श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “पितरों की स्मृति में…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०० ☆

☆ पितरों की स्मृति में… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

पितृपक्ष चल रहा है। क्वार का यह समय आश्विन मास के नाम से भी जाना जाता है। वर्षा ऋतु की हरियाली अभी धरती पर बनी हुई है और पेड़-पौधे नई ऊर्जा से भरे दिखाई देते हैं। ऐसे समय में यदि हम अपने पूर्वजों की स्मृति को किसी जीवंत रूप से जोड़ना चाहें, तो एक पौधा लगाना और उसकी सेवा करना कितना सुंदर संकल्प हो सकता है।

हमारी भारतीय परंपरा में वृक्षों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवतुल्य सम्मान दिया गया है। पीपल और बरगद जैसे वृक्षों की पूजा और उनकी सेवा की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इन वृक्षों के नीचे बैठना, उन्हें जल अर्पित करना और उनकी छाया में कुछ समय बिताना हमारे जीवन में प्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव जगाता है।

पितृपक्ष में हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनके दिए संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। ऐसे में उनके नाम से लगाया गया एक पौधा उस स्मृति को जीवंत रखने का माध्यम बन सकता है। पौधा छोटा होगा, लेकिन उसके साथ जुड़ा भाव बहुत बड़ा—आज हम उसे सींचेंगे, कल वह छाया देगा, फूल देगा, फल देगा और आने वाली पीढ़ियों को जीवन देगा।

शायद यही पूर्वजों को सच्ची श्रद्धांजलि भी है—उनकी स्मृति में ऐसा जीवन रोपना, जो हमारे बाद भी चलता रहे।

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जिनसे जीवन चलता जाता, उनका शुभ आशीष रहे।

दीप जलाएं प्रेमभाव से, मंगलमय हर ईश रहे।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल जाएँ, संस्कारों के साथ रहे।

उनके चरणों में श्रद्धा से, झुकता नित प्रति माथ रहे।।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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