श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छोटा मुंह बड़ी बात…“।)
अभी अभी # ८७६ ⇒ आलेख – छोटा मुंह बड़ी बात
श्री प्रदीप शर्मा
न जाने क्यों, हमारी कहावतें पत्थर की लकीर होती है। कहीं भी, कभी भी, उनका उपयोग , सदुपयोग, अथवा दुरुपयोग किया जा सकता है। अब छोटा मुंह , बड़ी बात को ही ले लीजिए ! क्या किसी का मुंह छोटा बड़ा होता है !
कोई ओहदे में छोटा आदमी अगर बड़ी बात कह दे, तो उसका इसी तरह मज़ाक उड़ाया जाता है। पहले हम उसे छोटा साबित करते हैं, बाद में उसकी तारीफ करते हैं। छोटा मुंह, बड़ी बात !हम ऐसे ही हैं।।
इस कहावत का एक पहलू और भी है ! एक नन्हा सा बच्चा जब कोई बड़ी बात कह देता है, तब उसकी तारीफ में भी हम यही बात कहते हैं। वाह ! छोटा मुंह बड़ी बात। एक मासूम से चेहरे से इतनी बड़ी बात सुनकर आश्चर्य सा होता है। यहां यह मुहावरा नकारात्मक नहीं है, किसी की खिल्ली नहीं उड़ा रहा, उसकी प्रशंसा ही कर रहा है।
आज इस छोटे मुंह से कुछ, मुंह की बातें करेंगे। अभी दो भूतपूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों में मुंह को लेकर छींटाकशी हुई। एक वर्तमान ने , एक भूतपूर्व पर ताना कसा, आपने अपने कार्यकाल में सिर्फ मुंह चलाया। भूतपूर्व ने तुरंत अपना मुंह चलाया, मुंह तो आप चला रहे हो, हमने तो सरकार चलाई।।
जब हम मुंह चलाते हैं, तब यह कहां जाता है, कहां तक जाता है ? जब मुंह, वहीं अपने स्थान पर रहता है, केवल ज़बान चलती है , फिर समझ में नहीं आता, मुंह कैसे चलता है। ज़बान भी अगर चलती है, तो एक कुएं के मेंढक जैसी मुंह में ही घूमा करती है। जब कभी, अगर बाहर भी आती है, तो किसी को चिढ़ाने के लिए जीभ बन जाती है। बच्चों को किसी को चिढ़ाने में बड़ा मज़ा आता है। वे कभी मुंह बनाते हैं, तो कभी जीभ चिढ़ाते हैं।
मुंह चलाया ही नहीं जाता, मुंह बनाया भी जाता है। अब मुंह कोई घर तो नहीं, कि ईंट सीमेंट से बनाया जाए। भगवान ने रेडीमेड भिजवाया है, फिर भी हम मुंह को बिगाड़ कर मुंह बनाते हैं। इंसान कुछ बिगाड़कर बना तो नहीं सकता, चलो मुंह ही बनाकर बिगाड़ें।।
कई बार हम मुंह की खाते हैं।
मुंह से तो हम रोज़ खाते हैं। कभी ऐसा हुआ है, कि आप कहीं गए हों, और अपना मुंह साथ नहीं लेकर गए हों। फिर भी लोग सुना ही देते हैं, लो मुंह उठाकर चले आए। मानो हम उनसे हमारे ही मुंह उठाने का किराया मांग लेंगे।
कितना बुरा लगता है, जब कोई आपके बारे में कह देता है , अरे उसके मुंह मत लगो, वह तो ऐसा ही है। आपके मुंह में ऐसा क्या है ? क्या आपके मुंह से बदबू आ रही है। आप भी गुस्से में कह ही देते हो। हां वह तो तुम्हारा ही मुंह लगा है, इधर क्यूं मुंह मारेगा।।
मुझे जो कहना था, मैंने कह दिया। आप यही कहोगे न, ये मुंह और मसूर की दाल ? अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना मुझे पसंद नहीं, फिर भी जो बात मुंह से नहीं कह सकते, लिखकर तो बता ही सकते हैं न।
अब आप चाहें मुंह बनाएं, या बिगाड़ें, हमने तो छोटा मुंह, बड़ी बात कह ही दी। मुंह चलाना कोई हमसे सीखे।
© श्री प्रदीप शर्मा
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