डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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ऋषि परंपरा से वैश्विक मंच तक: 21 जून और एक सूत्र में बंधती दुनिया
प्राचीन भारतीय धरोहर से वैश्विक कल्याण तक: ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संकल्प को साकार करता 12वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
“वर्मा जी, आज पार्क में इतनी भीड़ क्यों है?”
सुबह की सैर करते हुए शर्मा जी ने पूछा।
“अरे भाई, आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देखिए, बच्चे भी आए हैं, युवा भी और बुजुर्ग भी।”
शर्मा जी कुछ देर तक लोगों को योग करते हुए देखते रहे। फिर मुस्कुराकर बोले, “अद्भुत बात है। हजारों साल पहले हमारे ऋषियों ने जंगलों और आश्रमों में जो साधना की थी, आज वही पूरी दुनिया को जोड़ रही है।”
वर्मा जी ने सहमति में सिर हिलाया।
“यही तो भारत की सबसे बड़ी देन है। ऐसा ज्ञान जो किसी एक देश, जाति या धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है।”
उनकी बात सुनकर मन अनायास ही उस भारत की ओर चला जाता है, जहाँ ऋषि-मुनियों ने जीवन को केवल जीने का नहीं, बल्कि समझने का प्रयास किया। उन्होंने शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने की जो विधि खोजी, वही आगे चलकर योग के रूप में विश्व को मिली।
आज जब दुनिया 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाती है, तो यह केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं होता। यह उस सांस्कृतिक विरासत का उत्सव होता है जिसने मानवता को जोड़ने का मार्ग दिखाया है।
योग का अर्थ ही है – जोड़ना।
शरीर को मन से जोड़ना।
मन को आत्मा से जोड़ना।
और व्यक्ति को समस्त सृष्टि से जोड़ना।
शायद यही कारण है कि योग की यात्रा आश्रमों से शुरू होकर आज वैश्विक मंच तक पहुँच चुकी है।
वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारत के प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन देते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। इसके बाद से हर वर्ष दुनिया के कोने-कोने में लाखों लोग एक साथ योग का अभ्यास करते हैं। यह दृश्य केवल स्वास्थ्य जागरूकता का नहीं, बल्कि वैश्विक एकता का भी प्रतीक है।
भारत की संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” के दर्शन को मानती रही है।
अर्थात् पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
आज जब दुनिया युद्धों, तनाव, मानसिक असंतुलन, अकेलेपन और जीवनशैली जनित रोगों से जूझ रही है, तब योग इस दर्शन को व्यवहार में बदलने का माध्यम बनकर सामने आया है।
योग किसी सीमा में बंधा हुआ विचार नहीं है।
न यह किसी धर्म का प्रचार है और न किसी विशेष वर्ग का अधिकार।
यह तो जीवन को संतुलित बनाने की सार्वभौमिक कला है।
इसी भावना को और अधिक अर्थपूर्ण बनाती है वर्ष 2026 के 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम –
“स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” (Yoga for Healthy Ageing)।
यह विषय केवल लंबी उम्र की बात नहीं करता।
यह स्वस्थ, सम्मानजनक और सक्रिय जीवन की बात करता है।
आज चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ा दी है। लोग पहले से अधिक वर्षों तक जीवित रह रहे हैं। लेकिन क्या वे उतने ही स्वस्थ और आत्मनिर्भर भी हैं?
यही प्रश्न आज पूरी दुनिया के सामने है।
बढ़ती उम्र के साथ गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्मृति ह्रास, तनाव और अकेलापन जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने का माध्यम बनकर उभरा है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि नियमित योगाभ्यास शरीर की लचक बनाए रखने, संतुलन सुधारने, रक्तचाप नियंत्रित करने और मानसिक तनाव को कम करने में अत्यंत प्रभावी है। प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है, ध्यान मानसिक शांति देता है और योगासन शरीर को सक्रिय बनाए रखते हैं।
लेकिन योग की सबसे बड़ी शक्ति उसके शारीरिक लाभों से भी आगे है। आज का मनुष्य पहले से अधिक सुविधासंपन्न है, फिर भी भीतर से बेचैन है।
हमारे पास संवाद के अनेक साधन हैं, लेकिन संवाद कम होते जा रहे हैं।
हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मज्ञान कम होता जा रहा है।
हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन स्वयं से दूर होते जा रहे हैं।
योग हमें इसी खोए हुए संतुलन की ओर वापस ले जाता है।
महर्षि पतंजलि ने कहा था – “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों को शांत करना ही योग है।
यह सूत्र आज उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।
जब हम कुछ क्षणों के लिए अपनी साँसों पर ध्यान देते हैं, तो हम वर्तमान में लौट आते हैं।
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हम स्वयं से मिलते हैं।
और जब हम स्वयं से जुड़ते हैं, तभी दूसरों से भी सही अर्थों में जुड़ पाते हैं।
यही योग का आध्यात्मिक पक्ष है।
यही उसकी वैश्विक शक्ति है।
योग हमें सिखाता है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है।
जीवन संतुलन का नाम है।
सफलता का भी महत्व है, लेकिन शांति का भी।
प्रगति आवश्यक है, लेकिन स्वास्थ्य भी।
भौतिक समृद्धि जरूरी है, लेकिन मानसिक संतोष भी।
आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा।
परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा।
और समाज स्वस्थ होगा तो विश्व में शांति और समरसता का मार्ग प्रशस्त होगा।
अंततः 21 जून केवल एक तिथि नहीं है। यह हमें अपनी जड़ों की याद दिलाने वाला दिवस है।
यह हमें बताता है कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर सकती है।यह हमें विश्वास दिलाता है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर संतुलन, करुणा और जागरूकता का दीप जलाएँ।
क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तब परिवार जुड़ता है। जब परिवार जुड़ते हैं, तब समाज जुड़ता है।
और जब समाज जुड़ते हैं, तब सचमुच पूरी दुनिया एक सूत्र में बंध जाती है।
यही योग का संदेश है। यही भारत की विरासत है और यही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का साकार रूप है।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






