श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें…“।)
अभी अभी # ८५८ ⇒ आलेख – अंतिम साँसें
श्री प्रदीप शर्मा
वह असुर जो उसे ही भस्म कर दे, जो उसे भस्म करने का वरदान दे, भस्मासुर कहलाता है। ये असुर भी बड़े जीवट हीते हैं !मनचाहा वरदान पाने के लिए कठिन तप, साधना और इष्ट की भक्ति किया करते हैं। और इनके आराध्य देव इतने भोले होते हैं कि इन पर प्रसन्न हो ही जाते हैं।
समय के साथ असुरों ने समझौता कर लिया। अवतारों का जन्म केवल असुरों का नाश करने के लिए होता है। अब कलयुग में केवल एक कल्कि अवतार बचा है। अवतारों का स्टॉक अब खत्म। अब आप ही अवतार पैदा करो। अब एंड्राइड फ़ोन की तरह हाड़ माँस के इंसान में ही भगवान ने असुर, दैत्य, राक्षस, डाकू, और शैतान का app डाल दिया है।
सब इंसान ऊपर से एक जैसे हैं, किसी में साधु विराजमान है, तो किसी में शैतान। ।
इंसान हो या शैतान, भगवान के बिना किसी का काम नहीं चलता। किसी के गुरु द्रोणाचार्य होते हैं, तो किसी के शुक्राचार्य ! ईश्वर की भक्ति के बिना शक्ति, दिव्यास्त्र और वरदान प्राप्त नहीं होते। दैत्य उनका दुरुपयोग करते हैं, और देवता, सदुपयोग।
कहते हैं, कलयुग सोने के साथ पृथ्वी पर आया। सोने का मुकुट प्रिवीपर्स चबा गया, एक ले-देकर कुर्सी बची, जो आज भी लोकतंत्र की लाज रख रही है। एक लोकसेवक को कुर्सी पर पाँच वर्ष बैठने का अधिकार है, और अफसर को उससे कई गुना अधिक। एक लोक-सेवक को कुर्सी पर 18-18 घंटे जागते रहना पड़ता है। कहीं कुर्सी छिन न जाए। ससुरी कुर्सी नहीं, चौकीदारी हो गई। ।
भरत की यह भूमि भारतवर्ष कभी असुरों से मुक्त नहीं रही !
यह देश जो कभी सोने की चिड़िया रहा, जहाँ घी-दूध की नदियां बहीं, वहीं महाभारत भी हुआ, खून की नदियाँ भी वहीं।
पहले मुगल, फिर अंग्रेज़ भी आए, और बाद में आज़ादी के बाद सफेदपोश लुटेरे भी आए।
लोकतंत्र में जनता भगवान हो गई और नेता कस्मों-वादों से उसे लुभाने लगे। जनता जिस पर प्रसन्न हुई, उसे सिंहासन सौंप दिया। अब कोई कंस और रावण निकल जाए, तो जनता क्या करे। जनता का चुना हुआ, जनता को ही खा जाए, तो क्या वह भस्मासुर नहीं हुआ। ।
लग रहा था कि कांग्रेस रूपी भस्मासुर का अंत निकट है, लेकिन किसी ने चिराग घिस दिया, और राहुल गाँधी अलादीन का चिराग लेकर फिर उपस्थित हो गए। अब बोलिये, क्या हुक्म है आका ?
जनता शिवजी की ओर देख रही है ! कौन भस्मासुर और कौन अलादीन, अब फैसला शंकर का तीसरा नेत्र ही करेगा। अगला वर्ष मंगलमय हो। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
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