डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘कैसा नाता रे (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४९ ☆
☆ आलेख ☆ कैसा नाता रे (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
सन्त कहते हैं कि संसार के सारे नाते झूठे हैं, आदमी को मोक्ष के मार्ग से भटकाने का साधन हैं। यहां संसार को त्यागने वाले को सांसारिक ज़िम्मेदारियां निभाने वाले की तुलना में ज़्यादा इज़्ज़त और ज़्यादा महत्व मिलता है। जो सन्यासी होने की घोषणा करके संसार में ही जमे हैं और भक्तों की भीड़ जुटा रहे हैं उनके दरबार में बड़े-बड़े मंत्री, बड़े-बड़े अधिकारी माथा टेक रहे हैं। प्रश्न यह है कि जिसने संसार को छोड़ दिया वह सारी सांसारिक सुविधाएं क्यों ले रहा है? अपने को सन्यासी कहने वाले बहुत से बाबाओं की जीवन- शैली अमीरों वाली हो गयी है। कई बाबा धन के ढेर पर बैठे हैं। सन्यासी की जो छवि हमारे मन में बसी थी वह ध्वस्त हो रही है। हमारे मन में तो रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, रैदास की छवि बैठी है। आज के सन्यासियों से इनका कोई मेल नहीं बैठता।
हमारे धर्म में सन्यास को जीवन का चौथा आश्रम मानते हैं जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमों के बाद अन्त में आता है, लेकिन कई लोग युवावस्था में ही सन्यास ग्रहण कर रहे हैं। अब तो दस बारह साल के लड़के-लड़कियां भी सन्यास का मार्ग पकड़ रहे हैं। हमारे कानून के अनुसार अवयस्क ख़ुदमुख्त़ार नहीं होता, उसे अपने जीवन के बारे में किसी निर्णय के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन कई बालक-बालिकाएं समारोहपूर्वक सन्यास ग्रहण कर रहे हैं।
मुझे एक सन्यासी मिले थे जिन्होंने छात्र जीवन में ही मेडिकल कोर्स छोड़कर सन्यास ले लिया था। घर छोड़ने के बाद वे एक बार भी लौट कर नहीं गये थे, न माता-पिता, भाई बहनों की सुध ली थी। प्रमाणित होता है कि सन्यासी का दिल बहुत मज़बूत होता है।
निश्चय ही कोई व्यक्ति जब उससे स्नेह करने वाले, उसे जन्म देने वाले, उसका दीर्घकाल तक लालन-पालन करने वाले, उसे शिक्षा देने वाले लोगों से संबंध विच्छेद करता है तो उसकी दृष्टि किसी बड़े लक्ष्य पर रहती होगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अपने आत्मीय लोगों को आघात दिये बिना उस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती? वह ऊंचा लक्ष्य किस सीमा तक प्राप्त होता है, यह सन्यासी ही बता सकता है, लेकिन उसके समाज- विमुख होने के परिणाम साफ दिखायी पड़ते हैं।
इसी तरह एक ब्रह्मचारी को गृहस्थ से अधिक महत्व मिलता है। इसे समझना भी कठिन है क्योंकि प्रकृति ने पुरुष और स्त्री को ऐसे अंगों से संपन्न किया है कि वे मिलकर सृष्टि को नया जीवन देते रहें। मानव शरीर की रचना अद्भुत है, वह तिलिस्म से कम नहीं। सृष्टि को बढ़ाने की क्रिया में शामिल होने या न होने के लिए व्यक्ति स्वतंत्र है, लेकिन यह समझना कठिन है कि इस क्रिया से विरक्त रहने वाले को अधिक सम्मान कैसे मिल सकता है? एक शब्द ‘बाल ब्रह्मचारी’ भी अक्सर सुनने को मिलता है। इसे भी बूझना कठिन है क्योंकि बालक तो अपनी आयु के कारण ब्रह्मचारी होता ही है।
सन्यासी सामाजिक रिश्तों को कितना भी नकारें लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी भी व्यक्ति का जीवन समाज के बिना चल नहीं सकता। जीवन के बड़े भाग तक व्यक्ति समाज पर निर्भर रहता है और इसमें सन्यासी भी अपवाद नहीं हैं। मुझे एक ऐसे सन्यासी भी मिले थे जो पैसे का स्पर्श नहीं करते थे, लेकिन जब उन्हें मोतियाबिंद हुआ तो उन्हें एक शिष्य की मदद लेनी पड़ी। बीमार पड़ने पर सन्यासी को भी अस्पताल जाना पड़ता है। शहरों में बैठे भगवाधारी बड़े व्यवसाय चला रहे हैं और दिन भर उसका विज्ञापन भी कर रहे हैं। आज के सन्यासी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इन सन्यासियों का तर्क है कि उनके विलासितापूर्ण जीवन से कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि उनका पैसा समाज-सेवा में लग रहा है।
सन्यास के लिए अपनों से नाता तोड़ने वालों की बात करते हुए मुझे अपने गांव की एक स्त्री की याद आती है जो गांव में घूम-घूम कर चूड़ी बेचती थी। उसके जवान बेटे ने सन्यास ले लिया था और वह आसपास के गांवों में भटकता रहता था। दुखी मां रोज़ उसके लिए भोजन बनाकर उसे गांव गांव ढूंढ़ती रहती थी। विख्यात नर्मदा यात्री अमृतलाल वेगड़ की एक पुस्तक में एक मां-बेटे का प्रसंग आता है जो नर्मदा परिक्रमा पर निकले थे। एक मन्दिर में पहुंचकर अचानक पुत्र ने घोषणा कर दी कि वह सन्यास ले रहा है और लौटकर गांव नहीं जाएगा। परिणामत: मां वहीं फंस गयी। न वह पुत्र को छोड़ पा रही थी, न गांव की अपनी गृहस्थी को।
जो लोग रिश्तों की उपेक्षा करते हैं या उन्हें व्यर्थ समझते हैं उन्हें रिश्तों की अहमियत को समझने के लिए मनुष्य से अधिक पशुओं के जीवन को देखना चाहिए। मैंने टीवी पर एक दृश्य देखा जिसमें एक हिरनी और उसका शावक नदी पार कर रहे हैं। अचानक एक मगरमच्छ शावक की तरफ लपकता है और तभी वह मां दोनों के बीच में आ जाती है ताकि मगरमच्छ शावक के बजाय उसे ही अपना भोजन बना ले। एक और दृश्य में एक हिरनी के आगे उसका शावक चल रहा है कि दो बाघ आकर दोनों तरफ से हिरनी को पकड़ लेते हैं। हिरनी भागने के बजाय वहीं रुक जाती है ताकि उसका शावक दूर निकल जाए। रिश्तों का ताना-बाना ऐसा ही होता है।
कवि रहीम ने समझदारी की बात कही— ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय’, लेकिन बहुत से लोग अपना जन्म सुधारने के लिए ऐसे ही प्रेम के धागों को तोड़ते हैं। विचार करना ज़रूरी है कि क्या सही है और क्या ग़लत।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





