श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९७ ☆ देश-परदेश – Global Hand Washing Day:15 Oct. ☆ श्री राकेश कुमार ☆
अब हाथ धोने के लिए भी विश्व स्तर पर मुहिम चल रहीं है। बाल्यकाल से घर में प्रवेश के तुरंत बाद हाथ पैर धोने के पश्चात ही भोजन ग्रहण कर सकते थे। सफाई और हाइजिन हमारे समाज की परम्परा रही है। पूर्व में चूल्हे की राख या मिट्टी से ही हाथ धोए जाते थे। अब ना तो चूल्हा है, और पक्के घरों में तो मिट्टी भी नसीब नहीं होती है। नवाब लोग बिस्तर/ कुर्सी आदि पर बैठे हुए ही सेवक के द्वारा हाथ धुलाया जाता था। इस कार्य में संलग्न सेवक को भी हाथ धो कर ही ये कार्य करना पड़ता था।
आज के समय में साबुन, शैंपू और ना जाने कितने आइटम बाजार में हाथ धोने के लिए उपलब्ध हैं। आने वाले समय में दिन और रात में अलग अलग तरह के साबुन आदि सिर्फ हाथ धोने के लिए आ जायेंगे। अभी तक तो शरीर की स्किन के अनुसार ही इनकी उपलब्धता है, सुखी त्वचा हो या तैलीय त्वचा सबके अलग तरह के लिक्विड बाजार में आपकी जेब को हल्का कर देंगे। सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु के अनुसार भी इनका वर्गीकरण होता है। बच्चों और बड़ों के लिए भी अलग प्रकार की वैराइटी अब आम बात है।
कोविड काल के समय तो इनका चलन इतना बढ़ गया था, कि सब्ज़ी भी कई बार धो कर उपयोग होती थी। उस समय घर, दुकानों प्राय सभी स्थानों पर “हैंड मोसराइजर” कंपलसरी था। जिन्होंने ऐसा नहीं किया, वो हाथ मलते रह गए।
लाइफबॉय, डेटॉल आदि तरल रूप में अपने आप को कीटाणुओं को 99% समाप्त करने की बात करते है, 1% यदि भूल चूक हो जाय उसका मार्जिन है।
हाथ धोने के बाद “हैंड टॉवल” का उपयोग वर्षों पुराना हो चुका है। विदेश में तो हाथ धोने के बाद कागज़ का उपयोग होता है। सार्वजनिक स्थानों पर “ड्रायर” की सुविधा रहती है। ग्रामीण क्षेत्र के लोग तो कांधे पर एक गमछा दिन भर लटकाए रखते हैं। दिन भर उसी से पसीना और हाथ पोछना चलता रहता है। गर्मी की लू या वर्षा के समय में भी काम आता हैं।
कोविद काल में अनेक लोगों ने सब कुछ गवां दिया था, या ये भी कह सकते हैं, कि बुरे काल में कुछ लोग “हाथ धो बैठे” थे।
हमने तो अभी तक ये ही सुना था, “हाथ धो के पीछे पड़ जाना” अब आप लोग कहेंगे कि आज हम भी हाथ धोकर, हाथ धोने के पीछे पड़ गए हैं। जब पूरा विश्व आज हाथ धो रहा है, तो हम क्यों ना धोए।
© श्री राकेश कुमार
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