराम महाराज म्हणतात, अशा या पंढरपुराचे सुख वर्णन करण्याइतकी बुद्धी मजपाशी नाही. जे पंढरपुरास जातात त्याला वैकुंठप्राप्ती होते.

तुका म्हणे या शब्दांचा/ जया विश्वास नाही साचा/

तो अधम जन्मांतरीचा/ जया पंढरी नावडे//

त्यांचे असे म्हणणे आहे की या गोष्टींवर ज्यांचा विश्वास नाही आणि ज्यांना पंढरीची आवड नाही तो पूर्वजन्मीचा अधम होय.

तीर्थ केली कोटीवरी/ नाही देखिली पंढरी/

जळो त्याचे ज्यालेपण/ न देखेची समचरण//

योग याग अनंत केले/ नाही समचरण देखिले/

तुका म्हणे विठ्ठल पाई/ अनंत तीर्थे घडली पाही//

पंढरपूरचा महिमा महाराज सांगत आहेत. कोट्यावधी तीर्थयात्रा केल्या तरी ज्याने पंढरी पाहिली नाही त्याच्या जगण्याला काही अर्थ नाही

(आग लागो त्याच्या जगण्याला) कारण विटेवरी पांडुरंगाच्या समचरणांचे दर्शन ज्यांना लाभले नाही त्यांनी कितीही योगयाग केले तरी सारे व्यर्थ आहे. एका पांडुरंगाच्या चरणस्पर्शातच अनंत तीर्थे केल्याचे पुण्य आहे.)

क्रमशः… २७ 

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ॥ गंगालहरी॥ ☆ भाग – ४ – कवी : श्री जगन्नाथ पंडित ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ॥ गंगालहरी॥ ☆ भाग – ४ – कवी : श्री जगन्नाथ पंडित ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

श्लोक ३१ ते ४० 

श्ववृत्तिव्यासङ्गो नियतमथ मिथ्याप्रलपनं

कुतर्केश्वभ्यासः सततपरपैशुन्यमननम् ।

अपि श्रावं श्रावं मम तु पुनरेवं गुणगणा-

नृते त्वत्को नाम क्षणमपि निरीक्षेत वदनम् ॥ ३१॥

*
विशालाभ्यामाभ्यां किमिह नयनाभ्यां खलु फलं

न याभ्यामालीढा परमरमणीया तव तनुः ।

अयं हि न्यक्कारो जननि मनुजस्य श्रवणयो-

र्ययोर्नान्तर्यातस्तव लहरिलीलाकलकलः ॥ ३२॥

*

विमानैः स्वच्छन्दं सुरपुरमयन्ते सुकृतिनः

पतन्ति द्राक् पापा जननि नरकान्तः परवशाः ।

विभागोऽयं तस्मिन्नशुभमयमूर्तौ जनपदे

न यत्र त्वं लीलादलितमनुजाशेषकलुषा ॥ ३३॥

*

अपि घ्नन्तो विप्रानविरतमुशन्तो गुरुसतीः

पिबन्तो मैरेयं पुनरपि हरन्तश्च कनकम् ।

विहाय त्वय्यन्ते तनुमतनुदानाध्वरजुषा-

मुपर्यम्ब क्रीडन्त्यखिलसुरसम्भावितपदाः ॥ ३४॥

*

अलभ्यं सौरभ्यं हरति सततं यः सुमनसां

क्षणादेव प्राणानपि विरहशस्त्रक्षतहृदाम् ।

त्वदीयानां लीलाचलितलहरीणां व्यतिकरात्

पुनीते सोऽपि द्रागहह पवमानस्त्रिभुवनम् ॥ ३५॥

*

कियन्तः सन्त्येके नियतमिहलोकार्थघटकाः

परे पूतात्मानः कति च परलोकप्रणयिनः ।

सुखं शेते मातस्तव खलु कृपातः पुनरयं

जगन्नाथः शश्वत्त्वयि निहितलोकद्वयभरः ॥ ३६॥

*

भवत्या हि व्रात्याधमपतितपाखण्डपरिषत्

परित्राणस्नेहः श्लथयितुमशक्यः खलु यथा ।

ममाप्येवं प्रेमा दुरितनिवहेष्वम्ब जगति

स्वभावोऽयं सर्वैरपि खलु यतो दुष्परिहरः ॥ ३७॥

*

प्रदोषान्तर्नृत्यत्पुरमथनलीलोद्धृतजटा-

तटाभोगप्रेङ्खल्लहरिभुजसन्तानविधुतिः ।

बिलक्रोडक्रीडज्जलडमरुटङ्कारसुभग-

स्तिरोधत्तां तापं त्रिदशतटिनीताण्डवविधिः ॥ ३८॥

*

सदैव त्वय्येवार्पितकुशलचिन्ताभरमिमं

यदि त्वं मामम्ब त्यजसि समयेऽस्मिन्सुविषमे ।

तदा विश्वासोऽयं त्रिभुवनतलादस्तमयते

निराधारा चेयं भवति खलु निर्व्याजकरुणा ॥ ३९॥

*

कपर्दादुल्लस्य प्रणयमिलदर्धाङ्गयुवतेः

पुरारेः प्रेङ्खन्त्यो मृदुलतरसीमन्तसरणौ ।

भवान्या सापत्न्यस्फुरितनयनं कोमलरुचा

करेणाक्षिप्तास्ते जननि विजयन्तां लहरयः ॥ ४०॥

मराठी भावानुवाद – – 

सारमेय वृत्ती ठेवुन मी सैरभैर सर्वदा

असत्य भाषण कुतर्कामध्ये गर्क राहतो सदा

सज्जन दुर्जन चाड न ठेवुन करितो परनिंदा

नाम तुझे मी सदैव घेतो पाही मज एकदा ॥३१॥

*

सुंदर नेत्र आकर्ण जरी नाही तुला देखिले

लाभ न काही विशाल नयनी तन्वांग न पाहिले

तव लहरींचे सुरेल संगीत निनादूनी आले

कर्णांची अवहेलना तयांनी ना ऐकले ॥३२॥

*

द्युलोकी जाती पुण्यात्मे बसुन विमानात

पापि जनास स्थान असते केवळ नरकात

कृपेने तुझ्या गङ्गामाते पाप नष्ट होत

तुझा वास नाही तेथे जीवन अशूभ होत ॥३३॥

*

ब्रह्महत्या मद्यपी तथा सुवर्ण शर्विलक

गुरुपत्नीची अभिलाषा मनि असे घोर पातक

अंत्यकाळी परि विलीन होती तव प्रवाही माते

सुरांसि वाञ्छित मोक्षाचे पद प्राप्त होई त्यांते ॥३४॥

*

वियोगशस्त्राने घायळ त्याचा घेई प्राण

अलभ्य सुगंध पुष्पांमधला सदैव ने चोरून

वायूदेवे चंचल लहरी करी त्यांही पावन

पवित्र होती तव लाटांनी विश्वलोक तीन ॥३५॥

*

परोपकारासाठी जगती कितीक या जगतात

पावन आत्मे परलोकाची आंस मनी धरतात

इह-परलोक भार तुजवरी निःशंके सोपवी

जगन्नाथ सुखनिद्रा शांत निवांतशी घेई ॥३६॥

*

नीच पतित पाखंड्यांचे तू करी परित्राण

त्याग तयांचा करणे तुजला होते महाकठीण

पापाचरणी अतीव जडला मोह माझिया मनी

त्याग करणे अशक्य असतो स्वभाव सकल जनी ॥३७॥

*

नर्तन करता त्रिपुरारीच्या जटा जशा विखुरल्या

जटांवरी लहरींच्या तुझिया भुजा रुंद पसरल्या

गुंफेतुनी जलडमरू करतो ध्वनी मधुर सुरेल

शिवतांडव हे दुःख जगाचे खचीत हटवील ॥३८॥

*

विसंबुनीया आर्द्र दयेवर उभा तुझ्या पायाशी

त्यागशील जर मजशी माते घात विश्वासासी

त्रैलोक्यासी तव करुणेचा असे महाऽधार

निष्कपटी करुणेचा होइल उध्वस्त आधार ॥३९॥

*

अर्धांगिनी प्रेमाची वसते वामांगी शिवाच्या

सवति मत्सरे क्रोधित किरणे नयनातून उमेच्या

प्रकट जाहल्या जटेजटेतुन लहरी गङ्गेच्या

विजयी होवो लोभस लहरी देवी भागिरथीच्या ॥४०॥

– क्रमशः भाग चौथा  

कवी : श्री जगन्नाथ पंडित 

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९२ ☆ हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९२ ☆

हरियाली का निवेश : प्रकृति का चक्रवृद्धि प्रतिफल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

आषाढ़ की पहली फुहार के साथ ही धरती की गोद में सोए बीज जाग उठते हैं। सावन उन्हें हरियाली का आशीर्वाद देता है और भादों तक वे नवजीवन का उत्सव बन जाते हैं। यही ऋतु हमें सिखाती है कि प्रकृति में किया गया प्रत्येक निवेश समय के साथ चक्रवृद्धि होकर लौटता है।

पेड़-पौधों में लगाया गया श्रम, समय और प्रेम केवल एक पौधा नहीं उगाता, बल्कि शुद्ध वायु, शीतल छाया, वर्षा, उपजाऊ मिट्टी, पक्षियों का संगीत और आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य भी रचता है। धन का निवेश सीमित लाभ देता है, किंतु हरियाली का निवेश जीवन का विस्तार करता है। एक पौधा वर्षों बाद हजारों बीजों में बदलकर प्रकृति की संपदा को निरंतर बढ़ाता रहता है।

आषाढ़, सावन और भादों केवल ऋतुएँ नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और संवर्धन का संदेश हैं। यह समय हमें याद दिलाता है कि यदि आज हमने एक पौधा रोपा, तो उसका फल केवल हमें नहीं, उन पीढ़ियों को भी मिलेगा जिनसे हमारा कभी परिचय भी नहीं होगा। यही प्रकृति का सबसे बड़ा चक्रवृद्धि प्रतिफल है।

आइए, इस हरित ऋतु में केवल वृक्षारोपण का संकल्प ही न लें, बल्कि हर पौधे को अपने भविष्य की अमूल्य पूँजी मानकर उसका संरक्षण भी करें। क्योंकि प्रकृति का यही निवेश ऐसा है, जो कभी समाप्त नहीं होता—वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन, आशा और समृद्धि का ब्याज देता रहता है।

“धरती की सबसे समृद्ध तिजोरी बैंक का लॉकर नहीं, बल्कि वह मिट्टी है जिसमें प्रेम से रोपा गया एक पौधा आने वाले कल का वटवृक्ष बनकर पीढ़ियों को जीवन लौटाता है।”

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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