श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारों का लॉक डाउन…“।)
अभी अभी # ९५८ ⇒ आलेख – विचारों का लॉक डाउन
श्री प्रदीप शर्मा
चित्त, मन और बुद्धि के साम्राज्य में विचार कहां से उठते हैं, कहां चले जाते हैं, कहना बड़ा मुश्किल होता है। विचार आपके कहने से नहीं आता। जब किसी एक विषय पर आप अपना मन केंद्रित करते हैं, तब विचारों को एक दिशा अवश्य मिल जाती है।
एकांत हो, और लेखन का मूड हो, तो विचार मानो नोट बंदी की कतार में खड़े मिलते हैं। मेरा नंबर कब आयेगा! कुछ विचार ऐसे भी होते हैं जो कतार तोड़कर आगे निकल जाते हैं। अगर इनकी तकदीर अच्छी हुई तो उनको लेखक के पन्नों में जगह मिल जाती है। कभी कभी तो विचारों का आगमन तय होता है और इतने में ही पत्नी चाय का प्याला लेकर चली आती है, और आया हुआ विचार चाय की भाप के साथ हवा हो जाता है।।
विचारों को जितनी जल्दी कलम में कैद कर लिया जाए उतना अच्छा क्योंकि विचारों की फितरत आवारा किस्म की होती है। आज ऐसा ही कुछ अहसास हुआ, जब कुछ लिखने के लिए कलम उठाई। विषय तक तय था लेकिन अचानक विचारों पर ऐसा ब्रेक लगा, मानो लॉक डाउन घोषित हो गया हो। बहुत दिमाग पर ज़ोर डाला, लेकिन न तो वह शीर्षक स्मृति में वापस आया, न ही कोई विचार।
मैं आंखें बंद करके लेट गया।
आसपास की आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थी, लेकिन विचारों का आवागमन पूरी तरह बंद था। सृजन की अवस्था से अचानक एक बंजर जमीन जैसी अवस्था किसी को भी असहज कर सकती है, लेकिन मैं इस अवस्था में भी आनंद तलाश कर रहा था। बिना प्रयत्न किए, विचार शून्य होना, सहजावस्था के संकेत हैं। जो चित्त हमेशा समुद्र की लहरों की तरह अशांत रहता है, अचानक गहरे पानी पैठ गया है। वहां कोई हलचल नहीं, कोई सात्विक, राजसी अथवा तामसी विचार नहीं।।
उस विचारशून्य अवस्था से जब पुनः विचारों के प्रवाह ने मुझे झंझोड़ा, तब मुझे आभास हुआ मैं विचारों के शून्य से गुजर चुका हूं। विचारों का लॉक डाउन समाप्त हो गया है, अब विचार किसी के बाप से नहीं रुकने वाले।
शून्य में ऐसा क्या है, जो किसी अंक में नहीं। क्या विचारों के अभाव का चित्त पर इतना प्रभाव पड़ता है कि वह संकल्प विकल्प करना भूल जाता है। यह वह अवस्था नहीं जिसे किंकर्तव्यविमूढ़ कहा जाता है। विचारों का अभाव ही ध्यान है, समाधि है, जहां प्रज्ञा पूर्ण रूपेण जाग्रत रहती है। विचारशून्यता एक ऐसा आकाश है, जहां जागृति होते हुए भी जड़ता नजर आती है। हमारा अस्तित्व उसी शून्य से है, वही संभवतः चिदाकाश है।।
♥ ♥ ♥ ♥ ♥
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






