श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नासिका।)

?अभी अभी # ८८९ ⇒ आलेख – नासिका ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

नासिका, जिसे हम नाक भी कहते हैं, हमारी काया की नायिका है। हमारी नाक के नीचे क्या हो रहा है, यह उसे देख भले ही नहीं सकती हो, सूंघ ज़रूर सकती है। देखने के लिए इसने अपने ऊपर दो दो आंखें जो बिठा रखी हैं। लेकिन हाय रे बदनसीब आंख, अपनी ही नाक को देखने के लिए भले ही वह इसी नाक पर चश्मा चढ़ा ले, उसे अपनी ही नाक नजर नहीं आती। आइना देखकर इन आंखों को यकीन होता है, अपनी ही नाक पर। लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या, हम दोनों हाथ छूकर ही यकीन कर लेते हैं, अपनी नाक सही सलामत है।

तूने खूब बनाया भगवान, खिलौना माटी का ! यह हमारी काया है, जिसे आप ढांचा भी कह सकते हैं, उस बनाने वाले ने एक जैसे सांचे में ढाला है। कितना दिमाग लगाया होगा, इस माटी के पुतले को बनाने में। दो दो कान, दो दो आंखें, एक छोटी सी नाक, और बड़ा सारा मुंह, और उससे भी बड़ी देह। केवल हाथ पांव ही नहीं, जीती जागती मशीन बना दी उस ऊपर वाले ने और उसमें प्राण फूंक दिए।।

नायक – नायिका भेद की तरह नासिका भेद भी होता है इस हाड़ – मांस के पुतले में। कोई नाक पतली होती है, कोई मोटी, तो कोई चपटी। कहते हैं, नासिक में, राम के भाई लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटी थी। कोई नायिका अगर प्रणय निवेदन करे, तो क्या नायक उसकी नासिका काट ले ? लेकिन जो किसी दूसरे की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण रेखा खींचते हैं, वे स्वयं भी मर्यादित आचरण में रहते हैं। तब से ही लोग अपनी नाक के प्रति सजग हो गए। ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे समाज में हमारी नाक कटे।

बचपन में भाई बहन एक दूसरे को नकटा, नकटी कहकर चिढ़ाते थे। और बचपन की दोस्ती भी कैसी ! जब लड़ाई हुई, तो कट्टी कट्टी, साबुन की बट्टी, इधर दांत से अंगूठे को काटा, और जा तेरे घर। लेकिन कब तक ? जल्द ही यह नौबत ही आ जाती। नकटे की नाक नहीं, बोले बिना चैन नहीं।

और दोनों उंगलियों को चूमकर, फिर से पक्की दोस्ती।।

अगर आपने लक्ष्मण के पुराने कार्टून देखे हैं तो उनमें सबसे अधिक कार्टून इंदिरा गांधी के हैं और पूरे कार्टून की जान होती थी, इंदिरा जी की नाक। एक ऐसी नाक जिसने कभी देश की नाक रखी , तो कभी देश की नाक नीची भी की। अपनी नाक बचाने के लिए आपातकाल भी लगाया और इसी नाक पर मुंह की भी खाई। लगता है लक्ष्मण और नाक का संबंध त्रेता युग से ही चल रहा है। मूंछें हो तो रामलाल जैसी और नाक हो तो लक्ष्मण के कार्टून्स की इंदिरा जैसी।

आज हमें नाक की बहुत चिंता है। समाज में, परिवार में, राजनीति में, सभी जगह कोई अपनी नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता। घर में बच्चे हों या राजनीति में विपक्ष, नाक में दम कर रखा है। जानवर हो तो नाक में नकेल डाल दें, बच्चों को तो स्कूल में डाल दिया, अब क्या विपक्ष को जेल में डाल दें।

हम नाक से ही सांस लेते हैं और छोड़ते हैं। आदमी सब कुछ भूल सकता है, सांस लेना नहीं भूल सकता। सांस की बीमारियों से ही दमा होता है जो मरीज को आखिरी सांस तक दम नहीं लेने देता। Ear, nose और throat यानी नाक, कान और गले की आपस में बहुत घुटती है। इनकी आपसी मिलीभगत को ही nexus नेक्सस कहते हैं।।

लंबी गहरी सांस लेना, मुंह से नहीं नाक से सांस लेना, थोड़ी भस्रिका, कपालभाति और अनुलोम विलोम आपको स्वस्थ व प्रसन्न रखेगा और बीमारियों से आपकी रक्षा करेगा। आपके प्राण पर बाबा रामदेव का नहीं, आपका कॉपीराइट है। पहले प्राण बचाएं, वचन बाद में निभाएं। दूसरों के मामलों में व्यर्थ ही अपनी नाक ना घुसाएं। Don’t poke your nose into others affairs !!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments