डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘कैसे छोड़ दूं यह दुनिया (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५१ ☆
☆ आलेख ☆ कैसे छोड़ दूं यह दुनिया (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
यह हिन्दी के वरिष्ठ कवि मलय की एक कविता का शीर्षक है। मलय जी की कविता का संदर्भ तो दूसरा है, लेकिन यह पंक्ति संसार के ज़्यादातर मनुष्यो की भावना को प्रतिध्वनित करती है। यह सच है कि आदमी ज़िन्दगी को कितना ही कोसे, लेकिन ज़्यादातर लोग मरना नहीं चाहते। मृत्यु की कल्पना भय पैदा करती है, सिहराती है। यह विचार विचलित करता है कि यह विविधताओं से भरी, रंग-बिरंगी दुनिया एक दिन पूरी तरह छूट जाएगी। सन्त भले ही उपदेश देते रहें— ‘अरे मन मूरख जनम गंवायो,ये संसार फूल सेमर को, सुन्दर देखि लुभायो’, लेकिन इस सेमर के फूल को कोई छोड़ना नहीं चाहता।
विज्ञान की तरक्की के साथ कुछ समर्थ, संपन्न लोगों के मन में उम्मीद जागी है कि एक दिन यह संभव हो जाएगा कि मृत मनुष्य को पुनः जीवित किया जा सके। यानी मृत्यु का अन्त हो जाएगा और मनुष्य देवताओं की तरह अमर हो जाएगा। इसीलिए दुनिया के कुछ अति-संपन्न लोग ऐसी कंपनियों में भारी निवेश कर रहे हैं जो मनुष्य को अमर बनाने के उपक्रम में लगी हैं।
अमर होने की उम्मीद में कई संपन्न लोगों ने अपने शरीर को मृत्यु के बाद क्रायोजेनिक तकनीक से सुरक्षित करवा दिया है। संसार के 500 से ज़्यादा लोग इस तकनीक से अपने शवों को सुरक्षित करवा चुके हैं। हज़ारों लोग भविष्य के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। इस तकनीक में शरीर को -196 डिग्री सेल्सियस के तरल नाइट्रोजन में संरक्षित किया जाता है। एक शव को संरक्षित करने का व्यय 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक आता है। इस प्रक्रिया में पहले व्यक्ति का संरक्षण 1967 में किया गया था। कुछ लोग पूरे शरीर के बजाय सिर्फ दिमाग को संरक्षित कराते हैं, इस उम्मीद के साथ कि पुनः जीवित होने पर उसे नये शरीर या अन्य नेटवर्क में ‘लिंक’ किया जा सकेगा। सिर्फ दिमाग को संरक्षित करने में 60-70 लाख रुपये खर्च आता है।
फिलहाल अमरता के नुस्खे की खोज की कोई संभावना नहीं दिखती, इसलिए सवाल उठता है कि अगर इस नुस्खे की खोज में सौ वर्ष लग गये तो इन सोये हुए लोगों के जागने पर उन्हें दुनिया कैसी लगेगी? क्या वे दुनिया को पहचान सकेंगे या दुनिया उन्हें पहचान सकेगी? मुझे अमेरिकी लेखक वाशिंगटन इरविंग की कहानी ‘रिप वान विंकिल’ याद आती है जिसमें कथा का नायक ऐसा सोया कि बीस साल बाद जागा। इस बीच उसकी दुनिया बदल चुकी थी। पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और बेटे जवान हो गये थे। मतलब यह कि वह अपनी दुनिया में अजनबी हो गया। सौ साल बाद जागने वालों के लिए दुनिया और अधिक अजनबी हो जाएगी।
मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने एक जगह लिखा कि जब हम अपने गांव को छोड़ देते हैं तो कुछ वक्त तक वह हमारा इंतज़ार करता है, फिर वह भी उठकर कहीं चल देता है। उनका एक दोहा है— ‘घर को खोजें रात दिन, घर से निकले पांव; वो रस्ता ही खो गया जिस रस्ते था गांव।’ जो लोग शहर की चमक-दमक के लिए अपना गांव छोड़ देते हैं, गांव भी कुछ वक्त बाद उन्हें छोड़ देता है।
प्राचीन मिस्र में शवों की ममी बनाने का रिवाज़ था, लेकिन उसका उद्देश्य शव को पुनर्जीवित करना नहीं था। ममी बनाने में दिल को छोड़कर शव के सभी भीतरी अंग निकाल दिये जाते थे। मस्तिष्क भी निकाल दिया जाता था। दिल को बुद्धि और आत्मा का केन्द्र माना जाता था, इसलिए उसे ‘फ़ाइनल जजमेंट’ के लिए ज़रूरी समझा जाता था। यह प्रथा 2600 ई. पू. से लेकर लगभग 3000 वर्ष तक चली और इस काल में लगभग सात करोड़ ममी का निर्माण हुआ, जिनमें लगभग 10 लाख पशुओं के ममी थे।
आदमी अगर भविष्य में अमर हो गया तो दुनिया और समाज की क्या सूरत बनेगी? जब करीब सौ साल तक सोये लक्ष्मीपुत्र जागेंगे तब उनकी तीन-चार पीढ़ियां दफ़्न हो चुकी होंगीं और वे दुनिया में किसी को पहचानने की स्थिति में नहीं होंगे, न कोई उन्हें पहचानेगा। वे अपनी अपनी हाथी दांत की मीनार में अमरता का सुख लेंगे। भारत जैसे देश में संपत्ति के झगड़े बढ़ेंगे क्योंकि जब दादाजी मरेंगे ही नहीं तो उनकी संपत्ति में से बेटों, पोतों, पड़पोतों, पड़पड़पोतों को क्या मिलेगा? तब संयुक्त परिवारों का सवाल ही नहीं रहेगा। पारंपरिक लक्ष्मीपुत्रों के अलावा रिश्वतखोरों, भ्रष्टाचारियों की बन आएगी क्योंकि वे तुरंत अमरता के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे। पाप की सज़ा पाने का डर ख़त्म हो जाएगा और पाप करने में समर्थ लोग खुलकर अपनी प्रतिभा दिखा सकेंगे।
तब फांसी की सज़ा की धारा ख़त्म हो जाएगी क्योंकि लटकाने पर भी अपराधी की जान नहीं निकलेगी। श्मशान और कब्रिस्तान का झगड़ा ख़त्म हो जाएगा। बाबाओं, पुरोहितों का धंधा मंदा हो जाएगा तथा मंदिरों में भीड़ कम हो जाएगी। बागेश्वर वाले बाबा का भूत भगाने वाला मेला बंद हो जाएगा। यमराज के सेवकों का प्राण खींचने का काम बंद हो जाएगा, परिणामत: वे बेकार हो जाएंगे। ‘अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे’ जैसे शेर और ‘मर गये हम जीते जी मालिक तेरे संसार में’ जैसे फिल्मी गीत लिखना बंद हो जाएगा। महिलाओं को करवा चौथ और तीजा जैसे कठिन व्रत करने की ज़रूरत नहीं रहेगी। बहू-दहन का अंत होगा। दुनिया ‘अमर’ और ‘मरणशील’ के बीच बंट जाएगी
कालांतर में यदि क्रायोजेनिक तकनीक दुनिया में ज़्यादातर वर्गों के लिए सुलभ हो गयी तो अमर लोगों से दुनिया भर जाएगी। आदमी के लिए ज़रूरी साधनों का सत्यानाश होगा। पर्यावरण की स्थिति कैसी बनेगी, कह पाना कठिन है। हमारे शहरों की पहले से ही ख़स्ता हालत और बिगड़ेगी। दुनिया में अराजकता की स्थिति बन सकती है। हो सकता है कि संसार के ‘अल्ट्रा रिच’ दूसरे ग्रहों पर बसने का बंदोबस्त करें।
परिवार के सदस्य कैसे एक दूसरे के लिए अजनबी हो जाते हैं इसके संबंध में विदेश की एक घटना याद आती है। एक व्यक्ति के बाल-बच्चे बड़े होने पर दूसरे शहर चले गये और यह व्यक्ति बुढ़ापे में उस शहर में अकेला रह गया। कुछ समय बाद बूढ़े के नाम एक लॉटरी खुल गयी और वह पैसे वाला हो गया। संपन्नता ने बूढ़े के मन में विवाह की इच्छा पैदा की। उसने विवाह के लिए विज्ञापन दिया और कई लड़कियों ने उसकी दौलत को देखकर उससे संपर्क किया। अंततः एक लड़की के साथ बात बन गयी और उनका विवाह हो गया। कुछ समय बाद पारिवारिक एलबम पलटते हुए दोनों को ज्ञात हुआ कि नयी पत्नी वास्तव में उसकी सगी पोती है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ऐसी ही स्थितियां आदमी के अमर होने पर सामने आ सकती हैं।
आदमी के अमर होने पर दुनिया में क्या क्या गुल खिलेंगे यह आगे देखने की बात है। ‘आगे आगे देखिए होता है क्या’।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



