सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ आलेख ☆ उम्मीद के हस्ताक्षर, नव किरणों पर… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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एक जनवरी की प्रातः किरणों को उम्मीद के हस्ताक्षर सौंपने की प्रथा पुरानी है। हर वर्ष आशा का अनुप्रास। मनुष्य का मन है ही ऐसा। सूर्य हमेशा की तरह उजास, उर्जा और हौसलों के हस्तांतरण का काम बखूबी करता है।
इसी आधार पर ज्योतिष एवं अंकज्योतिष के अनुसार नूतन वर्ष को “सूर्य का वर्ष” कहा गया है। चीनी ज्योतिष के अनुसार यह “year of the fire horse”घोषित किया गया है। जिसका इशारा दीप्ति, तेज, गति और समता की ओर है। इसे नवाशा, नवाचार, ऐश्वर्य, और जगमगाते हुये भविष्य को आमंत्रण भी कह सकते हैं।
भारत में अलग अलग प्रदेशों ने अपने परिवेश के मुताबिक थीम चुनी है। यथा म प्र ने “समृद्ध किसान समृद्ध प्रदेश”—-!
हमेशा की तरह नव वर्ष के लिए कोई रेजोल्यूशन पास करना यानी अपने ही मन को कुछ अच्छा करने के लिए संकल्पित करना है। बेशक कोई प्रस्ताव महीने दो महीने से अधिक न चल पाये। गायब हो जाए जैसे गधे के सिर से सींग।
सूर्योदय से ज्यादा ताल्लुक न रखनेवाली जेन जी और अल्फा, रात्रि में न्यू ईयर बैश का इन्तजाम करती है। मादक द्रव्य और उत्तेजक धुनों पर थिरकती हुई बेखयाली का मौसम रचती है, और अपने आधुनिकताबोध पर गर्वित होती है। कुदरती अंधेरे और कृत्रिम उजालों के बीच होता है जश्न। दरअसल एक जनवरी का जश्न खान पान, नृत्य गीत, और रोशनी के सम्मोहन के बीच खुद को दिया जाने वाला आश्वासन है कि हम कुछ अच्छा ही करेंगे।
युवाओं के करियर को लेकर, वयस्कों के लिये भावी की रूपरेखा और महिलाओं का अपने संघर्ष और वजूद को आकार देने के विचार से जोड़ना अहम है, पर जमीनी सच के साथ।
कितने ही लोगों का नया साल मोबाइल की आभासी जमीन पर उतरता है।
क्या ही अच्छा हो कि हम फोन पर छः सात घंटे डेरा डालने की बजाय “डिजिटल डिटाॅक्स “को संकल्पित हों। “जाॅम्बी स्क्राॅल” अवसादग्रस्त, बिखरे हुये मन का पता देता है।
A.I का सही इस्तेमाल भी 2026 को बहुत कुछ दे सकता है।
कोई अंतरिक्ष यात्री बनने का ख्वाब भी तो पाले। ताकि शुभांशु शुक्ला की तरह स्पेस में हर दिन 16 सूर्योदय और 16 सूर्यास्त देख सके। चाहत का एक मंज़र ये भी है।
विकास के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि चढ़ रही है। चिपको आन्दोलन का इतिहास दोहराना कितने पसंद करेंगे। A.Cकी जगह पेड़ लगाने और साइकिल चलाने का इरादा करेंगे।
पर्यावरण के छद्म रक्षक खुश हैं कि जमाना पेपरलेस हो रहा है पर कितने जानते हैं कि डिजिटल इंडिया के पीछे ध्वंस भी है। चैट जी पी टी से एक सवाल पूछने में गूगल सर्च से 10 गुना बिजली खर्च होती है। पानी, बिजली आदि की अमाप खपत।
सवाल उठता है कितने संकल्प खुद के लिये और कितने देश की खातिर !लोकतंत्र भारत का स्वभाव है। हम में ऐसा ही जज़्बा पैदा हो। न हम हैली गुब्बी ज्वालामुखी की तरह फूटें न मोम की तरह दबते रहें। एक मानवीय दृष्टिकोण के विकास की पहल होनी चाहिए।
बड़े सपने देखना गुनाह नहीं पर बेपर की उड़ानों में रोमांच न ढूँढा जाए।
सिविक सेंस का अकाल और पाखण्डी बाबाओं का रूख चिन्तनीय है। क्या हम नव वर्ष में इनसे निजात पाने की सोच को सहारा देंगे।
ताजा दौर में सबसे भयानक है फोमो (fear of missing out) मुख्य धारा से खुद के अलग थलग पड़ जाने का एहसास। यही सारे अतरंगी कारनामे करवाता है।
कठपुतलियों और तोतों से कुछ न सीखने की प्रतिज्ञा कर पाएंगे। राष्ट्रनिर्माण में यही प्रमुख घटक होगा। रूजवेल्ट ने कहा था-“जो राष्ट्र अपनी मिट्टी को नष्ट करता है वह खुद को नष्ट कर देता है। “यहां मिट्टी से आशय अपने गौरव विरासत खूबियां और देश प्रेम से है। आइए हम अपनी मिट्टी की गंध को पहचानें। ।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





