श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कढ़ाव का दूध…“।)
अभी अभी # ९०१ ⇒ आलेख – कढ़ाव का दूध
श्री प्रदीप शर्मा
आपके रसोईघर में रोटी बनाने का लोहे का तवा भी होगा और सब्जी बनाने वाली कढ़ाई भी। चाय बनाने और दूध गर्म करने के लिए भी हमारे पास अलग बर्तन होते हैं। कुछ बर्तन बड़े होते हैं और कुछ छोटे। विशेष आयोजनों के लिए हलवाई और बड़े बड़े भगोने, कढाई और परात की व्यवस्था होती थी। जमीन में गड्ढा खोदकर भट्टी बनाई जाती थी। पत्तल दोने और पंगत का जमाना था वह।
बाहर होटलों में खाने का प्रचलन कम था। बस कुछ दूध, दही और मिठाई नमकीन की दुकानें ही शौकीन लोगों का खर्चीला व्यसन था। दूध जलेबी का इतिहास पोहे से अधिक पुराना और पौष्टिक है।
वह जमाना अमूल और सांची का नहीं था। घर घर दूध की बंदी लगी रहती थी और हर मोहल्ले में दूध दही की दुकानें मौजूद रहती थी।।
चौराहों और मोहल्लों के नुक्कड़ों पर सुबह शाम इन्हीं दूध और मिठाई की दुकान के बाहर एक आग उगलती भट्टी पर खौलते दूध का बड़ा सा कढ़ाव देखा जा सकता था, जिसमें पानी में काई की तरह, सफेद सफेद मोटी मलाई देख, मुंह में पानी आ जाता था। इधर कढ़ाव में गर्मागर्म दूध और उधर एक कड़ाही से निकलती रस भरी असली घी की जलेबियां। बस यही हमारा ब्रेड एंड बटर था, ब्रेकफास्ट था और सुबह का नाश्ता भी।
दिसंबर की सर्द रातें हों अथवा गर्मियों की शबे मालवा, दूध के ये कढ़ाव शहर की रौनक में चार चांद लगा देते थे। लकड़ी की बड़ी सी बेंच पर बीच बाजार में सौ ग्राम रबड़ी मारकर, मलाई वाला दूध, अगर आपने नहीं पीया तो क्या जिंदगी जी। दूध इतना गर्म कि फूंक मारो तब भी जबान जल जाए, लेकिन दूध का स्वाद ऐसा कि कहीं जान ही ना निकल जाए।।
रात को भोजन के बाद, तब का आम इंदौरी, घर में नहीं बैठता था, सराफे की ओर रुख करता था। दिन भर की मेहनत के बाद सराफे में उसे सोने चांदी की नहीं, कुछ मीठे की तलाश होती थी। डिनर के बाद डेजर्ट तो बनता ही है। और कुछ नहीं तो कढाव का दूध ही सही। वैसे भी रात का दूध स्वास्थ्यवर्धक होता है।।
आज सभी नगर महानगर हो गए हैं। एक एक इंच जमीन पर भू – माफियाओं का कब्जा है। सड़क पर अब इतनी जगह नहीं कि, अतिक्रमण कर दुकान के आगे दूध का कढ़ाव लगाया जा सके। स्मार्ट सिटी मॉल और ट्रेड सेंटर के लिए होती है, दूध के कढ़ाव के लिए नहीं। KFC और पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी, सैंडविच के जमाने में दूध और वह भी मलाई वाला ? अच्छे बच्चे आजकल दूध में मलाई नहीं पीते। सिर्फ आइसक्रीम खाते हैं।
हमारे प्रदेश की नई आबकारी नीति शराब को भी आब ही मानकर चल रही है। पानी भले ही महंगा हो, शराब सस्ती होनी चाहिए। शहर से लोग आजकल वैसे ही दूर हैं, अच्छा है, नशे में भी चूर रहें। करोड़पति बनें, घर में ही बार खोलें। आप क्या दूध पीते बच्चे हैं, जो भरे बाजार में जाकर कढ़ाव का दूध पीकर प्रदश की मद्य नीति की अवहेलना करेंगे।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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