पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – चुभता हुआ सत्य (ईबुक) – हेमन्त बावनकर 

चुभता हुआ सत्य (ईबुक) – हेमन्त बावनकर 

आत्मकथ्य – यह उपन्यासिका मेरी पहली कहानी चुभता हुआ सत्यपर आधारित है। यह कहानी दैनिक नवीन दुनिया, जबलपुर की साप्ताहिक पत्रिका तरंगके प्रवेशांक में 19 जुलाई 1982 को डॉ. राजकुमार तिवारीसुमित्र जी के साहित्य सम्पादन में प्रकाशित हुई थी।

इस उपन्यासिका का कथानक एवं कालखंड अस्सी-नब्बे के दशक का है। अतः इसके प्रत्येक पात्र को विगत 36 वर्ष से हृदय में जीवित रखा। जब भी समय मिला तभी इस कथानक के पात्रों  को अपनी कलम से उसी प्रकार से तराशने का प्रयत्न किया, जिस प्रकार कोई शिल्पकार अपने औजारों से किसी शिलाखण्ड को वर्षों तराश-तराश कर जीवन्त नर-नारियों की मूर्तियों का आकार देता है, मानों वे अब बोल ही पड़ेंगी।

सबसे कठिन कार्य था, एक स्त्री पात्र को लेकर आत्मकथात्मक शैली में उपन्यासिका लिखना। संभवतः किसी लेखिका को भी एक पुरुष पात्र को लेकर आत्मकथात्मक शैली में लिखना इतना ही कठिन होता होगा। इन पात्रों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझते हुए पिछले 36 वर्ष तक अपने हृदय में सहेजने के पश्चात अब उन्हें उपन्यासिका का रूप दे कर संतुष्टि का अनुभव कर रहा हूँ। यह उपन्यासिका वर्तमान परिपेक्ष्य में कितनी सार्थक है, इसका निर्णय मैं अपने पाठकों पर छोड़ता हूँ।

अमेज़न पर यह ईबुक 27 दिसंबर मध्यरात्रि तक प्री-लॉंच ऑफर पर उपलब्ध है एवं 28 दिसंबर 2018 प्रातःकाल से विक्रय के लिए उपलब्ध रहेगी। 

Amazon  लिंक – चुभता हुआ सत्य (ईबुक) 



पुस्तक समीक्षा – चुभता हुआ सत्य – डॉ विजय कुमार तिवारी ‘किसलय’ 

लेखन की सार्थकता दिशाबोधी उद्देश्य की सफलता पर निर्भर करता है। लेखन सुगठित, सुग्राह्य, चिंतनपरक एवं उद्देश्य की कसौटी पर जितना खरा उतरेगा उतना व्यापक पठनीय, श्रवणीय तथा देखने योग्य होगा। सृजक की साधना, अभिव्यक्ति-चातुर्य तथा अनुभव ही सृजन को महानता और सार्थकता प्रदान करते हैं। अध्ययन एवं सांसारिक चिंतन-मनन उपरांत लिखा गया साहित्य निश्चित रूप से जनहितैषी एवं मार्गदर्शक होता है। हिन्दी में साहित्य लेखन का प्रारंभ ही धर्म, नीति, सद्भाव तथा मानवता से हुआ है। आज समय के दीर्घ अंतराल पश्चात लेखन बदला है, विषय बदले हैं और सबसे बड़ा बदलाव हुआ है तो वह है मानवीय दृष्टिकोण का। निःसंदेह तकनीकी प्रगति में अकल्पनीय वृद्धि हुई है परंतु वांछित मानवीय गुणों में निरंतर गिरावट हो रही है। आज बदलते परिवेश में शांति, सद्भाव, प्रेम, सहयोग एवं उदार भावों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का उत्तरदायित्व साहित्यकारों के ऊपर पुनः आ गया है। आज उत्कृष्ट साहित्य के प्रचार प्रसार एवं अनुकरण हेतु प्रबुद्ध वर्ग का आगे आना अनिवार्य हो गया है। आज जब हर शख्सियत ‘अपनी ढपली अपना राग’ अलापने में लगी है, तब समाज को सही दिशा देने का परंपरागत कार्य साहित्यकार को ही करना पड़ेगा। आज समाज में स्वार्थ, वैमनस्य, असमानता तथा घमंड जैसी बहुसंख्य समस्याएँ एवं विद्रूपताएँ व्याप्त हैं। ‘मैं’ को ‘हम’ में बदलने का कार्य कलमकार ही कर सकता है।

तुलसी और कबीर से लेकर आज तक साहित्यमनीषियों के प्रेरक प्रसंग तथा लेखन ने इस समाज को परस्पर बाँधे रखा है। आज भी ऐसे साहित्यकारों की कमी नहीं है जो निरंतर दिशाबोधी तथा सकारात्मक सृजन में संलग्न हैं। ऐसे ही एक साहित्यकार हैं श्री हेमंत बावनकर, जिनके साहित्य पर मैंने चिंतन-मनन तो किया ही है उन्हें निकट से जाना भी है। साधारण सहज एवं आत्मीय श्री हेमंत जी एक ओर जहाँ मितभाषी एवं सहयोगी प्रकृति के हैं, वहीं अपने लेखन के प्रति सदैव सजग तथा गंभीर भी रहते हैं। आपका काव्य हो, कहानियाँ हों अथवा उपन्यास। हर विधा में इन्हें निष्णात माना जा सकता है। भाषा-शैली, भाव-गाम्भीर्य, परिदृश्य-चित्रांकन के साथ ही अंतस तक प्रभावी संवाद आपके लेखन की विशेषताएँ हैं।

उपन्यासिका ‘चुभता हुआ सत्य’ भी एक ऐसी ही कृति है जिसमें मानवीय भावनाओं को प्रमुखता से उभारा गया है। पूरी उपन्यासिका को परिस्थितियों एवं परिवेश के अनुरूप दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक भाग में नायिका सुनीता के विवाह पूर्व का लेखा-जोखा है, वहीं दूसरे भाग में विवाहोपरांत उन संवेदनाओं का उल्लेख है जो मानवीय मूल्यों को कहीं न कहीं ठेस पहुँचाते हैं।  उपन्यासिका में नायक सुनीता विद्यार्थी जीवन से ही बुद्धिमान, सत्य के प्रति निर्भीक तथा चिंतक प्रवृत्ति की लड़की रहती है। दहेज एवं लड़की वालों की बातों से वह काफी विचलित होती है। तभी एक पत्रकार रवि परिचर्चा हेतु साक्षात्कार के लिए उसके घर आता है। सुनीता उसके विचारों से प्रभावित होती है। मुलाकातें वैवाहिक प्रस्ताव तक पहुँचती हैं। नौकरी लगने पर रवि से उसका अंतरजातीय विवाह हो जाता है। इस भाग में मध्यम वर्गीय परिवारों, रैगिंग जैसी कुरीतियों, दहेज प्रथा, बेरोजगारी, ननद-भाभी के पवित्र रिश्ते एवं आचार-व्यवहार के ताने-बाने से मध्यम वर्गीय परिदृश्य पाठकों के जेहन में उभरकर स्थायित्व प्राप्त करता है। मीना भाभी माँ का आदर्श चित्रण भी लेखक की अपनी शैली का उदाहरण है।

विवाह के उपरांत लखनऊ यूनिट में रवि एम. ए. इंग्लिश पढ़ी सुनीता के साथ बड़े उत्साह और गर्व के साथ सैन्यजीवन आगे बढ़ाता है। यहाँ पर पढ़ी-लिखी सुनीता अफ़सर और सिपाहियों के भेद तथा अफसरों की पत्नियों द्वारा अफ़सरों जैसे व्यवहार से क्षुब्ध रहती है। एक बार महिला कल्याण समिति की अध्यक्ष और रवि के बॉस की पत्नी मिसेज शर्मा से बहस होने पर रवि को सिपाही से अर्दली बनने का खामियाजा भुगतना पड़ता है। इससे सुनीता मानसिक रूप से बेहद परेशान रहती है लेकिन रवि के समझाने पर उसका मन हल्का हो जाता है। इन प्रसंगों के चलते पूरी उपन्यासिका में सुनीता की वैचारिक उथल-पुथल चलती रहती है। सामाजिक बंधनों की बात, रवि के साथ आकर्षण की बात, बिटिया मधु की भावनाओं की बात, सैन्य जीवन में अफसर सिपाही के भेद की बात अथवा अफसर-सिपाहियों की पत्नियों के बीच भी उच्च एवं निम्न के भेद की बात सुनीता के मन को कचोटती है और एक दिन जब उसके सब्र का बाँध टूट पड़ता है तब पाठकों को भी एहसास होता है कि स्वाभिमान पर ठेस लगना साधारण नहीं होता। पति-पत्नी के आदर्श रिश्ते की सफलता का वर्णन भी इस उपन्यासिका में बखूबी किया गया है।

सुनीता के जीवन में ऐसे अनेक चुभते हुए सत्य सामने आते हैं और वह हर बार तिलमिला उठती है। शादी हेतु बार बार प्रस्तुत होना। अकेले जन्मे हैं अकेले ही मरेंगे। सैनिक से अधिक अर्दली की पत्नी हूँ। देशभक्ति में नैतिकता बहुत निचले स्तर तक पहुँच गई है। अमर शहीदों का जीवन कुछ धन या सिलाई मशीन से तौला जा सकता है? ऐसे और भी चुभते सत्य इस उपन्यासिका में हैं, जिनके माध्यम से जनचेतना लाने का प्रयास साहित्यकार श्री हेमन्त जी द्वारा किया गया है। अंत में राष्ट्रप्रेम का भाव  रवि को सुनीता के दृष्टि में और ऊँचाई पर पहुँचा देता है। इसके साथ ही अब सुनीता के पास ऐसा कोई भी चुभता हुआ सत्य नहीं बचता जो उसके हृदय में गहराई तक चुभ सके।

इस तरह हम कह सकते हैं कि उपन्याससिका ‘चुभता हुआ सत्य’ आज समाज में व्याप्त विसंगतियों, कुरीतियों, दहेज, द्वेष आदि के  उदाहरण प्रस्तुत करती ऐसी कृति है जिसे पढ़ने के पश्चात पाठक भी उद्वेलित होकर चिंतन-मनन हेतु निश्चित रूप से बाध्य होगा। उपन्यासिका में महाविद्यालयीन, पारिवारिक, वैवाहिक, युवक-युवती आकर्षण, ममता, वात्सल्य, सैन्य जीवन, निर्भीकता, सत्यता जैसे भावों का समावेश होना लेखक का व्यापक अध्ययन और ज्ञान का नतीजा ही कहा जाएगा। यह कृति समाज को नई दिशा दे। श्री हेमन्त  जी का सृजन अबाध चलता रहे। उपन्यासिका ‘चुभता हुआ सत्य’ के प्रकाशन पर हमारी अंतस से अनंत बधाईयाँ।

– विजय तिवारी ‘किसलय’

विसुलोक, 2419  मधुवन कॉलोनी, विद्युत उपकेन्द्र के आगे, उखरी रोड, जबलपुर (मध्य प्रदेश) 482002.

मो. 4925 325 353  email: vijaytiwari5@gmail.com

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मराठी साहित्य – आलेख – शेवट गोड व्हावा …!  – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

शेवट गोड व्हावा …! 

(प्रस्तुत है सुश्री ज्योति हसबनीस का आलेख ‘शेवट गोड व्हावा’) 

रिमझिमता पाऊस ..हवेतली सुरकी ..आणि वाफाळत्या काॅफीचा एकेक घोट ..बघता बघता काॅफीने तळ गाठला ..आणि शेवटचा घोट ..किंचित गोड लागला …अपार तृप्ती देऊन गेला .

कसं असतं ना माणसाचं …शेवट गोड तर सारं गोड हे अगदी ठसलं असतं त्याच्या मनावर ! मग ते सीरियल असो, कथा कादंबरी असो, नाटक असो , चित्रपट असो की आपल्या आजूबाजूला घडणाऱ्या गोष्टी असो ! ‘

‘ते दोघं आणि चारचौघं’ ह्यातही आपल्याला ‘त्या दोघांच्या’वियोगाची कल्पना करवतच नाही , त्यांच्या ओढीचा शेवट चिरकाल एकत्र येण्यातच व्हावा असंच आपल्याला वाटतं !

खुप कष्ट करून जिद्दीने वाढवलेल्या मुलांनी आईचा आधार बनून तिला अपार सुख देऊन तिचा शेवट सुखासमाधानात व्हावा असंच आपल्याला वाटतं !

वन्यपशुंच्या जीवनावरील लघुपट बघतांनादेखील जिवाच्या भीतीने सुसाट पळणारं हरिण वाघाच्या तडाख्यातून सुटून सुखरूप आपल्या कळपात जावं , गरूडाची झडप चुकावी आणि गोजिरवाणं सीगल त्याच्या तावडीतून सुटावं , कपारीच्या आश्रयाने त्याने दडावं , आणि अशा  जीवघेण्या पाठलागाचा शेवट त्यांच्या सुखरूप असण्यात व्हावा ..हेच मन म्हणत असतं !

आयुष्य पुरेपूर उपभोगून झालेली वयोवृद्ध मंडळी ..वाढणारी वयं आणि ढासळत चाललेलं आरोग्य सांभाळत कशीबशी आला दिवस साजरा करणारी पिकली पानं ..कमीत कमी यांचा तर शेवट गोड व्हावाच ..आहे त्यापेक्षा अजून कमीअधिक वाट्याला न येता आजवर चाखलेल्या गोडीची चव मनभर असतांनाच  त्यांचा शेवट व्हावा असं तर वाटतंच वाटतं …!

कॉफीचा तो शेवटचा घोट पण किती विचारांचं मोहोळ उठवलं त्याने !

मनात आलं कसं असतं ना माणसाचं , एखादी गोष्ट नाही करायची म्हणली तरी हटकून तीच कराविशी वाटते , आणि ती केल्यानंतर त्याचं नेमकं स्पष्टीकरणही अंतर्मनातल्या ‘मी’ साठी मनात तयारच असतं! बिनसाखरेची काॅफी प्यावी म्हणून काॅफी घेतली तशीच पण मनाच्या समाधानासाठी अपराधी भावाने चिमूटभर साखरही घातलीच कपात ..काॅफी संपता संपता समाधान होतं अजिबात गोड नाही लागत आहे त्याचं आणि शेवटी एका घोटात काॅफीला आलेल्या माफक गोडव्याने जीव सुखावला ..काॅफीचा तो शेवटचा घोट अपार तृप्ती देऊन गेला ! आणि त्या अपार तृप्तीतच विचार आला तो अशा सुखांताचा ..!!!!

*ज्योति हसबनीस*

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल- The World Happiness Report 2018

The World Happiness Report 2018

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker)

The World Happiness Report is a landmark survey of the state of global happiness. The World Happiness Report 2018, ranks 156 countries by their happiness levels, and 117 countries by the happiness of their immigrants.

LifeSkills

Courtesy – Shri Jagat Singh Bisht, LifeSkills, Indore

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – मेरे लिखे को पढ़ने वाले – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

मेरे लिखे को पढ़ने वाले 

(डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी का  लेखकों की व्यथा का अत्यंत खोजपरख व्यंग्य)

यह लेखकों के लिए भारी संकट का समय है।लेखक मोटे-मोटे पोथे लिखकर पटक रहा है, लेकिन पढ़ने वाला कोई नहीं।पाठक सिरे से नदारद है।घोंघे की तरह अपने खोल में दुबक गया है।लेखक बार बार व्याकुल होकर आँखों पर हथेली की ओट लगाकर देखता है, लेकिन सब तरफ सन्नाटा पसरा है।पाठक ‘डोडो’ पक्षी की तरह ग़ायब हो गया है।

हालत यह है कि पत्रिकाओं में इने-गिने पच्चीस पचास लेखक ही बदल बदल कर कभी लेखक और कभी पाठक का चोला ओढ़ते रहते हैं। कभी वे लेखक बन जाते हैं, कभी पाठक।एक दूसरे की कमियां ढूँढ़ते रहते हैं और बगलें बजाते रहते हैं। कुछ लेखक पाठकों से इतने मायूस हो गये हैं कि अपने घर पर चाय का लालच देकर दस बीस मित्रों को बुला लेते हैं और उन से अपनी तारीफ सुनकर खुश हो लेते हैं।अगर कोई नासमझ,स्पष्टवादी श्रोता रचना की आलोचना करने लग जाए तो उसे तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।यानी लेखक का ह्रदय कोमल होता है,इसलिए उसे आघात न पहुँचाया जाए।

साहित्य-प्रेम की हालत यह है कि अब साहित्यिक कार्यक्रमों के निमंत्रण-पत्र में लिखा जाता है–‘सबसे पहले पहुँचने वाले और अंत तक रुकने वाले पाँच श्रोताओं को पुरस्कृत किया जाएगा।’ कार्यक्रम के बीच में दो तीन बार घोषणा होती है कि कार्यक्रम के अंत में सबके लिए चाय की व्यवस्था है।

इसी माहौल में जानी मानी मासिक पत्रिका ‘प्रलाप’ में मेरी एक रचना छपी और मैं उत्साह में मित्रों-परिचितों का मुँह देखने लगा कि कोई कहेगा कि वाह भई,क्या धाँसू रचना लिखी है।लेकिन मित्र और परिचित ‘हाय’ ‘हलो’ कहते आजूबाजू से गुज़रते रहे, किसी ने भी रुककर मुँह खोलकर यह नहीं कहा कि भाई, मैंने आपकी बेमिसाल रचना पढ़ी।

अंततः मेरा दिल बैठने लगा। दुनिया बेरौनक लगने लगी।लगा कि पृथ्वी पाठक-विहीन हो गयी।पाठक दूसरे लेखकों को भले न पढ़ें, कम से कम मुझे तो पढ़ें।लेकिन पाठक बड़ा निष्ठुर हो गया है।जब कद्रदाँ ही नहीं तो हुनर का क्या मोल!

हारकर मैंने एक दिन अपने मित्र पारखी जी को रास्ते में पकड़ लिया।उम्मीद से उनकी तरफ देखते हुए पूछा,’मासिक प्रलाप मँगा रहे हैं?’

वे नाक सिकोड़कर बोले,’जब से पेट्रोल चार रुपये मँहगा हुआ, अपन ने साहित्यिक पत्रिकाएं खरीदना एकदम बन्द कर दिया।अब अपन साहित्य वाहित्य ‘अफोर्ड’ नहीं कर सकते।साहित्य वाहित्य से होता भी क्या है?किस मर्ज की दवा है यह?’

मैंने उनके उच्च विचार सुनने के बाद मरी आवाज़ में कहा,’उस पत्रिका के नये अंक में मेरी रचना छपी है।’

वे बोले,’वाह, अच्छी बात है।सुनकर खुशी हुई।अगर पत्रिका कहीं मिल गयी तो जरूर पढ़ूँगा,फिर अपने बहुमूल्य मत से अवगत कराऊँगा।’

मैंने संकोच को परे रखकर कहा,’कहें तो पत्रिका आपके पास भेज दूँ?

वे मुफ्तखोरी की संभावना देख प्रसन्न होकर बोले,’इससे बेहतर क्या हो सकता है!मैं तत्काल पढ़कर आपसे विचार-विमर्श करूँगा।’

मैंने उनके स्कूटर की बास्केट में कुछ पुस्तकें देखकर पूछा,’ये कौन सी किताबें हैं?’

वे बोले,’यह बैंगन बनाने की सौ विधियों पर है और दूसरी शनि की साढ़ेसाती के लक्षणों और उनके उपचार के बारे में है।’

फिर वे थोड़े दुखी स्वर में बोले,  ‘दरअसल मेरे ग्रह अभी ठीक नहीं चल रहे हैं।घर में किसी न किसी वजह से अशांति बनी रहती है। वास्तु-विशेषज्ञ से पूछा तो उन्होंने अशांति की वजह यह बतायी कि हमारा टायलेट और किचिन साउथ-वेस्ट में है। टायलेट को नार्थ-वेस्ट और किचिन को साउथ-ईस्ट में ले जाना पड़ेगा।इसमें बीस-पचीस हजार का खर्चा होगा।’

मैंने सहानुभूति में कहा,’यह एक और सनीचर लग गया’

वे ठंडी साँस भरकर बोले,’क्या करें!जो लिखा है वह भोगना पड़ेगा।आप पत्रिका जल्दी भेज दें।मैं फटाफट पढ़ डालूँगा।’

मैंने जल्दी ही पत्रिका उनके पास भेज दी।फिर पन्द्रह-बीस दिन गुज़र गये, लेकिन उनका कोई फोन-वोन नहीं आया।धीरज खोकर मैंने उन्हें फोन किया।वे बोले,’गुरू दरअसल मैं तो वास्तुशास्त्र के चक्कर में फँसा रहा, इस बीच तुम्हारी पत्रिका मेरे साले साहब उठा ले गये।बड़े साहित्य-प्रेमी हैं।कहने लगे पहले मैं पढ़ूँगा।बस,मैं वापस ले लेता हूँ।एक दो दिन की बात है।’

फिर डेढ़ महीना बाद उन्हें फोन किया।जवाब मिला,’साले साहब कह रहे थे कि पत्रिका उनके ससुर साहब ले गये।वे भी घनघोर साहित्य-प्रेमी हैं।तुम्हारी रचना का अच्छा प्रसार हो रहा है।तुम चिंता मत करना।मैं पत्रिका वापस ले लूँगा।’

फिर एक दिन सड़क पर टकरा गये।बोले,’तुम्हारी पत्रिका तो साले साहब के ससुर के एक मित्र ले गये।वे भी बड़े पुस्तक-प्रेमी हैं।तुम्हारी रचना खूब पढ़ी जा रही है।’

छः महीने गुज़र जाने के बाद मैंने पारखी जी को फोन किया और निवेदन किया कि पत्रिका वापस कर दें,मुझे उसकी सख़्त ज़रूरत है।

वे बोले,’बंधुवर, फिलहाल तो पत्रिका का पता नहीं चल रहा है।साले के ससुर साहब के मित्र कुछ भुलक्कड़ हैं।उन्हें याद नहीं आ रहा है कि उन्होंने पत्रिका कहाँ छोड़ दी।वे उसे पढ़ भी नहीं पाये।उसमें उन्होंने एक सौ का नोट रख दिया था, वह भी चला गया।बेचारे बहुत परेशान हैं।’

फिर वे बोले,’आप ऐसा करो, पत्रिका की दूसरी प्रति मेरे पास भेज दो।मैं फटाफट पढ़ कर आपसे आपकी रचना पर चर्चा कर लूँगा।इस बार किसी को छूने भी नहीं दूँगा। आप निश्चिंत होकर भेज दो।आपकी रचना की प्रसिद्धि के लिए हमारी आलोचना ज़रूरी है।’

तब से मैं पारखी जी से बचता फिर रहा हूँ।मित्रों से पता चला है कि वे बेसब्री से पत्रिका की दूसरी प्रति का इंतज़ार कर रहे हैं।

© डॉ कुन्दन सिंह परिहार (मो. 9926660392)

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मराठी साहित्य – आलेख – जीवन त्यांना कळले हो – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

जीवन त्यांना कळले हो

(प्रस्तुत है जीवन में छोटी-छोटी  बातों में प्रसन्नता ढूँढने के लिए आपको प्रेरित करता सुश्री ज्योति हसबनीस जी  का यह आलेख । )

छोट्या छोट्या गोष्टीतून आनंद शोधणं , आणि त्या आनंदात हरवून जाणं , हा एक स्वभाव असतो . हा जर आपला स्थायी भाव असला तर प्रतिकूल परिस्थितीतदेखील अनुकूलता निर्माण करण्याचं कसब अंगी मुरतं , आणि सारंच साधं सोपं सरळ वाटू लागतं . कामाचे डोंगर त्यातल्या अवघड चढणींसकट सुकर होतात लीलया पार होतात .

घराचं छोटंसं रिनोव्हेशनचं काम काढलं तेव्हा कामगारवर्ग खुप जवळून परिचयाचा झाला माझ्या . त्यांच्या सवयी , लकबी , स्वभाव , साऱ्या कंगोऱ्यांसकट अनुभवास आलं माझ्या . सकाळी कामावर येतांना नीटनेटकी चापून चोपून साडी नेसलेली नीला आल्या आल्या शर्टाचा डगला चढवून चेहऱ्यावर ओढणी गुंडाळणार आणि केसांत ओढणीच्या कडेने दोन टप्पोरी शेवंतीची फुलं माळणार ! टेबलावर ठेवलेल्या मोठ्ठ्या आरशासमोर क्षणभर थबकणार आणि समाधानाने पुढे सरकणार ! हवं ते मिळाल्याचा आणि आवडतं ते साधल्याचा आनंद तिच्या चमचमत्या डोळ्यातून ओसंडून वाहणार ! हो ..रसिकतेला बंधनं कुठली ? फुलं सजवायला अगदी फुलदाणीचंच बंधन कशासाठी …फुलं सजवायला एक  छोटासा पाईपचा तुकडा देखील पुरतो , आणि तो ठेवायला , मातीचे ढिगारे जरी असले तरी एखादा कोपरा देखील मिळतो . थोडीशी वाळू आणि थोडंसं पाणी टाकून सजवलेली फुलं दिवसभरच्या नीरस कंटाळवाण्या कामात देखील चेहऱ्याची टवटवी अबाधित ठेवायला मनापासून मदत करतात ही तिच्या वृत्तीतली किती मोठी सकारात्मकता !

ग्रॅनाईट मोल्डिंग फिटिंग चं काम करणारा युसूफ सतत गुणगुणत राहणार किंवा मोबाईलची गुणगुण ऐकणार! आवडतं गाणं ऐकतांना त्याचा चेहरा असा काही लकाकणार की वाटावं सारी सुखं याच्या पायाशी लोळण घेतायत जणू ! जुगाड करून खोलीत लावलेला ट्यूबलाईट,त्या लाईटमध्ये अखंड चालणारे त्याचे हात , कसंबसं चार्जर सांभाळत , लटकत, गुणगुणणारा बापडा मोबाईल ,आणि सूरात सूर मिसळत कामात तल्लीन झालेला , चिवटपणे कामाचा फडशा पाडणारा युसूफ ..! खरंच सूरात आनंद शोधत भान विसरत , समाधानाने वाट्याला आलेलं काम प्रामाणिकपणे पार पाडण्यात खरी गंमत आहे ही किती सकारात्मक मानसिकता !

चहा, जेवण एकत्र घेतांनाचा त्यांचा आपसातला संवाद , हास्य विनोद म्हणजे एक प्रकारचा life on a lighter mode ची झलकच जणू ! खरंच छोट्या छोट्या गोष्टी देखील किती शिकवतात आपल्याला . हातातोंडाची मिळवणी असलेलं त्यांचं चाकोरीतलं आयुष्य , आणि त्या चाकोरीत जगतांनादेखील सुखाचे छोटे छोटे कण वेचणं , त्यातला आनंद लुटणं , त्यातलं आंतरिक समाधान आणि त्याची पसरलेली चेहऱ्यावरची तृप्ती सारंच अगदी हातात हात घालून वावरत असतं असं जाणवतं या मंडळींना बघून !

आंतरिक समाधान पैशाच्या सुबत्तेवर , समाजातल्या प्रतिष्ठेवर , सामाजिक स्थानावर अवलंबून असतं हे यांच्या कधी गावीही नसतं मग अशा प्रश्नांचं उलटसुलट जाळं विणण्यात त्याची उत्तरं शोधण्यात  आपण का रंगून जातो आणि काल्पनिक सुखाच्या मागे धावत छोट्या छोट्या आनंदाला मुकतो , आयुष्याची लज्जत आणि रंगतच हरवून बसतो ??

© ज्योति हसबनीस

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मराठी साहित्य – आलेख – प्रतिसाद – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

प्रतिसाद 

(यह सत्य है  कि ईश्वर ने  मानव हृदय को साद-प्रतिसाद  के  भँवर में उलझा कर रखा है जबकि प्रकृति अपना कार्य करती रहती है। उसे प्रतिसाद से कोई लेना देना नहीं है। इस तथ्य पर प्रकाश डालती यह रचना सुश्री ज्योति हसबनीस जी के संवेदनशील हृदय को दर्शाती है।) 

*पाऊस मनातला*….

 

मनातल्या पावसाची रूपं एक का असतात ? सहस्त्रधारांनी कोसळणारा पाऊस …आणि लक्षावधी रूपांनी त्याचं मनाचा ताबा घेणं  ,  कधी आत आत झिरपत माझ्यातल्या ‘मी’शी मुक्त संवाद साधणं …कधी आठवणींचं बेट गदागदा हलवत हलकेच एखादा हळवा सूर आळवणं …तर कधी चिंब भंवतालाला डोळ्यात साठवतांना घरट्यातली ऊब अनुभवणं … त्याच्या बेताल वागण्यावर माझं चिडणं..त्याच्या लयबद्ध पदन्यासावर माझं ठेका धरणं ..त्याच्या फसव्या रूपाला बळी पडणं …तर लोभस रूपाला डोळे भरून पाहणं …त्याचं भरभरून देतांनाचा कृतकृत्य भाव आणि सारं काही देऊन झाल्यानंतरचं इंद्रधनुषी हास्य …सारं सारं मनात तस्संच जपणं आणि प्रत्येक भेटीच्या वेळी असाच आहेस ना रे तू असं त्याला आसूसून विचारणं …!

शैशव आणि अबोघ वयातल्या पावसाचं भेटणं , त्याच्याशी केलेली दंगामस्ती , त्याने केलेली तनामनाची पार घुसळण साऱ्याच्या गोड आठवणी पहिल्या पावसाच्या मृद्गंधासारख्या असतात , भरून येऊ दे आभाळ की मन भरून आलंच , आठवणींची कुपी उघडलीच , मृद्गंध दरवळलाच !

पाण्याच्या खळाळात सोडलेल्या होड्या , डौलात जाणारी त्यांची स्वारी , बुडणार तर नाही ना असं शंकाकुल मन …बिंधासपणे टू व्हिलरवर मुक्तपणे अंगावर घेतलेला पाऊस …रेनकोटचा जामानिमा करत मुलांची केलेली शाळेतली पाठवणी ..आणि आता परत तितक्याच उत्साहात चिमुरड्या नातींबरोबर खळाळात सोडलेल्या रंगीत होड्या …एक कटाक्ष त्यांच्यांतले उत्सुक सचिंत भाव हेरण्यात गुंतलेला तर दुसरा नितळ निळ्या आकाशाचा वेध घेण्यात गुंतलेला !

खरंय ..जीवनचक्र हे असेच असते सृष्टीचक्र हे असेच असते !!

पाऊस येऊ दे ना दरचवर्षी पण त्याला भेटायला आतुरलेल्या मनाचं हे अस्संच असतं …!

पहिला शिडकावा पावसाचा होऊ दे की आठवणीच्या किर्र रानातले असंख्य काजवे सारं रान उजळीत मुक्तछंद आळवू लागतात ….आणि होते थाटामाटात एका दैदिप्यमान उत्सवाची सुरूवात ,  गडगडाटात , कडकडाटात आणि लखलखाटात …!

त्या लखलखाटात वसुंधरेचे भंवतालात झिरपलेले तृप्तीचे हुंकार असतात , तिच्या डोळ्यातली हिरवाईच्या डोहाळ्याची चमचमती स्वप्न असतात , अंगाखांद्यावर झुलणारी पाचूची बेटं असतात , तृणपात्यांच्या गळ्यातले पाणीदार मोत्यांचे सर असतात , मनोहर रंगीबेरंगी फुलांचा मोहक कशिदा असतो आणि अशा अपूर्व हिरव्या शालू शेल्याच्या साजातलं तिचं रूप अगदी उत्सवी असतं ,मंत्रमुग्ध करणारं असतं !

 

*ज्योति हसबनीस*

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हिन्दी साहित्य – आलेख – आज की पत्रकारिता – डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

आज की पत्रकारिता
(दिनांक 23 दिसंबर 2018 को कच्छी  जैन भवन जबलपुर में पत्रकार विकास मंच के तटवाधान में आयोजित पत्रकारिता पर डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ जी का व्याख्यान)
निज कबित्त केहि लाग न नीका
सरस होउ अथवा अति फीका
अपना काम, अपना नाम, अपना व्यवसाय किसे अच्छा नहीं लगता। वकील अपने व्यवसाय और अपनी जीत के लिए कितनी झूठी-सच्ची दलीलें देते हैं, हम सभी जानते हैं। डॉक्टर और दूकानदार अपने लाभ के लिए क्या झूठ नहीं बोलते?
तब पत्रकार बंधु कोई अलग दुनिया के तो हैं नहीं। इन्हें भी लाभ की आकांक्षा है, सारी दुनिया में लोग रोजी-रोटी से आगे भी कुछ चाहते हैं।
बस यही वह चाह है जो हमें ईमानदारी के मार्ग पर चलने से रोकती है। आज मैं कुछ ऐसी बातों का उल्लेख करना चाहता हूँ, जो कुछ पत्रकार बंधुओं  को अच्छी नहीं लगेंगी। दूसरी ओर ये वो बातें हैं जो समाज में  पत्रकारों के लिए आये दिन कही भी जाती हैं।
मेरा सभी बंधुओं से निवेदन है कि वे इन बातों एवं तथ्यों को व्यक्तिगत नहीं लेंगे।
आज के बदलते वक्त और परिवेश में पत्रकारिता के उद्देश्य एवं स्वरूप में जमीन-आसमान का अंतर हो गया है। अकल्पनीय परिवर्तन हो गए हैं।आईये, हम कुछ कड़वे सच और उनकी हक़ीक़त पर चिंतन करने की कोशिश करें।
सर्वप्रथम, यदि हम ब्रह्मर्षि नारद जी को पत्रकारिता का जनक कहें तो उनके बारे में कहा जाता है कि वे एक स्थान पर रुकते ही नहीं थे. आशय ये हुआ कि नारद जी भेंटकर्ता एवं घुमंतू प्रवृत्ति के थे.
आज की पत्रकारिता से ये गुण लुप्तप्राय हो गये हैं. इनकी जगह दूरभाष, विज्ञप्तियाँ और एजेंसियाँ ले रहीं हैं. सारी की सारी चीज़ें प्रायोजित और व्यावसायिक धरातल पर अपने पैर जमा चुकी हैं.
आज की पत्रकारिता के गुण-धर्म और उद्देश्य पूर्णतः बदले हुए प्रतीत होने लगे हैं. आजकल पत्रकारिता, प्रचार-प्रसार और अपनी प्रतिष्ठा पर लगातार ध्यान केंद्रित रखती है.
पहले यह कहा जाता था कि सच्चे पत्रकार किसी से प्रभावित नहीं होते, चाहे सामने वाला कितना ही श्रेष्ठ या उच्च पदस्थ क्यों न हो, लेकिन अब केवल इन्हीं के इर्दगिर्द आज की पत्रकारिता फलफूल रही है.
आज हम सारे अख़बार उठाकर देख लें, सारे टी. वी. चेनल्स देख लें. हम पत्र-पत्रिकाएँ या इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री देख लें, आपको हर जगह व्यावसायिकता तथा टी. आर. पी. बढाने के फार्मूले नज़र आएँगे. हर सीधी बात को नमक-मिर्च लगाकर या तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का चलन बढ़ गया है. बोला कुछ जाता है, समाचार कुछ बनता है. घटना कुछ होती है, उसका रूप कुछ और होता है.
कुछ समाचार पत्र एवं चेनल्स तो मन माफिक समाचारों के लिए एजेंसियों की तरह काम करने लगे हैं. इससे भी बढ़कर कुछ धनाढ्य व्यक्तियों अथवा संस्थानों द्वारा बाक़ायदा अपने समाचार पत्र और टी. वी. चेनल्स संचालित किए जा रहे हैं. हमें आज ये भी सुनने को मिल जाता है कि कुछ समाचार पत्र और चेनल्स काला बाज़ारी पर उतार आते हैं.
मैं ऐसा नहीं कहता कि ये कृत्य हर स्तर पर है, लेकिन आज इस सत्यता से मुकरा भी नहीं जा सकता.
आज की पत्रकारिता कैसी हो? तो प्रतिप्रश्न ये उठता है कि पत्रकारिता कैसी होना चाहिए?
पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सामाजिक घटनाओं और गतिविधियों को समाज के सामने उजागर कर जन-जन को उचित और सार्थक दिशा में अग्रसर करना है.
हमारी ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपराओं के साथ ही उनकी कार्यप्रणाली से भी अवगत कराना पत्रकारिता के कर्तव्य हैं.
हर अहम घटनाओं तथा परिस्थिजन्य आकस्मिक अवसरों पर संपादकीय आलेखों के माध्यम से समाज के प्रति सचेतक की भूमिका का निर्वहन करना भी है.
एक जमाने की पत्रकारिता चिलचिलाती धूप, कड़कड़ाती ठंड एवं वर्षा-आँधी के बीच पहुँचकर जानकारी एकत्र कर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ हमारे समक्ष प्रस्तुत करने को कहा जाता था,
लेकिन आज की पत्रकारिता वातानुकूलित कक्ष, अंतर-जाल, सूचना-तंत्र, ए. सी. वाहनों और द्रुतगामी वायुयान-हेलिकॉप्टरों से परिपूर्ण व्यवस्थाओं के साथ की जाने लगी है, लेकिन बावज़ूद इसके लगातार पत्रकारिता के मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है.
आज आपके मोहल्ले की मूलभूत समस्याओं को न्यूज चेनल्स या समाचार पत्रों में स्थान नहीं मिलता, लेकिन निरुद्देशीय किसी नेता, अभिनेता या किसी धार्मिक मठाधीश के छोटे से क्रियाकलाप भी  प्रमुखता से छापे या दिखाये जाएँगे. ऐसा क्यों है? इसके पीछे जो कारण हैं वे निश्चित रूप से विचारणीय हैं? यहाँ पर इसका जिम्मेदार आज की  उच्च जीवन शैली, लोकप्रियता एवं महत्त्वाकांक्षा की भावना को भी माना जा सकता है.
हर छोटा आदमी, बड़ा बनाना चाहता है और बड़ा आदमी, उससे भी बड़ा.
आख़िर ये कब तक चलेगा ? क्या शांति और सुख से मिलीं घर की दो रोटियों की तुलना हम फ़ाइव स्टार होटल के खाने से कर सकते हैं?
 शायद कभी नहीं.
 हर वक्त एक ही चीज़ श्रेष्ठता की मानक नहीं बन सकती. यदि ऐसा होता तो आज तुलसी, कबीर, विनोबा या मदर टेरेसा को इतना महत्त्व प्राप्त नहीं होता.
जब तक हमारे जेहन में स्वांतःसुखाय से सर्वहिताय की भावना प्रस्फुटित नहीं होगी, पत्रकारिता के मूल्यों में निरंतर क्षरण होता ही रहेगा.
आज हमारे पत्रकार बन्धु निष्पाप पत्रकारिता करके देखेंगे तो उन्हें वो पूँजी प्राप्त होगी जो धन-दौलत और उच्च जीवन शैली से कहीं श्रेष्ठ होती है.
आपके अंतःकरण का सुकून, आपकी परोपकारी भावना, आपके द्वारा उठाई गई समाज के आखरी इंसान की समस्या आपको एक आदर्श इंसान के रूप में प्रतिष्ठित करेगी.
आज के पत्रकार कभी आत्मावलोकन करें कि वे पत्रकारिता धर्म का कितना निर्वहन कर रहे हैं.
कुछ प्रतिष्ठित या पहुँच वाले पत्रकार स्वयं को अति विशिष्ट श्रेणी का ही मानते हैं. ऐसे पत्रकार कभी ज़मीन से जुड़े नहीं होते, वे आर्थिक तंत्र और पहुँच तंत्र से अपने मजबूत संबंध बनाए रखते हैं.
लेकिन यह भी वास्तविकता है कि ज़मीन से जुड़ी पत्रकारिता कभी खोखली नहीं होती, वह कालजयी और सम्मान जनक होती है.
हम देखते हैं, आज के अधिकांश पत्रकार कब काल कवलित हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता और न ही कोई उन्हें याद रखने की आवश्यकता महसूस करता।
आज पत्रकारिता की नयी नयी विधियाँ जन्म ले चुकीं हैं. डेस्क पर बैठ कर सारी सामग्री एकत्र की जाती है, जो विभिन्न आधुनिक तकनीकि, विभिन्न एजेंसियों एवं संबंधित संस्थान के नेटवर्क द्वारा संकलित की जाती हैं. इनके द्वारा निश्चित रूप से विस्तृत सामग्री प्राप्त होती है,
 लेकिन डेस्क पर बैठा पत्रकार / संपादक प्रत्यक्षदर्शी न होने के कारण समाचारों में वो जीवंतता नहीं ला पाता, समाचारों में वो भावनाएँ नहीं ला पाता, क्योंकि वो दर्द और वो खुशी समाचारों में आ ही नहीं सकती, जो एक प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार की हो सकती है.
आज के कुछ प्रेस फोटोग्राफर पीड़ित, शोषित अथवा आत्मदाह कर रहे इंसान की मदद करने के बजाय फोटो या वीडियो बनाने को अपना प्रथम कर्त्तव्य मानते है और दूसरे प्रेस फोटोग्राफर्स को कॉल करके बुलाते हैं। वह दिन कब आएगा जब वे कैमरा फेंककर मदद को दौड़ेंगे? जिस दिन ऐसा हुआ वह दिन पत्रकारिता के स्वर्णिम युग की शुरुआत होगी।
मेरी धारणा है कि यदि आपने पत्रकारिता को चुना है तो समाज के प्रति उत्तरदायी भी होना एक शर्त है अन्यथा आपका जमीर और ये  पीड़ित समाज आपको निश्चिंतता की साँस नहीं लेने देगा।
हम अपने ज्ञान, अनुभव, लगन तथा परिश्रम से भी वांछित गंतव्य पर पहुँच सकते हैं, बस फर्क यही है कि आपको अनैतिकता के शॉर्टकट को छोड़कर नैतिकता का नियत मार्ग चुनना होगा। पत्रकारिता को एक बौद्धिक, मेहनती, तात्कालिक एवं कलमकारी का जवाबदारी भरा कर्त्तव्य कहें तो गलत नहीं होगा।
धन तो और भी तरह से कमाया जा सकता है, लेकिन पत्रकारीय प्रतिष्ठा का अपना अलग महत्त्व होता है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है और लोकतंत्र के इस स्तम्भ की हिफाजत करना हम सब का दायित्व है।
अंततः निष्कर्ष यह है कि पत्रकारिता यथा संभव यथार्थ के धरातल पर चले, अपनी आँखों से देखे, अपने कानों से सुने और पारदर्शी गुण अपनाते हुए समाज को आदर्शोन्मुखी बनाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे, आज विकृत हो रहे समाज में ऐसी ही पत्रकारिता की ज़रूरत है।
© विजय तिवारी  “किसलय”, जबलपुर 

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – पोथी पढ़ि पढ़ि : ढ़ाई से तीन होते अक्षर – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन 

पोथी पढ़ि पढ़ि : ढ़ाई से तीन होते अक्षर
(प्रस्तुत है श्री शांतिलाल जैन जी का नवीन व्यंग्य जिसमें सभ्यता के विकास  के नवीनतम दौर में युवा डेटिंग के तीन अक्षर पढ़कर पंडित हो रही बिंदास और बेफ़िक्र युवा  पीढ़ी की विचारधारा को परत दर परत उघाड़ा है। )
ये सभ्यता के विकास का नवीनतम दौर है जिसमें युवा डेटिंग के तीन अक्षर पढ़कर पंडित हो रहे हैं – बिंदास और बेफ़िक्र
“अंकल मैं परसों नहीं आ पाऊंगा. मेरी डेट है.”
“रविवार को कौनसी कोरट कचहरी खुली रहती है जो तुम्हारी डेट है ?”
“वो नहीं अंकल – लव वाली डेट. आई ऐम गोइंग ऑन डेट विथ माय न्यू डेट.” – भतीजे आर्यन का ये कथन यमक अलंकार का अंग्रेजी प्रयोग नहीं है श्रीमान. यहाँ पहला डेट शब्द रोमांस के लिए प्रयोग किया गया है और दूसरा श्रेया के लिए. मैंने कहा – “अगले रविवार को चले जाना. घर में सत्यनारायण की कथा रखी है और तुम नहीं आओगे ?”
“नहीं ना अंकल. बड़ी मुश्किल से श्रेया तैयार हुई है. कब से उसे ट्राई कर रहा था. तीन बार अथर्व के साथ डेट पर जा चुकी है. फर्स्ट टाईम मेरे साथ जाने वाली है. मना कर दूंगा तो वो मुझे कॉवर्ड समझेगी और फ्रेंड्स बैकवर्ड.”
“तुम पहले भी तो किसी के साथ कहीं गए थे ?”
“मैं ना अवनि को दो बार और कनु को एक बार डेट कर चुका हूँ. वे मुझे लाईफ पार्टनर के लायक लगी नहीं. नाऊ, देखते हैं इफ श्रेया से मैच हो पाता है तो.”
“उनको कैसे जानते थे तुम ?”
“टिंडर पर मुलाकात हुई थी अंकल. डेटिंग का बेस्ट ऐप है. मैंने अवनि की प्रोफाइल देख कर राईट स्वाईप करा उसने मेरा प्रोफाइल देख कर राईट स्वाईप करा – मैच हो गया. एक दूसरे से चैट करी और एक दूसरे के डेट हो गए.”
“अभी कहाँ है वो ?”
“पता नहीं अंकल. दो बार की डेटिंग के बाद शायद उसने मुझे लेफ्ट स्वाईप कर दिया है. फिनिश. नाऊ नो इन्फो. वोई कनु के साथ भी हुआ.”
“तुम्हारी दो एक्स हैं !!”
“कम है अंकल. आजकल दो-तीन एक्स तो ये जो गाँव-वाँव से पढ़ने आते हैं उनके होते हैं. कमला, विमला, किशन, गणेश टाईप के लड़के-लड़कियाँ. कॉलेज में जिसके जितने ज्यादा एक्स वो उतना ही एडवांस. विमला तो डिप्रेशन में चली गयी है. थर्ड ईयर में आ गई है बट अभी तक उसका एक भी ब्वॉय फ्रेंड नहीं बन पाया.”
“ओके,  डैड को क्या कहोगे ? घर में इतने मेहमान होंगे और तुम ?”
“वोई तो टेंशन है अंकल. बट आप हो ना ! प्लीज डैड को भी संभालियेगा. कथा पिछलेबार वाली है ना. यू टेक केयर ऑफ़ लीलावती एंड कलावती. मेरा तो श्रेया के साथ जाना बहुत जरूरी है, नहीं गया तो लॉस हो जाएगा.”
“कैसा लॉस ?”
“वो क्या है अंकल कि सुब्बी बहुत कपड़े फाड़ रहा है. श्रेया को डेट करना चाह रहा था. टिपिकल साउथ इंडियन. ईडियट अभी तक चांवल में रसम मिलाकर हाथ से खाता है. और क्या तो नेम उसका – सुब्रा… आगे क्या था वो …मण्यहम. सुब्रामण्यहम. श्रेया तो उसका नाम बोल भी नहीं पाती. उसने तो सुब्बी को ब्लॉक कर दिया है. लेकिन अक्की है, अनिंदो है, विरल है. श्रेया को डेट करने की विश करने वालों की लाईन लगी है अंकल. मैं कथा में आया तो फ्रेंड्स में मेरी कथा हो जायेगी, प्लीज.”
“चलो ठीक है – बीच में टाईम मिले तो आकर के प्रसाद ले जाना उसके लिये.”
“अपन की कौनसी लता-पत्र-बेल होनेवाली है अंकल. फोर्टी किलोमीटर दूर है रिसोर्ट, बीच में कैसे आ पायेंगे ? सारा इन्वेस्टमेंट वेस्ट हो जाएगा.”
“प्रेम में इन्वेस्टमेंट कैसा ?”
“अंकल, कॉस्टली पड़ती है डेटिंग. इटालियन फरेरो के चोकलेट्स ले जाने पड़ते हैं. अरमानी का परफ्यूम लगाना पड़ता है. जीन्स तो फटी हुई चल जाती है बट टी शर्ट डेट की लाईक की होना. श्रेया को मेजेंटा पसंद है – मैंने फ्लोरिस्ट को बोलकर मेजेंटा कलर की ट्यूलिप का बुके आर्डर किया है. बाय-द-वे, आपने भी तो आंटी को डेट किया होगा कभी ?”
“घोड़े की नाल ठुके जूते का तला दिखाकर तुम्हारे दादाजी ने कहा था – लड़की देखने जा रहे हो तो ज्यादा सवाल मत करना. मुँह से निकले तो बस ये कि लड़की पसंद है. तब से न तुम्हारी काकी को किसी और का ख्याल आया न मुझे.”
“आपके जमाने ईश्क नहीं किया करते थे ?”
“करते थे राजकपूर नर्गिस टाईप के लोग सेल्युलाईड के पर्दे पर या शिरी-फरहाद कहानियों में.”
“फरहाद बेवकूफ था अंकल. पहाड़ तोड़ कर नहर बनाने में जान दे दी. पहाड़ के उस पार जो नेटवर्क अवेलेबल होता – एक सिम उस कंपनी की भी ले सकता. हर डेट के लिए अलग अलग सिम. लक्झरी कॉटेजेस बने हैं पहाड़ पे. ईजिली डेट कर सकते थे दोनों. जान क्यों देने का ?”
“उस पवित्र प्रेम को तुम समझ नहीं पाओगे आर्यन. जस्ट गो एंड एन्जॉय.”
“एन्जॉय नहीं अंकल ये तो लाईफ के स्ट्रगल हैं. लव करना इतना आसान नहीं है. बहुत स्ट्रगल करना पड़ता है ! टेंशन सा बना रहता है कब कौन अपन की डेट को अपनी डेट बना ले. अपनी वाली को सेव करते हुवे दूसरे की को डेट पर ले जाने में बहुत एफर्ट्स लगते हैं.”
ठीक ही कह रहा होगा आर्यन. युवा पीढ़ी पर आधे अक्षर का अतिरिक्त बोझ आ गया है. कभी प्रेम के ढ़ाई अक्षर पढ़कर पंडित हुआ जा सकता था अब तीन अक्षर डेटिंग के पढ़ने पड़ते हैं. लेकिन इससे भगवान का काम आसान हो गया है – अब उनको जोडियाँ स्वर्ग से बना कर भेजना नहीं पड़तीं. बच्चे खुद बना लेते हैं. ‘ओके’ – मैंने कहा.
कुछ क्षणों के बाद……. “खड़े क्यों हो ? जाओ तुम्हें देर होगी.”
“वो अंकल …फ्यू बक्स मिल जाते तो… ज्यादा नहीं… ओनली फाइव-के…. मना मत करना माय डियरेस्ट अंकल. मेरी सर्विस लगने ही वाली है. आई विल रिटर्न…. अंकल प्लीज. नई डेट है, बिल को फुट नहीं किया तो वो फिर से अथर्व के साथ चली जायेगी…थैंक यू अंकल… बाय…..डैड को मत बताना.”
आर्यन मुद्राएँ भी ले गया, इज़ाज़त भी, और श्रेया को तो ले ही गया होगा. ये सभ्यता के विकास का नवीनतम दौर है जिसमें युवा डेटिंग के तीन अक्षर पढ़कर पंडित हो रहे हैं – बिंदास और बेफ़िक्र
© श्री शांतिलाल जैन 
मोबाइल : 9425019837

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मराठी साहित्य – आलेख – प्रतिसाद – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

प्रतिसाद 

(यह सत्य है  कि ईश्वर ने  मानव हृदय को साद-प्रतिसाद  के  भँवर में उलझा कर रखा है जबकि प्रकृति अपना कार्य करती रहती है। उसे प्रतिसाद से कोई लेना देना नहीं है। इस तथ्य पर प्रकाश डालती यह रचना सुश्री ज्योति हसबनीस जी के संवेदनशील हृदय को दर्शाती है।) 

सरलेली संध्याकाळ, अलगद होणारं निशेचं आगमन, उगवतीचा चंद्र आणि आकाशातल्या चांदण्यांशी स्पर्धा करणारी चांदणफुलं अंगभर दिमाखाने मिरवणारा , दैवी सुगंधाने सारा भंवताल भारून टाकणारा डौलदार प्राजक्त ..

आषाढाचे मेघ , श्रावणाची सर सारं काही अंगाखांद्यावर झेलून तृप्तीच्या हुंकारात लाल ,पिवळ्या ,गुलाबी ,जांभळ्या रानफुलांनी नटलेली देखणी सह्यपठारे ..उष:कालची तांबूस पिवळी आभा पांघरत कोवळ्या सूर्यकिरणांत लखलखणारी हिमशिखरे ..आपल्या ऋतुचक्रात सातत्य राखणारा निसर्ग असं विविधरंगी दर्शन देत साद घालत असतो , आणि आपण जसं जमेल तसं कधी अनाहूतपणे तर कधी आवर्जून याची दखल घेत प्रतिसाद देत असतो ,सृष्टीची ही रूपं नवलाईने न्याहाळत असतो , त्यातल्या अपूर्वाईच्या गोडीने नादावून जात असतो .

खरं तर साद -प्रतिसाद हा खेळ मानवाचा , निसर्गाला त्याच्याशी काय देणं घेणं ? तुमच्या कौतुकाने तो काही बहर वाढवणार नाही की प्रतिसाद मिळाला नाही म्हणून बहर आवरता घेणार नाही …मी केलं हे सारं , हा त्याचा पुसटसा देखील अभिनिवेशही नाही …पण हाडामासाच्या जित्या जागत्या माणसाचं तसं नाहीय ना ! माणसाला देवाने अतिशय तरल आणि संवेदनशील  ‘मन’ बहाल केलंय आणि साद – प्रतिसादाच्या खेळांत त्याला पुरतं अडकवलंय ! अपेक्षांचं ओझं खांद्यावर वागवत , जमेल तसा त्याचा भार हलका करत असतांना , हक्काच्या गोतावळ्यातला एखादा कौतुकाचा कटाक्ष त्याला कृतकृत्य करतो ! मस्त मेन्यू आखून दिवसभर खपून छान बेत जुळवून आणला आणि ‘काय छान झालंय सगळं’ अशी हवीहवीशी दाद देत पदार्थांचा आस्वाद घेऊन मंडळी तृप्त झाली की मिळालेल्या प्रतिसादाने मन सुखावतंच ! मैफलीतली वाद्यांची रंगलेली जुगलबंदी , रसिकांच्या टाळ्यांच्या कडकडाटाविना अपुरीच होय ! ..काळजाचा वेध घेत आत अलवारपणे झिरपणारे सूर कानात साठवत उत्सफूर्तपणे तोंडातून निघणारा ‘ वन्स मोअर ‘आणि तो ऐकल्यावर गोडसं हसून तितक्याच तडफेने पुन: ती गझल ऐकवणारा कलाकाराचा आनंदाने उजळणारा चेहरा ह्या प्रतिसादाचं बोलकं रूपच नव्हे काय ?

स्वान्तसुखाय अनेक गोष्टी आपण करतो . आपले छंद तर स्वान्त सुखायच असतात ! छंद मग तो रांगोळी रेखाटण्याचा असो , लेखनाचा असो , समाजाप्रति  काही देणं लागतो ह्या जाणीवेतून अनेक संस्थांमध्ये कार्यरत राहून त्या संस्थांच्या कार्यशैलीत झोकून देता देता आपलं स्वत:चं एक स्थान तिथे निर्माण करण्याचा प्रयत्न देखील त्या छंदाची दुसरी बाजूच नव्हे काय ? आणि हे सारं मिळणाऱ्या प्रतिसादावरच अवलंबून असणार ना! स्वान्तसुखाय जरी माणूस हे सारं करत असला तरी योग्य त्या व्यासपीठाद्वारे  स्वत:तल्या कलागुणांचं प्रगटन करण्याचा त्याचा स्थायीभावच असतो . आणि योग्य त्या प्रतिसादानेच हे कलागुण बहरतात हे वास्तव आहे ! आणि तसे ते बहरायलाच हवेत ! त्यांना प्रतिसाद हा मिळायलाच हवा !

स्त्री स्वत:साठीच साजशृंगार करत असली तरी , तिच्या साडीचं , निवडीचं , केलेलं कौतुक तिला सुखावून जातं , पाठवलेला लेख खुप आवडला असं जेव्हा मोबाईलवरून कळवलं जातं तेव्हा मोरपीस फिरतंच ना गालावर ..! आणि प्रतिसादाच्या अपेक्षेनेच तर मोबाईल नंबरही देत असतो ना आपण पेपरमध्ये !

*प्रतिसाद* ..केलेल्या कामाची पोचपावती ..परिश्रमाचं कौतुक हे सारं सारं माणसाचं जीवन सुखकर बनवण्यात खुप मोठ्ठी भूमिका बजावतं ! जितक्या तत्परतेने हाकेला ओ दिली जाते तितक्याच तत्परतेने साद घातली असता प्रतिसाद ही मिळावा …तृप्तीची साय ही त्याविना धरलीच नाही जाणार माणसाच्या जीवनावर !!

© ज्योति हसबनीस

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English Literature – Book-Review/Abstract – Can I have this chance – Ms. Neelam Saxena Chandra

Can I have this chance

A novel by Authors Press written by Ms. Neelam Saxena Chandra. 

(This is a story about courage, justice, love, sacrifices, a quest for the truth, and crucial choices, all revolving around the life of a simple woman from India, but with a fire in her eyes to prove herself.)

About the Book :  “Avantika, a fiery young journalist, is about to board a flight to New York to pay a visit to the Editor of The New York Times, to consider a job offer she received as a result of her hard work and determination as a crime journalist in India. Little does she know that this one brief trip will change her life forever. Minutes before boarding her flight, she receives a proposal, which leads her to a very imperative decision – career against love. She tries postponing the impending decision, to enjoy her short voyage. Suddenly, in the midst of her turbulent thoughts, she notices a man walking up the aisle of the aeroplane, a gun in hand. Before she manages to digest this news and the fact that the plane is far away from civilisation, hovering somewhere above the Atlantic; with a jolt, she realises that the hijacker is a man she recognises- a man from her past! From the villages of North India, to the posh highways of New York, this is a story about courage, justice, love, sacrifices, a quest for the truth, and crucial choices, all revolving around the life of a simple woman from India, but with a fire in her eyes to prove herself. Read on, to find out more.”

Excerpts from the book – Can I have this chance

Sunil looked at her adoringly. Could he really bid farewell to a gal who had been not only his companion at work but also in his every personal turmoil? It was indeed impossible for him. This was his last chance and he wanted to have it. He had hoped till the last moment that she would come and say, “Hey, Sunil! I have cancelled my journey and I am not going to the US of A anymore. I wish to be here, with you. And…and I agree to your proposal.”

Sunil had been in love with Avantika right since the time she had joined his newspaper ‘MAGMA’ as a journalist, specialising in the crime section. In fact, it was he who had chosen her for the job despite opposition from all his senior colleagues. He had somehow felt the lava and the desire to do something hidden deep inside her. This, combined with her intelligence had made him choose her from among a flock of candidates who had come for the interview – some much more experienced and qualified than her. In fact, she had just barged into his room from nowhere and was not even a candidate registered with them.

Sunil had never been proved wrong. Avantika had substantiated each day that his choice had been THE right choice. MAGMA had been begun with the intent of exposing the corrupt wolves in society without any bias. And Avantika had been performing amazingly well –  revealing and uncovering the so-called respectable front runners  of society. MAGMA had, in fact, begun an amazing revolution in the country which had set off chain reactions. The surrender of Bajju bhaiya had been one of the most astonishing incidents which had led the nation into thinking mode. Of course, it was Avantika who had handled the case.

However, it was not only on professional front that Sunil would be missing Avantika. Their relationship had blossomed from colleagues to close friends soon enough. Their close proximity and understanding of each other had made Sunil fall in love with her. He respected her, he admired her, he was in awe of her and he also adored her. It was not the sort of love which only craves for physical oneness – but the one which yearns for oneness of the soul. He had indicated the same to Avantika sometimes indirectly and at other times, directly; however, she had always laughed at his proposals.

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