श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खरी खरी…“।)
अभी अभी # ९५१ ⇒ आलेख – खरी खरी
श्री प्रदीप शर्मा
जो व्यक्ति खरे होते हैं, वे हमेशा खरी बात ही करते हैं। खरा, निखालिस शुद्ध को कहते हैं। खरा केवल सोना ही नहीं होता, खरे सोने जैसी बहू भी होती है, जिसमें कोई खोट नहीं होता। ऐसी बहू लाखों में एक होती है।
जब ऐसी बहू की तारीफ़ में कसीदे कढ़े जाते हैं, तो सास से बर्दाश्त नहीं होता, और वह कह उठती है, हमारा लड़का भी हीरा है हीरा।
जब सोने के आभूषण बनते हैं, तब उसमें थोड़ा खोट मिलाना पड़ता है, वह पीतल, चाँदी, तांबे का भी हो सकता है। शुद्ध सोने को टंच कहते हैं, इसके केवल बिस्किट बनते हैं, जो खाये नहीं जाते, केवल स्मगलिंग के काम आते हैं। खरे, खोटे, लोगों के नाम भी हो सकते हैं। शुभा खोटे और दुर्गा खोटे दोनों अच्छी मंजी हुई कलाकार थी, लेकिन उनमें कोई खोट नहीं था।।
जो लोग स्पष्टवक्ता होते हैं, वे ज़्यादा लाग-लपेट में विश्वास नहीं करते। चाहे किसी को बुरा लगे या भला, खरी-खरी सुना देते हैं। खरी खरी सुनने वाले को इतनी खरी तो नहीं लगती, लेकिन सुनाने वाले के चेहरे पर एक विजयी भाव अवश्य देखा जा सकता है।
जब मन में बहुत-कुछ उबल रहा होता है, और बाहर आने को आमादा होता है, तब खरी-खरी ही नहीं, खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। खरी-खोटी सुनाना पराक्रम है, और सुनना पराजय। खरी-खरी में जहाँ हल्का सा समझाइश का पुट होता है वहीं खरी-खोटी में अच्छा-गलत, भला- बुरा, अपमानजनक और शालीन भाषा में अपशब्दों का प्रयोग होता है। खरी खरी, और खरी खोटी कभी शालीनता की मर्यादा नहीं लांघते। जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तब गाली-गुप्ता की नौबत आती है। खरे गाली नहीं बकते। सभी खोटे गुप्ता नहीं होते।।
खरी खरी और खरी खोटी अक्सर सुनाई जाती है। इनके अलावा एक अवस्था और होती है, जिसमें कुछ कहा-सुनी नहीं होती, केवल भूरि भूरि प्रशंसा होती है। यह न तो चापलूसी की श्रेणी में आती है, और न ही कटाक्ष की। आप इसे जमकर तारीफ करना भी कह सकते हैं, लेकिन तारीफ भी वहीं की जाती है, जहाँ कुछ निहित स्वार्थ होता है।
आजकल भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती। यह प्रशंसा निःस्वार्थ होती है, और व्यक्ति के गुणों के आधार पर की जाती है। मुझे खुशी है कि इस प्रशंसा का अभी तक राजनीतिक प्रयोग नहीं हुआ है। तब शायद इसका रंग भूरा न रहे, मटमैला या बदरंग हो जाए।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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