श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इशारों इशारों में।)

?अभी अभी # ९४४ ⇒ आलेख – इशारों इशारों में ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अजनबी तो बन के करो ना इशारा! कल एक होटल में जन्मदिन की पार्टी में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। शायद वह दुनिया की पहली महिला होगी, जो घोषित रूप से अपना 60वां जन्मदिन मना रही थी। गुब्बारों की ज़बर्दस्त सजावट से, बच्चों के जन्मदिन जैसा माहौल था।

जश्न आधुनिक था, डीजे की कमी आधुनिक (अ)लोकप्रिय गाने पूरी कर रहे थे, जिनकी तेज़ आवाज़, मनोजकुमार की फ़िल्म शोर का विज्ञापन करती नज़र आ रही थी। आप परिचितों से हाथ तो मिला सकते थे, लेकिन कुछ भी कहने के लिए, कान के पास मुँह ले जाना पड़ता था। यह आपातकालीन व्यवस्था भी पुरुषों तक ही सीमित रह पाती थी। किसी संभ्रांत महिला के कानों में कुछ कहने की कोशिश के पहले ही लोगों में कानाफूसी शुरू हो जाने का डर भी लगातार बना रहता था।।

सभी जानते हैं कि खुदा ने हमारे कान मोबाइल सुनने के लिए बनाए हैं। कुछ लोग तो इश्कजादे टीवी सीरियल के दाढ़ी वाले नायक की तरह एक कान से मोबाइल ऐसे चिपकाए रहते हैं, कि कभी कभी शक होता है, पोस्टबॉक्स के लाल डब्बे की तरह, उनका मोबाइल कान से चिपका हुआ है। लेकिन जन्मदिन के शोर से अधिक, फूहड़ फिल्मी गानों की आवाज़, इंसान को बहरा करने के लिए काफी होती है।

वहीं एक मूक-बधिर केंद्र के संचालक ने मुझे कुछ इशारों से समझाना चाहा। मैं समझ गया, वे मूक-बधिर भाषा का मुझ पर प्रयोग कर रहे थे। होगा समझदार को इशारा काफी, मैं मूक-बधिरों की उंगलियों के इशारों की भाषा नहीं समझता। अक्सर कानपुर वाले मुँह की भाषा ही समझते हैं, इशारों की नहीं।।

उनके इशारों की भाषा में फिर भी वे मुझे यह समझाने में सफल हो गए कि इस तरह के भीड़ भरे शोरगुल के माहौल में अगर मूक बधिरों की उँगलियों की मुद्राओं वाली भाषा, एक आम इंसान भी सीख ले तो क्या बुरा है। व्यर्थ शब्दों के प्रयोग अथवा दुरुपयोग से भी छुटकारा और आवाज़ के प्रदूषण के बिना सामने वाले के दिल तक आपकी बात भी पहुँच जाए और इंसान को तो क्या, दीवारों तक को कानोंकान खबर न हो।

और अनायास ही मुझे बिहारी याद आ गए ;

कहत नटत, रीझत खिछत,

मिलत खिलत लजियात।

भरे भौंन में करत हैं

नयनन हि सों बात।।

आजकल जब भी टीवी न्यूज़ पर धुरंधरों की धारावाहिक बहस चल रही होती है, मैं टीवी के म्यूट बटन का उपयोग कर लेता हूँ। उनके इशारों और हाव-भाव से महाभारत का आंखों देखा हाल मुझ तक आसानी से पहुँच जाता है।

कोई भी भाषा बुरी नहीं, चाहे फिर वह मूक बधिरों की भाषा ही क्यों न हो। इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से, गीत की प्रेरणा भी शायद गीतकार को इसी भाषा से आई हो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments