स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सेतु की नियति दो…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०४ ☆

☆ – सेतु की नियति दो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

हाय रे दुर्योग,

मैं या मेरी पीढ़ी के लोग

न तो गुलाम भारत में

‘वन्देमातरम्‘ गाकर

जेल जा सके,

न स्वतन्त्र देश में जन्म पा सके।

 

हमें मयस्सर नहीं हुई

शुभ घड़ी,

मुँह बिचकाकर चली गई

हथकड़ी।

 

यानी हम पैदा हुए

ठीक उस तरह के सन्धिकाल में,

जैसे एक बढ़ा हुआ महीना

‘मलमास‘ के नाम से

जुड़ जाता है

कभी किसी साल में।

 

दिल बहलाने को गालिब

हमारी भी महत्ता है।

किन्तु वैसी ही इयत्ता

जैसे ताश में

जोकर का पत्ता है।

 

आपको आ रही है हँसी

हमें

आ रहा है रोना,

विराटों की भीड़ ने

हमें बना दिया है

निराट बौना।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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