श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चरण-पादुका …“।)
अभी अभी # ९४९ ⇒ आलेख – चरण-पादुका
श्री प्रदीप शर्मा
जिसे हम कलजुग में जूता कहते हैं, उसे रामराज्य में चरण-पादुका कहा जाता था। भगवान रामचंद्र को जब वनवास हुआ था, तब वे लछमन-जानकी सहित, चौदह वर्ष के लिए, नंगे पाँव, अर्थात bare-foot जंगल प्रस्थित हो गए थे, और उनके भ्राता भरत ने उनकी चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान कर, अजोध्या का राजपाट संभाला था।
चरण-पादुका शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई ऐसी भी पादुका रही होगी, जिसे हाथों में पहना जाता होगा, और उसे शायद हस्त-पादुका कहा जाता होगा। लेकिन रामायण में ऐसी किसी हस्त-पादुका का जिक्र नहीं है, हाँ एक मुद्रिका का वर्णन ज़रूर आता है, जिसे हनुमानजी अशोक वाटिका में सीता जी को भेंट करते हैं, और जिसे आज अंगूठी कहा जाता है, लेकिन जिसे अंगूठे के बजाय अनामिका में धारण किया जाता है।।
पादुका उतनी ही पवित्र मानी जाती है, जितने संत-महात्माओं के चरण। मांगी नाव न केवट आना, प्रसंग में केवट पहले रामचंद्रजी के चरण धोता है और फिर उन्हें अपनी नाव में प्रवेश देता है। सज्जनों! बड़ा मार्मिक प्रसंग है। जिनके चरण-रज से पत्थर की मूरत, अहिल्या बन गई, अगर वे ही चरण केवट की नाव पर पड़ गए, तो उसकी रोजी-रोटी का क्या होगा? और हज़ारों वर्षों बाद प्रयागराज में उल्टी गंगा बहने लगी जब कोई प्रधान-सेवक, नमामि गंगे के स्वच्छता-सेवकों के चरण धोता है, तो कलेजा मुँह को आ जाता है। धन्य है भारत भूमि, और यहाँ के महान अवतारी पुरुष।
महान विभूतियों का केवल पाद-प्रक्षालन ही नहीं होता, उनकी पादुकाओं का विधिवत पूजन भी होता है, जिसे सद्गुरु-पादुका-पूजन कहते हैं। गुरु-पूर्णिमा के पर्व पर सद्गुरु एवं उनकी पादुका-पूजन का विशेष महत्व होता है। यह आस्था का विषय है, जिसके लिए तुलसी और राम भक्त हनुमान की तरह श्रीराम को हृदय में विराजमान करना पड़ता है।।
ये कहाँ आ गए हम! आइए, वर्तमान में प्रवेश करते हैं। चरण अब सामान्य पाँव हो गए हैं, जिनकी साँप-बिच्छू, धूल-मिट्टी, काँटे और कंकड़-पत्थर से सुरक्षा के लिए पाँवों में जूता धारण किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल मर्द ही पाँवों में जूता पहन सकते हैं, लेकिन महिलाओं को चप्पल पहनने में आसानी होती है, और साड़ी के साथ न जाने क्यों, जूते को कुछ शर्म सी महसूस होती है।
दूसरी बात! कुछ मजनुओं की पूजा के लिए, पाँव से चप्पल निकालकर पूजा करने में बड़ी आसानी होती है। अभी-अभी एक सांसद ने पाँव से जूता निकालकर एक विधायक की पूजा कर दी। जहाँ चाह है, वहाँ राह है, और आवश्यकता, आविष्कार की जननी है। किसे पता था, जिस पादुका की श्रद्धा और समर्पण से पूजा होती है, वही पादुका, जूते का विकराल रूप धारण कर, समय आने पर, किसी के सर की पूजा के काम आएगी।।
उपनयन संस्कार की ही तरह घरों में एक और संस्कार होता था, जिसे कोई विधिवत नाम तो नहीं दिया जाता था, लेकिन जब भी बच्चों की अकल ठिकाने लगाना होती थी, उनकी बाबूजी द्वारा जूतों से पूजा की जाती थी। कालांतर में किसी की भी अकल ठिकाने लगाने के लिए, इस विधि का उपयोग किया जाने लगा। राग दरबारी में इस विधि को जुतियाना कहा गया है। सुधिजन इसे पढ़कर लाभान्वित हों, और यह ज्ञान उन्हें वक्त ज़रूरत काम आवे।।
वैसे समय बड़ा बलवान है और आदमी महान है ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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