राजभाषा दिवस विशेष 

श्री सदानंद आंबेकर 

 

 

 

 

 

(राजभाषा दिवस पर श्री सदानंद आंबेकर  जी का  विशेष आलेख स म्मा न.) 

 

स म्मा न

 

सुबह के लगभग ग्यारह-बारह बजे के समय अचानक बैंड़ बाजों की आवाज से लोग चौंक उठे। आंखें उठाकर देखा तो पाया कि बाजार के मध्य से एक जुलूस जा रहा है। उसके बीच में सुसज्जित पालकी पर एक तेजोमय मुद्रा वाली वयोवृद्ध महिला सुंदर से वस्त्र पहने बैठी है। चार लोग पालकी उठाए चले जाते है। बीच बीच में जुलूस के लोग उसकी जय-जयकार भी बोल रहे हैं। सभी लोग अत्यंत कौतुहूल से उस जुलूस एवं उसके मध्य जा रही वृद्धा को देख रहे थें किंतु समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उस जुलूस में काफी लोग थे जिनमें सामान्य जन से लेकर अनेक बड़े नेता भी दृष्टिगोचर हो रहे थे। लोगों के उत्साह का पारावार न था। जुलूस यों ही जयकार करता हुआ आगे चला गया ।

अनेक दिनों बाद उसी बाजार के एक दुकानदार ने देखा कि वही बूढ़ी महिला सड़क के किनारे उदास सी बैठी हुई है एवं लोगों की उपेक्षा भरी दृष्टि उस पर पड़ रही थी, किंतु उस दुकानदार को अपने काम की जल्दी थी सो वह भी सामान्य सी नजर ड़ाल कर आगे बढ़ गया।

एक बार पुनः वही वृद्धा उसे दूसरे मार्ग पर दिखाई दी और इस बार वह और भी बुरी अवस्था में थी। उसके वे नए वस्त्र तो एकदम जीर्ण हो गये थे एवं वह स्वयं भी क्लांत एवं भूखी प्यासी दीख रही थी। आश्चर्य यह था उस दिन जुलूस में सम्मिलित वे कुछेक लोग आज आसपास से गुजरते हुए उसे देख तक नहीं रहे थे। आज उस दुकानदार से रहा नहीं गया एवं सहानुभूति एवं उत्सुकता की मिलीजुली भावना के वशीभूत वह वृद्धा के पास गया एवं पूछ ही लिया कि माई आप कौन हैं एवं उस दिन एवं आज के दिन की आपकी स्थिति में जमीन आसमान का अंतर देख रहा हूँ तो इसका क्या कारण है और मैं आपकी क्या कुछ मदद कर सकता हूँ ?

उस वृद्धा ने अत्यंत सहजता से उत्तर दिया – “उस दिन की सम्मानित महिला मैं ही थी एवं आज की उपेक्षित बुढ़िया भी मैं ही हूँ। मैं इस देश की राजभाषा हूँ, मेरा नाम हिन्दी है एवं जिस दिन तुमने मुझे पालकी में देखा था वह दिन हिन्दी दिवस-चौदह सितंबर था।”

 

©  सदानंद आंबेकर

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