श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न व नी त …“।)
अभी अभी # ९४३ ⇒ आलेख – न व नी त
श्री प्रदीप शर्मा
*AMUL BUTTER*
भारत कभी सोने की चिड़िया था, और यहां घी दूध की नदियां बहती थी, यह सत्य सनातन है।
द्वापर में सबै भूमि गोपाल की थी, जिन्होंने बृज की गोपियों के साथ रास रचाया था, धेनु चराई थी, बांसुरी की धुन सुनाई थी और गोपियों के घर से माखन चुराया था। खुद ने ही नहीं खाया था, ग्वाल बालों को भी खिलाया था और दाऊ ने बरबस मुख लिपटाया था।
बचपन में मुझे नवनीत बहुत पसंद था। हमारे घर में कभी घी दूध की नदियां नहीं बहीं, हां असली, पंखों वाली चिड़ियां जरूर छायादार वृक्षों पर आकर बैठ जाती थी। रोज सुबह समय निकालकर सावरकर वाचनालय निकल जाता था, जहां सरिता, मुक्ता जैसी अन्य पत्रिकाओं के साथ, नवनीत डाइजेस्ट भी मेरी प्रिय पसंद थी।।
नवनीत मक्खन को भी कहते हैं। तब हमने अमूल बटर का नाम भी नहीं सुन रखा था। तिलक पथ पर भावे की डेरी थी, जहां दूध, दही, घी, मक्खन और पनीर मिलता था। मक्खन की टिकिया मिलती थी, पन्नी में लिपटी हुई, नमक वाली और बिना नमक वाली। तब पॉलीथिन शब्द हमारे मुंह नहीं लगा था। कभी घर में दूध में मलाई जमने ही नहीं दी तो मक्खन कहां से निकलता। हम माखन चोर भले ही नहीं रहे, लेकिन मलाई हमने बहुत मारी। अपनी चोरी छुपाने के लिए हमने एक बिल्ली पाल रखी थी। मलाई हम खाते थे, और मार बिल्ली खाती थी। आज भी हम चाय मलाई मार के ही पीते हैं।
जिस तरह हाथी के दांत खाने के अलग, और दिखाने के अलग होते हैं, मक्खन भी दो तरह का होता है, खाने का, और लगाने का। कभी पोल्सन नाम का मक्खन भी आता था, जिसका हमने सिर्फ नाम ही सुना। ना कभी खाया और ना ही लगाया।।
वैसे मक्खन जैसी चिकनी चुपड़ी बातें भले ही हमसे करवा लो, हम किसी को मक्खन लगाने के सख्त खिलाफ हैं। हम संस्कारी लोग हैं। हमारे यहां हर काम रीति, रस्म और रिवाज से होता है। हल्दी जैसी गुणकारी वस्तु भी अगर हम खाते हैं तो लगाते भी हैं। बाकायदा हल्दी की रस्म होती है। गाजे बाजे के साथ, डंके की चोट हल्दी लगाई जाती है। हल्दी लगवाई है, कोई चोरी नहीं की।
होती है हमारे यहां तेल मालिश भी, मसाज भी, लेकिन तेल से, मक्खन से नहीं। तेल सरसों का भी चलेगा, खोपरे का भी चलेगा, अगर आप संपन्न हैं तो बादाम का तेल लगाओ, लेकिन कम से कम मक्खन को तो ब्रेड से अलग मत करो। जूते की पॉलिश भले ही क्रीम से होती हो, मक्खन से तो पॉलिश भी नहीं होती।।
जो लोग अधिक घी खाना चाहते हैं, उन्हें अधिक धन कमाना पड़ता है। पैसा सिर्फ मेहनत, भाग्य, पुरुषार्थ अथवा बेईमानी से ही नहीं कमाया जाता, चिकनी चुपड़ी, मीठी मीठी बातों से भी लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
मिश्री सी जबान ही मक्खन का काम भी कर देती है। प्रेम के दो शब्द से तो पत्थर भी पिघल जाता है, फिर इंसान क्या। आप भी बस मीठा बोलिए, वही असली मक्खन है।
अमूल मक्खन स्वदेशी भी और नमकीन भी ! दाल मखनी हो या फिर पाव भाजी, मक्खन तो उसमें तैरना ही चाहिए। आज की पीढ़ी पिज़्ज़ा और आइसक्रीम के नाम पर ढेरों चीज़ (cheeze) और क्रीम का सेवन कर रही है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मक्खन स्वादिष्ट है और पौष्टिक भी। निर्मल बाबा का कहा मानें। खुद भी खाएं और चार लोगों को भी खिलाएं, लेकिन किसी को लगाएं नहीं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




