श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मंदबुद्धि…“।)
अभी अभी # ९४५ ⇒ आलेख – मंदबुद्धि
श्री प्रदीप शर्मा
मैं मंदबुद्धि हूं! जिनकी बुद्धि मंद होती है, उन्हें मंदबुद्धि कहते हैं। अक्ल और बुद्धि एक ही होती है, बस इसी भ्रम में लोग मुझे भी अक्लमंद समझ लेते हैं। मुझे अपने बारे में कोई भ्रम नहीं। मैं बचपन से ही ऐसा हूं।
बूढ़ा होने से बुद्धि नहीं आ जाती! जो लोग अपने सफेद बाल डाई करके काले करते हैं, वे भी मौका आने पर, यह कहने से नहीं चूकते, कि हमने अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये। वैसे भी कम पोषण से भी आजकल कम उम्र में बाल सफेद होना शुरू हो जाते हैं। जिनके सर में बाल ही नहीं हैं, उन्हें ऐसे जुमलों से बचना चाहिए।।
पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। रही सही कसर, जन्म पत्री पूरी कर देती है। हर बच्चे की कुंडली में बल, बुद्धि और यश लबालब भरा रहता है। जब बड़ा होने पर मेरे सितारे गर्दिश में आए, और उपलब्ध जन्म कुंडली ज्योतिषी को दिखाई तो उन्हें मुझमें साढ़े साती का योग नजर आया। शनिदेव मुझ पर मेहरबान थे।
मुझे अच्छी तरह याद है, तब हर शनिवार को नगर पालिका द्वारा सड़कों की धुलाई होती थी। एक पाड़ा गाड़ी में, पानी की टंकी रखी रहती थी, जिससे एक सफाई कर्मी पहले चमड़े के मशक में पानी भरता था और बाद में उससे सड़कों की धुलाई सफाई होती थी। सड़क से लगे फुटपाथ के पास एक छोटे से स्थान में शनि महाराज विराजमान हो जाते थे। हर शनिवार को लोग शनि को तेल चढ़ाते थे। मैने कभी नहीं चढ़ाया, इसलिए शनि महाराज मुझसे नाराज़ थे।।
सुना है बादाम खाने से याददाश्त अच्छी होती है, बुद्धि तेज होती है। तब बादाम मूंगफली के भाव बिकती थी। लेकिन तब भी हम चने और मूंगफली ही खाते थे। आज तो मूंगफली भी बादाम के भाव मिल रही है। भला हो सेहत के ठेकेदारों का, जो उन्होंने हमें मीठे तेल से सोयाबीन पर ला दिया। तेल से कॉलोस्ट्रोल बढ़ता है, बादाम खाओ, याददाश्त बढ़ाओ।
वैसे मंदबुद्धि होने से मुझे कोई खास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा! I never stood second in my class. (जाहिर है, थर्ड ही आया हूंगा। ) मां के अनुसार मेरी आंख पर एक चोट के कारण मेरी आंखों और दिमाग पर गहरा असर पड़ा। फिर भी सूरदास और अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन मुझे प्रेरणा देते रहे। वैसे भी मुझे कहां स्वर्ग की आस थी।।
आज जब डिजिटल युग में भी 4-G का नेटवर्क स्लो चल रहा है, जिंदगी की गाड़ी भी बिना पटरी के चल रही है, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी बनते चले जा रहे हैं, इंसान का शातिर दिमाग जैविक हथियारों की खोज करने में लगा है, तो मैं क्यों न राम भजन करूं। इतने भक्त तो भक्ति काल में भी नहीं हुए, जितने आज नजर आ रहे हैं। वैसे भी कपास ओटना अपने बस की बात नहीं।
जीवन में यह मलाल जरूर रहेगा कि कभी गांधीजी का चरखा नहीं चलाया और न ही कबीर की तरह कभी ताने बाने पर ध्यान दिया। हां! पांव सदा चादर में रखे और हमेशा चादर सर्फ से धोता रहा। वैसे भी इड़ा और पिंगला नाड़ियां जब सुषुम्ना में प्रवेश करती हैं तो कोई बुद्धि का प्रमाण पत्र नहीं मांगती। सुना है, स्लेट खाली हो, तो सुषुम्ना में प्रवेश जल्दी मिल जाता है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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