श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेहनत की लकीर ।)

?अभी अभी # ९२१ ⇒ आलेख – मेहनत की लकीर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उद्धयेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

 न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

लकीर को हम रेखा भी कहते हैं। जन्म के साथ ही हमारे भाग्य को भी जोड़ दिया जाता है, ग्रह, नक्षत्रों और रेखाओं से। आज जन्म लिए बालक का भविष्य फल कई वर्षों से नियमित रूप से दैनिक अखबारों की जगह घेरता चला आ रहा है। कुछ लोग तो “आपका आज का भविष्य फल ” पढ़कर ही आंखें खोलते हैं। वर्तमान में भविष्य खोजना ही कुछ लोगों का पुरुषार्थ होता है। वे हमेशा किसी अच्छे मुहूर्त की ताक में ही बैठे रह जाते हैं, और मौका हाथ से निकल जाता है।

हस्त रेखा अथवा ज्योतिष में जिनकी रुचि होगी वे शायद यह भली भांति जानते होंगे कि हमारे हाथ में मेहनत और पुरुषार्थ की भी शायद कोई रेखा होती हो। लेकिन लोग अक्सर नौकरी धंधा, शादी, बीमारी और बाल बच्चों की आस में ही किसी ज्योतिषी के आगे हाथ फैलाते देखे जाते हैं और व्रत उपवास, पुखराज, मूंगा और दान दक्षिणा के बिना बात बनते नजर नहीं आती।।

नेपोलियन का हाथ देखकर एक ज्योतिषी ने कह दिया था कि आपके जीवन में तो भाग्य रेखा ही नहीं है, आप सफल नहीं हो सकते। और सुना है कि नेपोलियन ने अपनी तलवार निकाली और अपनी हथेली चीरकर चुनौती दी, भाग्य की लकीर ऐसे बनती है पुरुषार्थ से। हाथ पर हाथ धरकर बैठने से नहीं।

जिनके हाथ में मेहनत की लकीर होती है, फिर उसके आगे सभी लकीरें फीकी पड़ जाती हैं, क्योंकि परिश्रम और पुरुषार्थ के आगे तो भाग्य भी नहीं टिक पाता।।

अब एक तरफ हमारा चार्वाक दर्शन भी है जो कहता है, कर्ज़ करो और घी पीयो जिसे लोग आजकल कोलोस्ट्रॉल घटाते हुए, कर्ज़ लेकर विदेशों में, चैन से जीयो के सिद्धांत के साथ अमल में ला रहे हैं। और अगर उनका हार्ट फेल भी हो गया, तो कौन सा दुनिया में प्रलय आ जाएगा। उधर हमारी आधी आबादी भाग्य, ईश्वर और मलूकदास की आस्तिकता और आशावाद के गुणगान करती नजर आ रही है ;

अजगर करे ना चाकरी

पंछी करे ना काम।

दास मलूका कह गए

सबके दाता राम।।

 जय श्रीराम

याद आती है, पुराने दौर की फिल्म नया दौर, जिसमें साहिर का एक गीत था, “साथी हाथ बढ़ाना साथी रे, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। ” मेहनत जब संगठित होती है, तब मुट्ठी मजबूत होती है, एकता में सफलता और संपन्नता के दर्शन होते हैं। लेकिन संगठित मजदूर पूंजीवाद के लिए बहुत बड़ा खतरा है, इसलिए मजदूर हो या जनता, इनके बीच नेता को लाया जाए। वह आपको नारा देगा, नई नई मांगें देगा, आपके लिए पूंजीपतियों के साथ सौदा करेगा और संसद में आपकी आवाज बुलंद करेगा। देखिए मेहनत की लकीर किधर जाती दिखाई दे रही है।।

मेहनत के बिल्कुल करीब ही, एक गरीबी रेखा भी है

जिसे आजकल वोट बैंक भी कहते हैं। जो मेहनती लोग इस गरीबी रेखा से नीचे होते हैं, उनके क्रेडिट कार्ड को बीपीएल कार्ड कहते हैं, अंग्रेजी में बोले तो below poverty line हितग्राही। पानी बिच मीन प्यासी ! बस यही हाल होता है इस गरीबी रेखा का। सुरसा का मुंह है यह गरीबी रेखा। इन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए क्या क्या नहीं कर रही सरकार। उज्जवला, आयुष्मान, मान या ना मान। और बीपीएल वाली यह मीन इस रेखा के नीचे इतनी सुरक्षित है कि अब इस लकीर से ऊपर आना ही नहीं चाहती। आज भी याद है वह मछली वाला गीत ;

मछली जल की रानी है

जीवन इसका पानी है।

हाथ लगाओ, डर जाती

बाहर निकालो, मर जाती।।

मेहनत तो घोड़ा गधा भी कर लेता है। आजकल मेहनत के साथ साथ स्किल डेवलपमेंट भी जरूरी है। व्यर्थ पसीना बहाने से क्या फायदा। कहीं वायदा सौदे में फायदा तो कहीं शेयर मार्केट में जबरदस्त उछाल। कई नटवरलाल घर बैठे हर्षद मेहता और चार्ल्स शोभराज बन गए। जिनका भाग्य अच्छा था, आगे बढ़ गए, जिनका भाग्य खराब था, जेल में चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग।।

काश, हमारे हाथ में संतान योग, सफलता, संपन्नता, राजयोग, और वैभव लक्ष्मी की जगह, कुछ रेखाएं मेहनत, लगन, परिश्रम, आशा, विश्वास, आत्म विश्वास और इमानदारी की भी होती तो कितना अच्छा होता। हम आपस में हाथ से हाथ मिलाते, एक दूसरे का हाथ चूमते, एक ऐसी दुनिया बनाते जहां पत्थर की लकीर से भी मजबूत मेहनत की लकीर होती।

उद्यम ही मेहनत है, सूझ बूझ है। बुद्धि ज्ञान और विवेक उसके वाहन हैं। अपनी प्रतिभा को पहचानना और उसको अमल में लाना ही पुरुषार्थ है। श्रम और परिश्रम के बीच की दूरियों को कम करना है। आलस्य को विराम और श्रम को सम्मान ही हमारे हाथ की वह लकीर है जो हमें गीता के निष्काम कर्म के करीब ले जा सकती है। कोई है ऐसा हस्त रेखा विशेषज्ञ, जो हाथ में मेहनत की लकीर भी बता दे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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