श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ढक्कन वाला कुआं…“।)
अभी अभी # ९१६ ⇒ आलेख – ढक्कन वाला कुआं
श्री प्रदीप शर्मा
कुआं कोई शीशी अथवा रसोईघर का पात्र नहीं, जो ढक्कन का मोहताज हो, आप पानी को भी ढंक सकते हैं, पूरे कुएं को ढकने का क्या औचित्य, लेकिन बाल की खाल नहीं निकालते, अगर कहीं ढक्कन वाला कुआं है भी तो आपका क्या जाता है। अच्छा है, लोग कुएं में कचरा नहीं डालेंगे, रात्रि में कोई भटका हुआ जानवर उसमें नहीं गिरेगा अथवा कोई दुखी प्रेमी कुएं में कूदकर अपनी जान तो नहीं दे पाएगा।
अब यह मत पूछिए, यह ढक्कन वाला कुआं कहां है। अगर मैं आपसे पूछूं कि खारी बावली कहां है तो आप मुझे दिल्ली तो भेज देंगे लेकिन वहां ऐसी कोई बावड़ी नहीं, जो खारी हो। सड़क और किराना मार्केट को ही आजकल खारी बावली कहते हैं। होगी कभी मुगलों के ज़माने में कोई खारी बावड़ी, जिससे नमक वाली चाय बनाई जाती हो। हमें इससे क्या।।
मुझे जब भी बस से प्रवास करना पड़ता है, मुझे ढक्कन वाले कुएं जाना ही पड़ता है, जहां से मुझे गंतव्य के लिए अपनी बस मिलती है। अजीब अजीब नाम होते हैं इन गाड़ी अथवा बस अड्डों के ! सराय काले खां भी कोई नाम हुआ। अहमदाबाद में अपनी बस पकड़ना है तो पहले पालड़ी जाओ। जब रोड़वेज की बसें चलती थीं, आंख मूंदकर सरवटे बस स्टैण्ड चले जाओ, ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे।
बहुत बार कोशिश की, ढक्कन वाले कुएं के दर्शन कर लूं, लेकिन वहां न तो कोई कुआं नजर आया और न ही कोई ढक्कन। बड़ा पॉश एरिया है ढक्कन वाला कुआं। साउथ तुकोगंज और कंचनबाग के बीच की खाली जमीन जिसकी कीमत वहां स्थित होटलों और अस्पतालों से ही आसानी से आंकी जा सकती है।।
स्मशान हो या कब्रस्तान, जहां भी हो खाली स्थान, आदमी बना लेता अपना मकान ! दूर क्यों जाएं, इंदौर के एम जी रोड पर, व्यस्त खजूरी बाज़ार के पास गोराकुंड है, जहां आज न कोई कुंड है न कोई बावड़ी। पहले यहां एक बावड़ी थी उसे ही गोराकुंड कहते होंगे। आज वहां केनरा बैंक है। बस शहर में एक राम प्याऊ है, जहां आज भी हर प्यासे के लिए शीतल जल उपलब्ध है।
हमारा शरीर नश्वर है। एक दिन इसे मिट्टी में मिलकर पंच तत्वों में समा जाना है। पारसी समुदाय में इस नश्वर काया को मुक्ति हेतु एक कुएं में ले जाया जाता है, जो ऊपर से एक लोहे की जाली से ढंका होता है। यह देह मरने के बाद ही सही, किसी जीव का भोजन बने तो क्या बुरा है। अपनी अपनी आस्था है, अपना अपना दर्शन है।।
वैसे देखा जाए तो हमारी काया भी एक ढक्कन वाला कुआं ही है। शरीर रूपी इस कुएं में जब तक जान है, पानी ही पानी है, जल ही जीवन है। इस शरीर का उपयोग एक कुएं के समान परिवार, देश और समाज के लिए हो। दो शब्द प्रेम के ही दो बूंद पानी है, जो किसी प्यासे को तृप्त कर सकते हैं। प्राण ही इसका ढक्कन है। हंस ट्रैवल का वास्तविक ढक्कन वाला कुआं हमारा शरीर ही है। थोड़ा ढक्कन हटा, और उड़ जाएगा, हंस अकेला। जग दर्शन का मेला ..!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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