श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विशिष्ट, प्रसिद्ध, महान…“।)
अभी अभी # ११२० ⇒ आलेख – विशिष्ट, प्रसिद्ध, महान
श्री प्रदीप शर्मा
मनुष्य की तीन अवस्थाएं मानी गई हैं, बचपन, जवानी और बुढ़ापा। और तीन ही उसकी मूलभूत आवश्यकताएं भी हैं, रोटी, कपड़ा और मकान। जब वह इन तीनों से ऊपर उठ पाता है, तो जीवन में कुछ कर पाता है। सबसे पहले उसे आम से खास होना पड़ता है, समाज में अपना महत्व, अपनी पूछ परख बढ़ाना पड़ता है, कुछ विशेष करना पड़ता है, विशिष्ट बनना पड़ता है।
जब उसकी एक पहचान बन जाती है, तब वह प्रसिद्ध हो जाता है, उसका नाम हो जाता है। बस यहीं से उसके महान बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
इस यात्रा के लिए उसे बचपन से जवानी और जवानी से बुढ़ापे तक का सफर तय करना पड़ता है।
कहीं कहीं तो किसी विशिष्ट कार्य की उपलब्धि के कारण उसे बचपन में ही प्रसिद्धी मिल जाती है, लेकिन बचपन में कहां कौन महान बन पाता है।
बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, धूप में बाल सफेद करने पड़ते हैं, तब जाकर कोई व्यक्ति महानता की सीढी पर कदम रख पाता है। बड़ी कठिन है डगर, महानता की।
आइए, कुछ विशिष्ट, कुछ प्रसिद्ध और कुछ महान लोगों से मिलें, उनके सफलता के सफर के हमसफर बनें। एक महान लेखक, कलाकार, फिल्मी हस्ती, राजनीतिक हस्ती और धार्मिक हस्ती को कितने लोग जानते हैं। कभी मैने एक किताब पढ़ी थी, दुनिया के सौ महान लोग। उनमें से आज सिर्फ कुछ ही याद हैं। अशोक महान तो थे ही। गौतम बुद्ध और गांधी के अलावा नेपोलियन, और स्वामी विवेकानंद भी उनमें शामिल थे। वैसे यह आपकी मर्जी है, आप किसे महान मानें और किसे एक आम इंसान।।
उपन्यास सम्राट प्रेमचंद और शरद्चंद्र की महानता में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। वैसे आजकल महान शब्द इतना आम हो गया है कि- महान कवि, लेखक, साहित्यकार, गीतकार, संगीतकारऔर राजनेताओं की तो लाइन ही लग चुकी है। कहीं कहीं तो जब वह महान बनने के पहले ही इस संसार से विदा ले लेता है तो अमर हो जाता है।
बहुत श्रद्धा है हम लोगों में दिवंगत आत्माओं के प्रति।
वैसे जन्म से कोई नायक नहीं होता लेकिन बोलचाल की भाषा में, एक नायक पैदा हुआ, उसने फिल्मों में संघर्ष किया, सफल असफल भी हुआ और लोगों ने अन्तत: महानायक का खिताब दिया। आज अस्सी वर्ष की उम्र में वह बिग बी बनकर बैठा है।
अब इस उम्र में क्या आप भगवान से मिलोगे। भैया, और कितने महान बनोगे। बेचारे देवानंद सिर्फ सदाबहार हीरो बनकर रह गए, दिलीप साहब ट्रेजेडी किंग और राजकपूर एक शो मैन। इनमें से कौन कितना महान, जान सके तो जान। ।
एक थे दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर आचार्य रजनीश। उन्हें भगवान बनने में ज्यादा समय नहीं लगा, लेकिन इन्हें न तो यह देश रास आया और न ही यह भगवान की पदवी, वे और आगे बढ़कर ओशो बन गए। वैसे साधारण शब्दों में ओशो का मतलब, सागर से एक हो जाने का अनुभव करने वाला होता है। उनका अपना अनुभव है। उनके बारे में आपका हमारा, अपना अनुभव है।
कौन कितना महान, मुश्किल है पहचान।
कभी कभी कुछ विशिष्ट और प्रसिद्ध व्यक्तियों को महानता छूकर निकल जाती है, उन्हें कुछ ऐसी ठोकर लगती है कि वे मुंह के बल गिर जाते हैं, कपड़े खराब हो जाते हैं, मुंह पर भी कीचड़ लग जाता है।
उनके भक्त भी विभक्त हो जाते हैं। राम और रहीम बनते बनते उनकी ऐसी स्थिति हो जाती है कि न माया मिली न राम। फिर भी राम जी तो बोलना ही पड़ेगा। ।
बिना कुछ करे कराए, जाने पहचाने, कोई यूं ही विशिष्ट नहीं हो जाता, ख्याति प्राप्त नहीं कर लेता। मेरा देश महान इसीलिए है क्योंकि इस धरती पर राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर पैदा हुए हैं। देवों की धरती है यह देश, जहां ईश्वर अवतार लेता है। जहां त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश हों, फिर वहां क्या शेष रह जाता है। ये भारत देश है मेरा, थोड़ी बहुत तो अंग्रेजी चलेगी। आय लव माय इंडिया।
यहां लोग इतने महान हो जाते हैं कि बाद में वे बच्चों को कोर्स में पढ़ाए जाते हैं, उनकी बचपन की अलौकिक लीलाओं पर कॉमिक्स बनाए जाते हैं। आज को पीढ़ी को बाल नरेंद्र से कुछ सीखना चाहिए। यह मेरा अज्ञान है कि मुझे मेरे शहर के चौराहों पर लगी महान विभूतियों के पूरे नाम भी याद नहीं। जीवन भर अंताक्षरी और स्टेच्यू स्टेच्यू खेलने से किसी का चौराहे पर स्टेच्यू नहीं लग जाता। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त यूं ही नहीं कह गए ;
काम करो, कुछ काम करो।
जग में रहकर कुछ नाम करो।
अब हम तो महान बनने से तो रहे। हो सकता है, आप कतार में हों। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
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