श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दृष्टि दोष…“।)
अभी अभी # ९३१ ⇒ आलेख – दृष्टि दोष
श्री प्रदीप शर्मा
Man is a bundle of habits. इंसान आदतों का एक पुलिंदा है। उसमें अगर खूबियां हैं तो विकार भी। वह कहीं मजबूत है तो कहीं कमज़ोर भी। कमजोर होते ही उसे रोग घेर लेते हैं और वह बीमार होने लगता है। भले ही उसकी नीयत साफ हो, समय के साथ उसकी नज़र कमज़ोर होने लगती है, जिसे दृष्टि दोष अथवा नेत्र रोग कहते हैं।
जो लोग नियमित रूप से विटामिन सी और डी के साथ नींबू, आंवला, त्रिफला, शहद, बादाम और डाबर च्यवनप्राश का सेवन करते हैं, उनकी नेत्र ज्योति तेज होती है। नैनों में कजरा और सुरमा, आजकल वैसे भी कौन लगाता है। रात रात भर जागना, अधिक ऑनलाइन व्यस्त रहना और अधिक पढ़ने लिखने से आंखों को दो से चार होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता, अर्थात् आंखों पर जल्द ही चश्मा चढ़ जाता है।।
चश्मे नजर के भी होते हैं और धूप के भी। जिन्हें नजर लगती है उनकी पहले नजर उतारनी पड़ती है फिर उन्हें चश्मा पहनाना पड़ता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे मोटे चश्मे आजकल नहीं लगते। मोतियाबिंद होने पर, आंखों के अंदर ही आजकल लेंस लगा दिया जाता है जिससे आपकी दूर पास की दृष्टि ठीक हो जाती है।
ईश्वर ने हमें दो आंखें दी हैं, फिर भी हम वही देखते हैं, जो हमें देखना होता है। ऐ भाई जरा देखकर चलो, आंख वाले को ही बोला जाता है। बाजू ! समझो इशारे, हाॅरन पुकारे, और पलट, तेरा ध्यान किधर है, जैसे संबोधन भी आंख वालों के लिए ही तो होते हैं।।
मजरूह तो कह गए हैं कि तेरी आंखों के सिवा, दुनिया में रखा क्या है, यानी जहां आंख नहीं, वहां जीवन में अंधेरा ही अंधेरा ! और यह भी एक कटु सत्य है कि दुनिया के तीन करोड़ नेत्रहीनों में से एक करोड़ नेत्रहीन तो हमारे भारत में ही हैं। है न विचित्र बात, हमारी आंखें होते हुए भी हमें यह दिखाई नहीं देता। लेकिन ईश्वर को सब दिखाई देता है। परमात्मा का प्रकाश इनकी आत्मा तक भी पहुंचता है। दुनिया में कई सेवाभावी लोग और पारमार्थिक संस्थाएं इस अंधेरी दुनिया को जगमगाने में दिन रात एक कर रही हैं। जहां नेत्र नहीं, वहां उनकी मन की आँखें सब देखती हैं, अब सुनती हैं और आत्म विश्वास से इस दुनिया में, अपने कर्म, शुभ संकल्प और आत्म बल की एक ऐसी मिसाल पेश करती है कि हम आंख वालों की भी नजरें सम्मान, तारीफ, गर्व और प्रशंसा से सहसा झुक जाती हैं।
आंखों का संसार तो हमने देखा है लेकिन एक संसार ऐसा भी है, जहां तेरे मस्त मस्त दो नैन के अलावा भी बहुत कुछ है। जिसे हम दृष्टि कहते हैं, उसका इन दिखाई देने वालों चक्षुओं से कुछ लेना देना नहीं है। आप इन आंखों को बंद कर लीजिए। आंखों पे भरोसा मत कर ! दुनिया जादू का खेल है। आइए आपको दृष्टि के एक और ही लोक की सैर करवा दें।।
जिस दृष्टि की हम बात कर रहे हैं, वह तीन प्रकार की है। अंतर्दृष्टि, दूरदृष्टि और दिव्य दृष्टि। जाहिर है, इनका हमारी आंखों से कोई लेना देना नहीं है।
हमारे अंदर नजर डालने के लिए आज तक दुनिया में न तो कोई मशीन बनी है और न ही कोई आंख। हमारे शरीर विज्ञान में किसी मन की आंख का कोई जिक्र नहीं है। जब जरा गर्दन झुकाई, देख ली तस्वीरे यार।
हमारे आसपास एक दुनिया दृष्टिबाधित, मूक बधिर, दिव्यांग और स्पेशल चाइल्ड की भी है, जिन्हें ईश्वर ने वरदान स्वरूप छटी इंद्रिय भी दी है, उनकी अंतर्दृष्टि इतनी सशक्त होती है कि वे ऐसे ऐसे काम कर गुजरते हैं, जो हम कथित साधारण आम इंसान नहीं कर सकते।
सूरदास हों या अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन। हमारे कवि हृदय संगीतकार रवींद्र जैन भी तो प्रज्ञा चक्षु ही थे।
वैसे भी प्रज्ञा का संबंध हमारी अंतर्दृष्टि से ही अधिक होता है। आँखें होते हुए, वे बाहर तो ताका झांकी कर लेंगे, लेकिन उन्हें कभी अपने अंदर झांकने की फुर्सत नहीं मिलती।।
अब आते हैं हम दूर दृष्टि और पक्के इरादे पर। दृष्टि को विजन (vision) भी कहते हैं। एक कलाकार जिस दृष्टि से सृजन करता है, उसका संसार उसके अंदर ही निहित होता है।
कवि की कल्पना, राग, सुर, ताल, सृजन का संसार और एक कलाकार के कैनवस की कोई सीमा नहीं होती।
अच्छे दिनों के सपने देखना और दिखाना क्या दूर दृष्टि नहीं।
और अब अंत में हम आखिरकार दिव्य दृष्टि तक पहुंच ही गए। आखिर जहां न पहुंचे वहां पहुंचे रवि, क्या है। क्या डिजिटल युग में हम दिव्य नहीं हो रहे। जो काम संजय ने धृतराष्ट्र के लिए किया, वह काम तो हमारा टीवी और मोबाइल रोज कर रहा है।
लेकिन फिर भी अगर हमारी नीयत में खोट है, हम बेईमान और भ्रष्ट हैं तो क्या यह हमारा दृष्टि दोष नहीं। खुद पर हमारी नजर नहीं, और दूसरों की नजर में हम ऊपरउठना चाहते हैं, सम्मान पाना चाहते हैं।
भव्य और दिव्य में अंतर है ।।
नज़र कमजोर हो चलेगा, मंदबुद्धि हों, चलेगा, गरीब हो, तो भी चलेगा, लेकिन बुरी नजर वाला, दिल में खोट वाला, स्वार्थी, खुदगर्ज, पाखंडी और नफरत से भरा इज्जतदार, सफेदपोश इंसान नहीं चलेगा। कर्ता से दृष्टा की है यह महायात्रा ;
नजर, अब क्यों नजारे नहीं देखती
अपनों में क्यों परायों को देखती
खुदगर्ज है वह नजर
जो दुश्मनों पर मेहरबां नहीं होती
दोस्ती की कोई जुबां नहीं होती।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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