श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुक्ति और ऋणमुक्ति…“।)

?अभी अभी # १११२ ⇒ आलेख – मुक्ति और ऋणमुक्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आदमी स्वतंत्र पैदा हुआ था, लेकिन हर जगह जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ” रूसो “

The man was born free, but everywhere in chains. (Rousseau)

हम एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, हमें अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है, अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की छूट है, अपनी मर्जी अनुसार खाएं, पीएं, मौज़ करें। किसी का एक कौड़ी का हम पर कोई कर्जा नहीं, न उधो का लेना, न माधो का देना।

पंछी बनूं, उड़ता फिरूं मस्त गगन में,

आज मैं आजाद हूं, दुनिया के चमन में।

फिर हम पर कैसा बंधन, कैसा कर्ज़, और कैसी मुक्ति!  क्या कोई किसी की आत्मा को कैद कर पाया है। सात तालों में कृष्ण का जन्म होता है, जो दुनिया को मुक्ति का मार्ग सुझाता है, मर कर भी अमर होते हैं शहीद, स्वतंत्रता सेनानी, घुट घुटकर तो सिर्फ कायर ही जीते हैं। जहां संघर्ष में सृजन होता हो, कोई महर्षि अरविंद जेल में रहकर सावित्री जैसे महाकाव्य की रचना करता हो, वही सच्चे अर्थ में मुक्त है, उन्मुक्त है, समय, काल और परिस्थिति भी उसके आगे नतमस्तक है।।

आज हम मुक्त हैं, स्वतंत्र हैं, आजाद हैं, हम पर कौन सा कर्ज है, जो हम इतने परेशान हैं ? आप नहीं जानते। पिछली सरकार खजाना खाली छोड़ गई और देश पर इतना कर्ज छोड़ गई, जिसे चुकाने में हमें नानी याद आ गई। हमारा वादा है, हम आपको और इस देश को न केवल कर्जमुक्त करेंगे, बल्कि देश का भंडार भी भरेंगे। स्वर्ण युग वापसी पर है, रामराज्य की वापसी तय है। बस ठंड रखें।

चलो देश की चिंता से भी आप मुक्त। अब जब आप पैदा हुए तो न केवल अपने माता पिता के ऋणी हुए, अपने नामकरण के साथ ही अपने कुल कुटुंब और पितरों का ऋण भी आप पर आ गया। इतना ही नहीं, यह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के भी आप ऋणी हो गए। स्वर्ग में बैठे देवता और ग्रह नक्षत्र भी आपको नहीं छोड़ने वाले। उनके लिए यज्ञ, हवन, दान पुण्य करें, उन्हें आहुति दें, उन्हें संतुष्ट करें। और अगर नहीं किया तो ? पड़े रहें, कर्ज में, बंधन में, कभी इस मंदिर तो कभी उस घाट। कभी काल सर्प तो कभी पितृ दोष। बस श्राद्ध पक्ष आया ही समझो। बिना ऋण मुक्ति के भी कहीं मुक्ति हुई है। सबको तृप्त करो, खीर पूड़ी खाओ खिलाओ, नो ड्यूज सर्टिफिकेट पाओ।।

क्या कहा, आपने इन सबका ठेका नहीं लिया। हमारा दर्शन चार्वाक दर्शन है। देश का एन .पी .ए. बढ़े तो बढ़े, हम तो कर्ज लेकर घी पियेंगे और विदेशों में अपना माल्यार्पण करवाएंगे।

स्विस बैंक में हमारा नाम है।

हम देश के कानून को मानते हैं, ईश्वर और अदालतों के न्याय पर हमें भरोसा है। वहां देर है अंधेर नहीं।

हम यह भी जानते हैं कि हमारा पाप का घड़ा भर चुका है, लेकिन हमने कुशलतापूर्वक घड़े में छेद कर दिया है। न पाप का घड़ा कभी भरेगा, और ना कभी हम पर न्याय का डंडा पड़ेगा। कई एन.जी.ओ. भी खोल रखे हैं, ट्रस्ट हैं, आश्रम हैं, धर्मशालाएं, टी. वी.चैनल और आय.टी.कंपनीज हैं हमारे नाम। हमारे ही सांसद हैं, हमारे ही धर्मगुरु, कहां से करें शुरू!  हम इस हाथ दान देते हैं, उस हाथ अनुदान भी ले लेते हैं। हम इस देश के ऋणी हैं, यहां की जनता के ऋणी हैं। निष्काम कर्म कर रहे हैं। तेरा तुझको अर्पण। हमें मुक्त होने से तो ईश्वर भी नहीं रोक सकता।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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