श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और डोर।)

?अभी अभी # ९६२ ⇒ आलेख – रिश्ते और डोर  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बचपन में हम मुंह से गुब्बारे फुलाते थे, इधर हमारा मुंह फूलता, उधर गुब्बारा फूलता। फूलने और फुलाने की भी एक सीमा होती है, जल्द से हमारा मुंह हटाते, गुब्बारे का मुंह मोड़ मोड़ कर बंद करते, और उसके मुंह पर एक धागा बांध देते। उसे वॉलीबॉल की तरह हवा में उछालते, लेकिन वह बेचारा हवा में टिक ही नहीं पाता। रिश्ते हवा में ऐसे ही नहीं टिकते।

कुछ गुब्बारे गैस के होते थे, वे हवा में भी उड़ते थे, बिना डोर के उड़ते थे। आसमान भी छूने की कोशिश करते, लेकिन हवा निकलते ही, उनकी उड़ान भी हवा हो जाती।।

फिर हमने आकाश में पतंग भी उड़ाई, जब तक डोर हमारे हाथ में रही, पतंग भी हवा में आसमान छूती रही। इधर डोर टूटी, उधर पतंग जमीन पर आ गिरी। बिना डोर के, हमने एक पंछी को आसमान छूते देखा है लेकिन कभी किसी पतंग को बिना डोर के आसमान में उड़ते नहीं देखा।

हमारे रिश्ते भी तो गुब्बारे जैसे ही हैं, थोड़ा प्रेम से मुंह लगाया, और रिश्ता खुशी के मारे फूलने, उछलने कूदने लगता है। कहीं रंग बिरंगी रिश्तों की पतंग आसमान छू रही है, और हम सिर्फ डोर संभाले हुए हैं। रिश्ते हवा में हो, बड़े सुंदर लगते हैं, अगर हवा प्रतिकूल हुई, डोर कमजोर हुई, रिश्ते औंधे मुंह जमीन पर आ गिरते हैं।।

आजकल हमने रिश्तों को गुब्बारों की तरह फुलाना सीख लिया है। बच्चों का जन्मदिन हो, मंगल प्रसंग हो, शिलान्यास, उद्घाटन, लोकार्पण, शादी की सालगिरह और अमृत महोत्सव, हार फूल के साथ गुब्बारों के प्रवेश द्वार, वातावरण को और अधिक रम्य और आकर्षक बना देते हैं। बस गुब्बारों का मुंह बंद हो, वे मुस्कुराहट बिखेरना जानते हैं।

आजकल हमारे रिश्तों की डोर किसके हाथ में है, हमें ही पता नहीं। लगता है आज के रिश्ते भी रिमोट से ही चल रहे हैं। रिमोट से रिश्ते कंट्रोल ही नहीं होते, ऑफ/ऑन भी हो जाते हैं।।

पहले रिश्ते करीबी होते थे, हवा में नहीं होते थे। आप उन्हें छूकर, महसूस कर सकते थे। हमने रिश्तों को बहुत टटोलकर, सहेजकर रखा था कभी। आज रिश्ते, समय की तरह हाथों से फिसलते चले जा रहे हैं, और हम लाचार, असहाय, बस हाथ मलते जा रहे हैं।

पहले, हर रिश्ते पर हमारी नजर रहती थी। पानी के बीच भले ही लकीर खिंच जाए, रिश्तों के बीच लकीर खींचना कहां इतना आसान था। आज उन रिश्तों को किसी की नज़र लग गई है।।

कहां कहां जा बसे हैं आज, कभी हर पल साथ रहने वाले रिश्ते। जिन रिश्तों को हमने आज तक यादों में संजोया है, सपने भले ही रंगीन देखे हों, तब तो तस्वीरें भी श्वेत श्याम ही होती थी। आज दूर के रिश्ते रंगीन कैमरा कैद कर लेता है। गजब की मेमोरी है उसकी, उसका भी अपना मेमोरी कार्ड है।

हमारी मेमोरी आज तक फुल नहीं हुई, सभी यादें, तस्वीरें जीवंत कैद हैं। आज सबके हाथों में कैमरा है और मेमोरी फुल है। कोई चिंता नहीं, पैन ड्राइव है न।।

तस्वीरों के साथ साथ, आप चाहें तो रिश्ते भी डिलीट कर दें। कच्चे धागों के रिश्ते अधिक मजबूत होते थे आज के डिजिटल रिश्तों की तुलना में। यह राखी भी अब ई – राखी हो गई।

दर से दर, डोअर टू डोअर से हमारे रिश्तों की डोर आज बस गुब्बारा बनकर रह गई है। आज फुलाया, कल मुरझाया।

एक सुई की नोक ही काफी है इस रिश्ते की हवा निकालने के लिए।।

बच्चे समझदार हैं। गुब्बारे से खेल भी लेते हैं और उसे फोड़ना भी उनका खेल ही होता है। अभी उनकी उम्र गुब्बारों की उम्र है और हमारी उम्र, एक गुब्बारे जितनी। हमें अभी गुब्बारों से प्यार है, रिश्तों से प्यार है। बिना डोर के भी हम सहेज रहे हैं, प्रेम के रिश्ते, कुछ फूले हुए गुब्बारे, कुछ गुलदस्ते प्यारे प्यारे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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