श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वस्तुओं का अदृश्य पक्ष …“।)
अभी अभी # ९०६ ⇒ आलेख – वस्तुओं का अदृश्य पक्ष
श्री प्रदीप शर्मा
[HIDDEN SIDE OF THINGS]
हमारी सृष्टि दो भागों में बंटी हुई है, जड़ और चेतन ! Animate और inanimate.
नदियां, झरने, वृक्ष, पशु पक्षी और इंसान अगर चेतन हैं तो घर, सड़क, गांव, दरवाजे, खिड़की और फर्नीचर जड़। आप अपने परिवेश को दो भागों में बांट सकते हैं, सजीव और निर्जीव।
जो हमें पलटकर जवाब दे, कुछ अपनी कहे, कुछ हमारी सुने, जिसमें धड़कन हो, जो चलती फिरती नजर आए, जिसमें प्राण हो, जिसके शरीर में गतिविधि हो, कुछ हरकत हो, जिसमें चेतना हो, उसे आप जीव अथवा सजीव कह सकते हैं। जहां संवाद कायम हो, आंखों आंखों में बातें हों। जिसे आप गोद में उठा सकें, फिर भले ही वह आपका पालतू जानवर हो।।
लोग नवजात शिशुओं से बातें किया करते हैं। वे होते ही हैं इतने प्यारे।। माएं अपने बच्चों से घंटों बातें किया करती हैं। बस बच्चा उन्हें देखता रहता है, हंसता मुस्कुराता रहता है। मां ही सवाल करती है, मां ही जवाब दिया करती है। प्रेमिका की आंखों में तो डूबने के कई किस्से हैं। एक दूसरे के लिए जान छिड़कना आम है। बस दोनों में जान होना चाहिए।
हम आज बेजान चीजों की बात करेंगे। ऐसी चीजें जो हैं तो हमारे आसपास, लेकिन हमारी नजर में तब ही आती है, जब हमें उनसे काम पड़ता है। आप घर में बैठे हैं, जूता बाहर पड़ा हुआ है। जब बाहर जाते हैं, तो जूते की याद आती है। पांव में पहना और चल दिए। जूते की अपनी जगह है। जूते की भी हमारे जीवन में जगह है, उपयोगिता है। लोग सस्ते और महंगे दोनों तरह के जूते पहनते हैं। जो जूतों के शौकीन होते हैं, उनके यहां शू स्टैंड नहीं, जूतों का भी वॉर्डरोब होता है। लेकिन जब किसी को जूते पड़ते हैं, तो यह घोर अपमान कहलाता है।।
रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूलभूत आवश्यकताएं हैं। तीनों में जान नहीं, लेकिन पेट की भूख रोटी से ही मिटती है। तन पर कपड़ा हमारी इज्जत है और मकान है तो हमारे सर पर छत है। पेट की भूख इंसान से क्या नहीं कराती। यही भूख जब बढ़ जाती है तो आदमी पैसा भी खाने लग जाता है। पैसे की भूख, कपड़े लत्ते की भूख, गहनों की भूख, प्रशंसा की भूख। सभी बेजान, लेकिन सबमें अटकी हमारी जान।
व्ही.शांताराम की एक फिल्म आई थी, गीत गाया पत्थरों ने ! क्या पत्थर भी बोलते हैं ? जब दीवारों के भी कान हो सकते हैं, तो पत्थर क्यों नहीं गीत गा सकते। आपके घर की टेबल पर अगर धूल जमी है, तो क्या आपने कभी सोचा है, टेबल क्या सोचती होगी ! जब आप टेबल साफ करते हैं, तो वह आपको धन्यवाद देती है, लेकिन आप सुन, समझ, देख नहीं सकते। आप गुस्से में जब जूता पटकते हैं, तो जूते को भी दर्द होता है, जिसे आप महसूस नहीं कर सकते। जब आप प्यार से मोजे पहनते हैं, तो मोजे बहुत खुश होते हैं, बस आप महसूस नहीं कर पाते।।
एक घर की जब साफ़ सफाई, रंग रोगन होती है तो उसके चेहरे पर भी वही चमक और ताजगी होती है, जो हमें नहाने और सजने संवरने के बाद महसूस होती है। अक्सर गुस्से में हम जोर से दरवाजा बंद करते हैं, यह जाने बिना, कि दरवाजे की आवाज़ में भी आह होती है और किसी प्रिय के आगमन पर जब हम खुश होकर दरवाजा खोलते हैं, तो उसमें भी दरवाजे की वाह होती है।
थियोसोफिस्ट सी.डब्ल्यू.लेडबीटर की सन् १९१३ में प्रकाशित एक पुस्तक है, Hidden Side of things, जिसमें बेजान अथवा निर्जीव और जड़ चीजों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है। हम आसमान से यूं ही बात नहीं करते। घर हमें कब काटने को दौड़ता है। दरिद्रता दबे पांव कैसे हममें प्रवेश करती है, जब हम आसपास की वस्तुओं के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। वस्तुएं स्पर्श पहचानती हैं, तभी तो वे हमारी हो पाती हैं। पसंद की साड़ी, पसंद की शर्ट ! बहुत से ऐसे सवाल हैं, जो कभी हमारे मन में उठते ही नहीं। और जब उठते हैं, जो जवाब भी मिलने लगते हैं। आगे से जब भी कोई चीज गुस्से में पटकें, तो कान खोलकर सुनें !
शायद वह कह रही हो, मैं भी मुंह में जबान रखती हूं। फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाजुक होते हैं। सिर्फ फूल में ही नहीं, मुझमें भी रब बसता है।
कण कण में भगवान। मान सके तो मान।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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