श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जल तत्व और प्रेम तत्व…“।)
अभी अभी # ९२५ ⇒ आलेख – जल तत्व और प्रेम तत्व
श्री प्रदीप शर्मा
जल बिच मीन प्यासी, हमें सुन सुन हांसी भले ही न आए, लेकिन मछली के लिए जल ही जीवन है, यह तो मछली भी जानती है।
मत्स्यावतार हुआ तो क्या, जीव: जीवस्य भोजनं, जल से बाहर आते ही इस इंसान के लिए वह एक भोज्य पदार्थ बन जाती है। आप हमें तारो, हम आपको तारें।
पंच तत्व में जल तो पहले से ही मौजूद है। पृथ्वी पर भी तीन चौथाई जल ही है, फिर भी हमारी प्यास है कि कभी बुझती ही नहीं। गला अक्सर सूखता ही रहता है। प्यास तो हमारी पानी से भी बुझ सकती है लेकिन हमारी रसेंद्रियों का क्या करें, जो कभी फलों का रस तो कभी शहद की आस करती है। प्याले पर प्याले पी लिए, लेकिन अगर प्रेम पियाला नहीं पिया, तो क्या पीया। क्या है यह प्रेम तत्व और कहां से प्रकट होता है यह।।
तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे।
मिलाए, छल बल से नजरिया रे।।
मन को चंद्रमा की तरह चंचल माना गया है। यह मन पापी ही नहीं, चोर भी है। एक बृजवासी कृष्ण हैं, जो चितचोर हैं, बांसुरी बजाते हैं, माखन चुराते हैं, ग्वाल बाल संग गईया चराते हैं, गोपियों संग रास रचाते हैं और इंद्र के कोप से, केवल उंगली के बल पर, लोगों को बचाकर गिरधारी कहलाते हैं। कभी कंस को मारते हैं तो कभी द्रौपदी की लाज बचाते हैं। विदुर का साग और सुदामा के चावल खाते हैं और सारथी बन अर्जुन का रथ हांकते हैं। क्या यह सबसे ऊंची प्रेम सगाई नहीं।
पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा ? जवाब सभी जानते हैं। यही हाल प्रेम का है। प्रेम के भी हजार रंग हैं।
बस दृष्टि स्थूल नहीं, सूक्ष्म होनी चाहिए। हमारा प्रेम रिश्तों में बंट जाता है, माता पिता का प्रेम, भाई बहन का प्रेम, प्रेयसी, पत्नी, मित्र और पड़ोसी का प्रेम। जहां राग होता है, वहां द्वेष भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह प्रकट हो जाता है और प्रेम की वाट लग जाती है।।
हमने तुमको प्यार किया है जितना, कौन करेगा इतना। अगर वाकई इतना प्यार इस दुनिया में होता तो ये नफरत और बेवफाई तो शायद जन्म ही नहीं लेती।
क्यों इतने युद्ध होते, हिंसा होती, क्यों इतने अवतार होते। लगता है मनुष्य ने प्यार कर तो लिया, लेकिन प्यार का मतलब नहीं जाना।
प्रकृति बांटती है, समेटती नहीं ! पतझड़ हो या बहार, सर्दी, गर्मी और बरसात, प्रकृति सहनशील है, क्योंकि उसे वसुंधरा की गोद नसीब हुई है। वृक्ष फल देता है, खाता नहीं, नदियां अपना पानी नहीं पीती। बीज से वृक्ष बनता है, पर्यावरण की रक्षा करता है। प्रकृति देती ही देती है। इसीलिए प्रकृति में प्रेम है। कहने को हम भी प्रकृति प्रेमी हैं, पर्यावरण प्रेमी हैं।।
जल तत्व की तरह, आसानी से घुल मिल जाना ही प्रेम तत्व है। हमें तो गर्व है कि हमारे रोम रोम में राम है और हमारा मन हमेशा गंगा जमना और सरयू तीर जाने के लिए ही मचलता रहता है, तब तो जोत से जोत जलती रहनी चाहिए और हमारे देश में सतत, प्रेम की गंगा बहती रहनी चाहिए।
या तो हमारा हृदय इतना विशाल नहीं, या फिर प्रेम गली अति सांकरी। हम प्रेम में मीरा और राधा नहीं बनना चाहते। प्यास लगी तो पानी पी लिया, और प्यास बुझी तो ग्लास फेंक दिया। हमने कभी पानी का महत्त्व नहीं समझा, हम प्यार का मतलब क्या समझेंगे। जल और प्रेम जब एकरूप होता है, तब अंदर से प्रेम प्रकट होता है। वास्तविक प्रेम बंधनों को काटता है, जहर को अमृत बनाता है। मीरा जहर का प्याला पीकर भी यही कहती रहती है ;
अंसुवन जल सींचि सींचि
प्रेम बेली बाई।
अब तो बेलि फैल गई
आणंद फल होई।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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