श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हानि-लाभ…“।)
अभी अभी # १११३ ⇒ आलेख – हानि-लाभ
श्री प्रदीप शर्मा
पुराने साहूकारी बही-खातों में अंदर कितनी भी लाभ-हानि हो, बही-खातों के ऊपर लाभ-शुभ ही लिखा जाता था। शुभ-लाभ में शुभ ही शुभ होता है, क्योंकि जब लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं, तो लाभ ही लाभ होता है! लेकिन जीवन में हर इंसान को हानि और लाभ दोनों का अनुभव होता है।
आम आदमी के लिए सुख-दुःख, हानि-लाभ ईश्वर के अधीन होंगे, लेकिन राजनीति हमेशा केवल सत्ता के अधीन होती है। ईश्वर की सत्ता से परे होती है सत्ता की राजनीति।।
जिस तरह एक व्यापारी की नैतिकता हानि-लाभ से जुड़ी होती है, घोड़ा घास से यारी नहीं कर सकता, उसी तरह राजनीति में सत्ता की खातिर कभी लोक-लुभावन निर्णय लिये जाते हैं, तो कभी लोक-विरोधी। कभी शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को सरकार पलट देती है तो कभी sc/st के निर्णय को ताक में रखना पड़ता है। और सरकार इसी ताक में रहती है, कि कब मौका आए, और वह ताक में रखा निर्णय पुनः बहाल करे।
जब धंदा मंदा होता है, व्यापारी अधिक जमाखोरी करता है। बाज़ार के उठते ही वह उठ जाता है, और उसका गोदामों में पड़ा सामान मुँह-माँगी कीमत पर हाथों-हाथ उठ जाता है। कभी कभी जब मंदी ज़ोर पकड़ लेती है, तो मज़बूरी में घाटा उठाकर भी सामान उठा देता है, सर पकड़कर बैठ जाता है, और आसमान की ओर मुँह उठाकर कहता है –
जन्म-मरण, जस-अपजस,
हानि-लाभ, सब ईश्वर के हाथ।।
एक व्यापारी की तरह कभी कभी सत्ता का भी दीवाला निकल जाता है। 60 साल से चली आ रही पेढ़ी जनता का विश्वास खो बैठती है और विपक्ष में जा बैठती है। राजनीति पुरुषार्थ का खेल है! इसमें रणछोड़ नहीं चलते। जंगबहादुर ही जंग जीतते हैं, लालबहादुर तो एक रेल दुर्घटना से ही व्यथित हो, मंत्री-पद से त्याग-पत्र दे देते हैं।
त्याग नहीं भोग की नीति का नाम है राजनीति! एक राजनेता के लिए सत्ता का डंडी-चूम उपभोग और कुर्सी की देखभाल से बड़ा कोई कर्तव्य अथवा आदर्श नहीं हो सकता। त्याग के लिए जनता बैठी है न।।
जनता नहीं समझती! उसके भले के लिए सरकार को कितने कड़वे और कठोर निर्णय लेने पड़ते है। सब्सिडी और आरक्षण जैसे कल्याणकारी क़दम अगर एक बार आगे बढ़ जाएं, तो महज भावुकता अथवा छोटे-मोटे आंदोलनों की परवाह नहीं की जाती। एक बार बढ़े हुए कदम पीछे नहीं लिए जाते। और खासकर चुनाव के वक्त तो कभी नहीं।
हम लाए हैं तूफान से कुर्सी निकाल के! इस कुर्सी को रखना, मेरे नेता संभाल के।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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