श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मक्खन भैया…“।)
अभी अभी # १११५ ⇒ आलेख – मक्खन भैया
श्री प्रदीप शर्मा
हमारे देश में जब राबड़ी देवी, जलेबी बाई और इमरती देवी हो सकती है तो क्या मक्खन भैया नहीं हो सकते। रक्षाबंधन का पवित्र शब्द भाई, जब एक बार मुंबई पहुंच जाता है, तो कभी यह मुन्नाभाई हो जाता है तो कभी सिर्फ भाई! बड़ा वजनदार शब्द हो जाता है यह भाई। मुंबई से भाईगिरी का डिप्लोमा लेने के बाद, कोई भी भाई अक्खा मुलक में अपनी दादागिरी का डंका बजा सकता है। श्याम से कहना छेनू आया था, समझ गए आप, या शुद्ध हिंदी में समझाना पड़ेगा।
मुझे जब भी बाल दिवस मनाना होता है, मैं मक्खन भैया के पास चला जाता हूं। इंदौर भी मुंबई का बेटा ही कहलाता है। यहां भैयाओं का स्टार्स चलता है। जानकीलाल भैया अगर अपनी साड़ी की दुकान चलाते हैं, तो बड़े भैया और कृपा भैया अपनी राजनीति। यहां तो भैया, सभी काम प्रेम से होते हैं, यहां तक कि हजामत भी।।
लोग मन्नत के बाद अपने बाल देने कभी तिरुपति बालाजी जाते हैं तो कभी मेहंदीपुर के बालाजी। पसंद अपनी अपनी, विश्वास अपना अपना। अगर कोरोना काल को छोड़ दिया जाए, तो एक आम भारतीय आज भी इतना स्वावलंबी नहीं हुआ, कि अपनी हेयर कटिंग खुद ही कर ले। अपने आप पर हजामत के लिए उस्तरा चलाना आसान है, लेकिन अपने बालों पर इस तरह कैंची चलाना मुश्किल है कि आप अपने ही सर के बाल काट लें।
बहुत फर्क होता है अपने सर के बाल नोंचने और कटवाने में। इसीलिए मैं गांधी हॉल के सामने, शास्त्री मार्केट में, मक्खन भैया के कोमल हाथों द्वारा अपने बाल कटवाना ही उचित समझता हूं। यों तो यह बाल दिवस मंगलवार को छोड़कर कभी भी मनाया जा सकता है, लेकिन अगर छुट्टी का दिन रविवार हो, तो यह पर्व बाल बच्चों सहित भी मनाया जा सकता है।।
यह मस्तक यूं ही किसी के सामने नत-मस्तक नहीं होता। यहां विश्वास होता है, वहीं प्रेम से हजामत करवाई जाती है। जबान और कैंची एक साथ चलाना भी एक कला है।
कैंची तो खैर एक दर्जी भी कपड़ों पर चलाता है, लेकिन वह खामोश होकर जेब काटता है। अगर कपड़ा गलत कट गया, तो समझो गला गया।
जो जूने इंदौरी हैं उनकी अपनी अपनी पसंद की दुकानें हैं। उनके अपने दर्जी हैं, अपना हेयर कटिंग सैलून है, उनका अपना अखबार है, अपनी कार, बीवी और मकान ही नहीं, अपना होटल है, अपना स्वीट्स है। यहां सभी अपने हैं।।
जहां बाल है, वहां अपनी अपनी हेयर स्टाइल है।
कभी युवाओं के लिए देवानंद कट था तो युवतियों के लिए साधना कट। कटी पतंग वाले काका, और एंग्री यंग मैन बालों को कानों के नीचे तक ले आए। हमारे बाल बाल, और उनकी ये रेशमी जुल्फें। लेडीज और जेंट्स टेलर ही नहीं, सबके अपने अपने ब्यूटी पार्लर। हम किसी से कम नहीं।
बाल सबके झड़ते हैं, सबके सफेद होते हैं। पुरुष का भाग्य कौन जान पाया! क्या हर गंजा पुरुष भाग्यशाली होता है। केश विन्यास के सुख पर वैसे तो महिलाओं का ही कॉपी राइट है, फिर भी आज की काली दाढ़ी वाले अधिकांश युवाओं के आदर्श दो सफेद दाढ़ी वाले दो भद्र पुरुष ही हैं। एक बाल नरेंद्र और दूसरे जी हां, कौन बनेगा करोड़पति। आज की बालसभा समाप्त।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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