सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ कविता ☆ 🌋 इन दिनों🌋 ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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कानों में रस घोलती है इन दिनों ।
धूप जैसे चाँदनी है इन दिनों ।।
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भूरी भूरी बर्फ सी दिखती है साँझ
आँच की अनुरागिनी है इन दिनों ।।
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है हरसूं नशीली खुशबू धुएं की
इत्र की बरखा है यानी इन दिनों ।।
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तितली सी पल्लू उड़ाती है किरण
मखमली है, रंग धानी इन दिनों ।।
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एक और कोणार्क गढ़ने में जुटी
सुनो ऋत की जुबानी इन दिनों ।।
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संदूक से यादें निकल ताजा हुईं
वक्त की है मेहरबानी इन दिनों ।।
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गीत कविता दोहा साखी गांव हैं
ग़ज़ल बनी है राजधानी इन दिनों ।।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
नागपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बहुत ही सुन्दर रचना, बधाई हो