डॉ निशा अग्रवाल
☆ आलेख ☆ “संविधान और समझ की आवश्यकता” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆
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“संविधान लिखने वाले के पास 32 डिग्रियां और 9 भाषाओं का ज्ञान था,
और आज अनपढ़ लोग संविधान में कमियां निकाल रहे हैं।”
यह वाक्य केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की एक विडंबना को उजागर करता है।
भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि विद्वता, संघर्ष और दूरदर्शिता का प्रतीक थे। उन्होंने Columbia University तथा London School of Economics जैसे विश्वविख्यात संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे विधि, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र और इतिहास के गहरे ज्ञाता थे। अनेक डिग्रियों और बहुभाषीय ज्ञान से सम्पन्न होकर उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश के लिए ऐसा संविधान रचा, जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।
भारतीय संविधान कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं है। यह सदियों के अनुभव, संघर्ष और चिंतन का परिणाम है। इसमें प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ कर्तव्यों का भी उल्लेख है। यह केवल शासन का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है।
परंतु आज सोशल मीडिया के युग में बिना अध्ययन और बिना गहराई के समझ के लोग संविधान की आलोचना करने लगते हैं। आलोचना करना गलत नहीं है—लोकतंत्र में यह अधिकार है। परंतु बिना जानकारी, बिना अध्ययन और बिना संदर्भ के आलोचना करना समाज को भ्रमित करता है।
संविधान में संशोधन की व्यवस्था स्वयं इसी दस्तावेज़ में दी गई है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, इसलिए संशोधन भी होते हैं। अब तक कई संशोधन हुए हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि संविधान लचीला भी है और जीवंत भी।
वास्तव में आवश्यकता संविधान की आलोचना करने की नहीं, बल्कि उसे पढ़ने और समझने की है। जब तक हम संविधान के मूल सिद्धांत—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को आत्मसात नहीं करेंगे, तब तक उसकी महत्ता को पूर्ण रूप से नहीं समझ पाएंगे।
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान बनाते समय चेतावनी दी थी कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह प्रभावी नहीं रहेगा। इसका अर्थ स्पष्ट है—दस्तावेज़ से अधिक महत्वपूर्ण उसे लागू करने की निष्ठा और समझ है।
आज हमें आवश्यकता है अध्ययनशील नागरिक बनने की। केवल डिग्रियों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि समझ और विवेक आवश्यक है। संविधान पर प्रश्न उठाने से पहले हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए—क्या हमने उसे पढ़ा है? क्या हमने उसके मूल भाव को समझा है?
संविधान में कमियां खोजने से पहले हमें अपनी समझ को समृद्ध करना होगा। तभी हम सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के सजग और जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे।
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© डॉ निशा अग्रवाल
शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर
जयपुर, राजस्थान
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







हार्दिक आभार आदरणीय