श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपने के बहाने…“।)
अभी अभी # ११०७ ⇒ आलेख – सपने के बहाने
श्री प्रदीप शर्मा
बंद आंखों से देखी जाने वाली फिल्म को आप स्वप्न कह सकते हैं। इसके शो दिन में भी हो सकते हैं और रात में भी। इसका रिमोट आपके पास नहीं, आपके अवचेतन मन के पास होता है।
इसके प्रदर्शन का समय भी पूर्व निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसकी कोई शूटिंग इत्यादि नहीं होती। केवल एक ही व्यक्ति के लिए इसका सीधा प्रसारण किया जाता है और वे खुशनसीब सिर्फ आप होते हैं। आप ही प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और आपको ही नहीं मालूम, आप अपने आपको क्या दिखाने जा रहे हो।
सपनों का संबंध हमारे चित्त से होता है, आसक्ति, भावना, संवेदना, और दबी हुई इच्छाओं से होता है। मन संकल्प विकल्प करा करता है, कई हवाई किले बनाता है, जो घटना कभी नहीं घटी, वह स्वप्न में घट जाती है। आप कहते रह जाते हैं, ऐसा तो मैने सपने में भी नहीं सोचा था, और वही घटना वास्तविक जीवन में घट भी जाती है।।
होते होंगे लोगों के सच सपने, स्वप्न सिर्फ भूल जाने के लिए होते हैं। फिर ऐसा क्या होता है इन सपनों में, कि कभी कभी इनका जिक्र करने का मन होता है, किसी को बताने की इच्छा होती है। जो अपने होते हैं, उनसे ही सपने शेयर किए जाते हैं। केवल अपनों का ही अपने सपनों पर अधिकार होता है। कब हमारे मन पर कौन राज कर ले, स्वप्न में चले आए, अपना पराया, जान -अनजान, जीवित अथवा दिवंगत।
आजकल श्राद्ध पक्ष चल रहा है, श्रद्धा, तर्पण और समर्पण का दौर है। हमारे श्रद्धेय कौन होते हैं, हमारे प्रियजन, गुरुजन और स्वजन। चेतना अपना काम कर रही है और अवचेतन अपना। माता पिता के पश्चात् कल हमारे बड़े सदगुरु महाराज ब्रह्मलीन स्वामी विष्णुतीर्थ की पुण्यतिथि है और मेरे गुरु तुल्य अग्रज श्री हरिहर लहरी का निर्वाण दिवस भी कल ही तो था। हम कहीं जाएं न जाएं, जो मनमानी करे, हमारी नहीं माने, वह और कोई नहीं, हमारा मन ही तो है।।
अब अवचेतन मन की स्क्रिप्ट देखिए। रात को सोते ही स्वप्न कब शुरू हुआ पता नहीं चला ! जब आंख खुली तो स्वप्न जा चुका था। स्वप्न में वह सब कुछ नहीं था, जो दिन में, मेरे मन में घट रहा था। स्वप्न में अचानक मेरे अंग्रेज़ी के प्रोफेसर चंदेल प्रवेश कर गए। एक बार उनका प्रवेश हो जाए, तो फिर बाकी सबकी छुट्टी। वे उनके स्कूटर पर थे और उनके पीछे हमेशा की तरह मैडम चंदेल विराजमान थी। उन्हें मैने नहीं, मेरे एक मित्र ने देखा और उस ओर दौड़ लगा दी, जिस रास्ते से वे गुजरने वाले थे। कौन पागल नहीं था चंदेल सर के पीछे।
और उसने चंदेल सर को रास्ते में रोक ही लिया। प्रणाम किया, तब तक मैं भी अपनी साधारण चाल चलता हुआ, चंदेल सर तक पहुंच ही गया। स्वप्न में कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है। ये सन् 70 के चंदेल सर नहीं थे। थोड़े स्लिम और ट्रिम, और अधिक गोरे, और उस पर घुंघराले बाल उन्हें एक अलग ही लुक प्रदान कर रहे थे। मैं प्रणाम करने को झुका, तो उन्होंने सीने से लगा लिया। स्वप्न में वे सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, जो वास्तविक जगत में नहीं हो पाती। मैने चंदेल सर की तारीफ की। सर यह तो आपका पुनर्जन्म लग रहा है। उम्र भी चालीस से ज्यादा की नहीं।।
पास में ही एक स्थान पर मैडम चंदेल एक स्कूल जाने वाले बालक के साथ बैठी थी। बातचीत भी हुई होगी लेकिन सपने का सार यही निकला कि चंदेल सर ने अपने इंद्रपुरी का मकान छोड़ दिया और नया पता मुझे बताया। मेरे पास चश्मा और मोबाइल दोनों नदारद थे इसलिए मैने मेरे मित्र को चंदेल सर का पता नोट करने को कहा। इतने में चंदेल सर ने अपना नया पता, फोन नंबर और कुछ शब्दों में आशीर्वाद स्वरूप कुछ शब्द एक कागज पर लिखकर मुझे सौंप दिए। अचानक सपना खत्म हो गया। चंदेल सर चले गए। मैं न उनका पता पढ़ पाया, न फोन नंबर।
पचास वर्ष बाद भी अवचेतन मन अतीत को नहीं छोड़ पाता। जो हमें प्रिय होते हैं, वे कहीं भी चले जाएं, हमारे मन से नहीं जाते। यही प्रेम है, आसक्ति है, लगाव है, श्रद्धा है। जब हमारा अवचेतन मन सूक्ष्म जगत में विचरण कर सकता है तो जो हमारे परिजनों और प्रियजनों की आत्मा सूक्ष्म में विचरण कर रही है, क्या वे हमारी श्रद्धा और आदर भाव की साक्षी नहीं है। श्रद्धा और तर्पण पूरी तरह शुद्ध चित्त का मामला है। जो शुद्ध और पवित्र आत्माएं मुक्त हो जाती हैं, क्या वे हमारे लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं करती। जिनके स्मरण मात्र से हमें बल और प्रेरणा मिलती हो, उस पितृ लोक, गुरु लोक और वैकुंठ लोक को नमन।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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