श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “माता का दरबार…“।)

?अभी अभी # ११२१ ⇒ आलेख – माता का दरबार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह किसी सम्राट, शहंशाह, बादशाह अथवा महाराजा का दरबार नहीं, माता का दरबार है। यहाँ दरबारियों, सेवकों और नव-रत्नों की दरकार नहीं, नवरात्रि तक स्वयं नवदुर्गा अपने नौ दिव्य-स्वरूपों से दरबार को सुसज्जित करेगी। माता का जगराता है! यहाँ जो भी आता है, शीश झुकाता है, मन-माफिक मुरादें पाता है।

दरबार हमेशा किसी ऊँचे स्थान पर होता है। हमारी माता तो पहाड़ां वाली और शेरां वाली है। पहाड़ों पर ही उसका दरबार लगता है, और हमारी माँ अम्बे, जगदम्बे शेर की सवारी करती है। ।

वह सबसे पहले माँ है, जगत-जननी है। उसका जन्म ही जगत कल्याण के लिए हुआ है। वह दिन-रात, आँधी-तूफान, जंगली जानवरों और नर-पिशाचों से अपने पुत्रों की रक्षा करने में सक्षम है। वह अगर आनंदमयी, चैतन्यमयी, सत्यमयी परमी है, तो महाकाली, दुर्गे और अम्बे भी है।

एक पुत्र के लिए माँ का स्वरूप वत्सला, ममता, दया और करुणा का होता है। जब तक बच्चा अबोध है, अनजान है, असहाय है, कमज़ोर है, माँ उसे अपने आँचल से चिपकाये रहती है, उसकी भूख-प्यास मिटाती है, उसका लालन-पालन करती है, लेकिन जैसे ही पंछी ने पर फड़फड़ाये, माँ उसे आज़ाद कर देती है। ।

लेकिन यही आज़ाद पंछी जब बाज बनकर इंसानियत को कलंकित करता है, तो वह उसके पर नोच लेती है। डाकिनी, पिशाचिनी महाशक्ति बन इन असुरों का संहार भी करती है। लेकिन एक भक्त के लिए वह सिर्फ माँ सरस्वती है, महालक्ष्मी है, उसकी अपनी वसुंधरा है।

जो रामराज्य का सपना देखते हैं, उन्हें राम के समान वनवास के लिए भी तत्पर रहना चाहिए। कितने राक्षसों का संहार हुआ रामराज्य के पहले! क्या हम अपनी सीता की अग्नि परीक्षा के लिए सहमत होंगे। लक्ष्मण रेखा पार करने के परिणाम तो हमें भुगतने ही होंगे। ।

एक आल्हादिनी शक्ति का हमारे अंतस में भी वास है। उस शक्ति को जगाना ही नवरात्रि का व्रत-उपवास-डांडिया रास है। मन पर विजय ही विजयादशमी है।

मन के शत्रुओं का संहार ही नवरात्रि का त्योहार है।

माता का दरबार सजा है। वही जगदम्बे है, वही माँ चामुण्डा है। श्रद्धा, भक्ति और विवेक की सीढ़ियां चढ़ने पर ही उस जगत-माता के दर्शन आपको जन जन में व्याप्त माँ, बहन और बेटी में होना संभव है। जिस धरती पर नवरात्रि में कन्याओं को पूजा जाता है, उन्हें पाँव छूकर प्रणाम किया जाता है, क्या वह सिर्फ नौ दिन का ही एक उत्सव है, दिखावा है। हर पल जब नवरात्रि होगी, तब ही वह माँ का सच्चा जगराता होगा।।

“अम्बे मात की जय!”

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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