श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “श्राद्ध-पक्ष…“।)
अभी अभी # ११०५ ⇒ आलेख – श्राद्ध-पक्ष
श्री प्रदीप शर्मा
आज से पंद्रह दिनों के लिए कोई राजनीति की चर्चा नहीं ! न कोई सत्ता पक्ष, न ही कोई विपक्ष। बस, केवल श्राद्ध पक्ष।
श्राद्ध शब्द श्रद्धा से ही बना है। आस्था का ही परिवर्तित एवं परिपक्व स्वरूप है श्रद्धा ! भक्ति के बहुत करीब है श्रद्धा। आज के समय में श्रद्धा-भक्ति जैसे तकिया-कलामों का प्रचलन बढ़ गया है ,जिनका श्रद्धा और भक्ति से कहीं दूर तक का कोई सम्बन्ध नहीं है।।
केवल एक मात्रा की ग़लती से जिस पर आपकी श्रद्धा है,उसका श्राद्ध भी हो सकता है। वैसे भी बिना श्रद्धा के कहाँ श्राद्ध सफलता से सम्पन्न होता है। यही वह समय होता है,जब अगर श्रद्धा से नहीं, तो पंडितों द्वारा गरुड़ पुराण से भयभीत प्राणी
अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध तो क्या, कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। भय बिना प्रीत की भाँति, श्रद्धा भी उत्पन्न नहीं होती।
हमारे कितने पूर्वज स्वर्गीय हुए और कितने अतृप्त रह गए,इसका जवाब अब आरटीआई तो देने से रहा। मेरे हिसाब से तो मेरे जितने भी देशभक्त पूर्वज स्वर्गीय हुए,वे आज तक अतृप्त हैं, क्योंकि उनका जीवन-काल या तो अंग्रेज़ो की गुलामी में बीता या फिर 70 साल के कांग्रेस के कार्यकाल में। बेचारे तिल-तिल कर मरते हुए जीये होंगे,उनकी मुक्ति कैसे संभव है। हाँ, अगर आपके पूर्वज अंग्रेजों के गुलाम रहे होंगे,अथवा अपने जीवनकाल में कांग्रेसी पिटठू रहे होंगे,तो आराम से अप्सराओं का नृत्य देखते हुए सलमान खान की जगह स्वर्ग में देवराज इन्द्र का बिग बॉस देख रहे होंगे।।
हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी मेरी धर्मपरायण पत्नी ने पूर्वजों की सूची बना ली है। अब यथोचित ब्राह्मण तलाशे जा रहे हैं,जो पूरी तरह से कोलोस्ट्राल-फ्री तो हों,
लेकिन शुगर-फ्री न हों। आजकल के एंड्राइड-धारी पंडित फ़ीकी खीर में शुगर-फ्री डालते हैं,और पूड़ी-पकौड़ी से परहेज़ करते हैं। ऐसे ब्राह्मण जो खुद मीठी खीर-पूड़ी खाकर,जब तक एक लंबी डकार न ले लें, क्या हमारे पूर्जों को तृप्त कर सकते हैं,कभी नहीं। खीर की जगह खीरा ककड़ी,यह भी कोई बात हुई !
पंडितों की तलाश जारी है। पूर्वजों की तृप्ति और मुक्ति का एक वार्षिक लेकिन स्थायी सवाल है। कोई हेल्पलाइन या कोई मददगार ! अग्रिम आभार।।
(विशेष: मैं एक प्रगतिशील श्रद्धालु हूँ। अपने पूर्वजों में श्रद्धा तो रखता हूँ,लेकिन किसी कौवे से पूर्वजों को जोड़ने के सख्त ख़िलाफ़ हूँ। कई सयाने कौवे तो मेरे आसपास ही मंडरा रहे हैं।पूर्वज क्षमा करें ! )
© श्री प्रदीप शर्मा
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