श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ढ, ढक्कन का…“।)
अभी अभी # ११०३ ⇒ आलेख – ढ, ढक्कन का
श्री प्रदीप शर्मा
हमारी गीता प्रेस वाली बाल भारती भाग १,जो अमर घर चल से शुरू होती थी,उसमें अक्षर ज्ञान भी था,स्वर और व्यंजन भी थे, और बारहखड़ी भी थी । अ,आ,इ,ई और क,का,कि, की ,का कक्षा में समवेत पाठ,वेद की ऋचाओं की तरह होता था ।
ट गण और भ गण बड़ा रोचक होता था । ट,टा,टि,टी, टं टः पर,और भ,भा,भि,भी सीधा भौ,भं,भः पर जाकर रुकता था । अक्षर ज्ञान किसी वस्तु अथवा व्यक्ति की तस्वीर से शुरू होता था । अ के नीचे एक अनार बना होता था,और उ के नीचे एक उल्लू ।।
सरकारी स्कूल में टाटपट्टी पर बैठकर जब अ अनार का,आ,आम का,इ इमली और अं अंगूर का बोलते थे,तो मानो सभी फलों का स्वाद मिल जाता था । ककड़ी, तरबूज और खरबूज भले ही खाने को न मिले,इनका अक्षर ज्ञान तो हो ही जाता था ।।
एक सङ्गीत के शिक्षक ने रिटायरमेंट के बाद पाठ्य पुस्तक लिख मारी ! जो त्,तरबूज का था, उसे तबले का कर दिया, अच्छा भला स सड़क का था,उसे स सारंगी का कर दिया । जो ग गधे का था ,वह गणेश जी का हो गया ।केवल क तब भी कमल का था, आज भी कमल का ही है ।
बच्चों को तो अक्षर ज्ञान से मतलब है । फिर भले ही ढ ढक्कन का हो या ढपली का ।
वैसे भी अक्षर ज्ञान और व्याकरण से होता क्या है । ज़िन्दगी में जो आगे बढ़ गया वह इंसान बन गया और जो पिछड़ गया वह ढ ढक्कन का ।।
इंसान हो या कोई वस्तु,उसे ढँकना ज़रूरी होता है । हम अपना शरीर वस्त्रों से ढँकते हैं,और खाने पीने की वस्तुओं को ढँककर रखते हैं, ताकि उसमें धूल और मक्खी-मच्छर न गिरे । यह जिम्मेदारी एक ढक्कन ही निभाता है ।
एक समय था, हर पेन का एक ढक्कन होता था ! अगर कोई आपसे पेन माँगता है और आप उदारतापूर्वक उसे झट से अपना पेन निकालकर दे देते हैं,तो उसके वापस आने की संभावना क्षीण हो जाती है । आप ढक्कन अपने पास रखिये, पेन जहाँ भी होगा, खुद चलकर आएगा । बिना ढक्कन के पेन की ज़िंदगी भी क्या ज़िन्दगी ।।
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© श्री प्रदीप शर्मा
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