श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
🌱 रामधारी सिंह दिनकर: राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज 🌷
आज जब हम भारत के लोकतंत्र के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो कुछ नाम केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि युगों की धड़कन बन जाते हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उनमें से एक थे—जो अपनी ओजपूर्ण वाणी, देशभक्ति की अटूट भावना और दूरदृष्टि के लिए जाने जाते थे। उनका जीवन राष्ट्र को समर्पित एक यज्ञ था।
दिनकर जी की निष्ठा, पद या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि केवल राष्ट्र के प्रति थी। वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हृदय के निकट थे, फिर भी जब चीन के हाथों 1962 में भारत की पराजय हुई, तो उन्होंने राज्यसभा में खड़े होकर सत्ता के मोह को तोड़ दिया। उनकी वाणी में वह अग्नि थी जो किसी भी शासक को कर्तव्य की याद दिलाती है:
”रे रोक जहाँ-तहाँ मत शंख, देशभक्तों का दल भारी है।
वह बिना कहे ही चलता है, वह शक्ति राष्ट्र की न्यारी है।”
उनकी यह निर्भीकता बताती है कि उन्होंने राष्ट्र को हमेशा सर्वोपरि माना, और उनकी संवेदनशीलता उन्हें जनता के दुःख से विचलित कर देती थी।
समय बदला। सत्ता की बागडोर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ में आई। यह सत्य है कि इंदिरा जी भी दिनकर का सम्मान करती थीं और उन्हें उनकी साहित्यिक गरिमा के अनुरूप आदर देती थीं। मगर दिनकर एक कवि और द्रष्टा थे; उन्हें भविष्य की आहटें सुनाई देती थीं। 1974 तक आते-आते, उन्हें सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण की स्पष्ट अनुभूति होने लगी थी।
उनके निकटस्थ मित्रों और समकालीनों के संस्मरण बताते हैं कि उन्हें इंदिरा गांधी की नीतियों में घोर तानाशाही प्रवृत्तियाँ झलकने लगी थीं। यह किसी व्यक्तिगत द्वेष का विषय नहीं था, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य की गहरी चिंता थी।
यही वह चिंता थी जो उन्हें 1974 में मद्रास (चेन्नई) खींच लाई, जहाँ वह रामनाथ गोयनका और जयप्रकाश नारायण (जेपी) के साथ एक अति गोपनीय और गहन विमर्श में शामिल हुए। ‘तुगलक’ के संपादक गुरुमूर्ति ने पुष्टि की है कि इन तीन महान विभूतियों की अंतिम बैठक का केंद्रीय विषय यही था: सत्ता का बढ़ता दमनकारी स्वरूप।
संभवतः दिनकर ने गोयनका से अपनी चिंता साझा करते हुए और जेपी को प्रेरित करते हुए कहा होगा:
“जयप्रकाश, अब समय आ गया है। इस देश को आपकी आवश्यकता है। यदि अब भी क्रांति का शंखनाद नहीं हुआ, तो लोकतंत्र का सूर्य अस्त हो जाएगा।”
दिनकर ने केवल आग्रह ही नहीं किया, बल्कि क्रांति की पृष्ठभूमि को अपनी कलम से अमर भी कर दिया। उन्होंने देश की जनता को उसकी सर्वोच्च शक्ति का एहसास कराने के लिए एक कालजयी कविता भी तैयार कर दी, जो उनके जीवन की अंतिम राजनीतिक भेंट सिद्ध हुई:
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
इस गहन राजनीतिक और वैचारिक उथल-पुथल के बीच, वे तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए गए। यहाँ उनकी संवेदनशीलता और त्याग का अद्भुत दर्शन हुआ। उन्होंने बीमार और संघर्षरत जयप्रकाश नारायण की लंबी आयु के लिए प्रार्थना की, यह इच्छा व्यक्त करते हुए कि उनकी शेष आयु भी जेपी को लग जाए—क्योंकि उस क्षण राष्ट्र को एक कवि से अधिक एक निर्भीक क्रांतिदूत की आवश्यकता थी।
और नियति का चक्र देखिए! उसी यात्रा से लौटकर, 24 अप्रैल 1974 की रात, रामनाथ गोयनका के आवास पर ही, इन दोनों महान मित्रों (जेपी और गोयनका) के सान्निध्य में, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अंतिम साँस ली।
दिनकर की मृत्यु, आपातकाल (1975) के ठीक पहले, लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक मूक बलिदान बन गई। उनकी कविता जनता के हाथों में मशाल बनी, और उनकी आत्मा की शांति उस ‘संपूर्ण क्रांति’ में समा गई, जिसके लिए उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आग्रह किया था। वह सिर्फ एक कवि नहीं थे; वह राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज थे—दूरदर्शी, संवेदनशील, और सदैव राष्ट्रहित के प्रति समर्पित।
© श्री जगत सिंह बिष्ट
साधक
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈





