श्री सुधीर मोता

?  आलेख – हमारी जेब हमारा चेहरा… ? श्री सुधीर मोता

उस जेबकतरे ने मेरे चेहरे और हाव भाव से अनुमान लगा लिया होगा कि इसकी जेब में माल है , तभी ना उसने मेरी जेब में हाथ डालने की कोशिश की । यह उस की कला है जो उसके रोजगार में काम आती है । कह नहीं सकता कि अगर वह सफल हो जाता तो अपने को उतना ही समृद्ध अनुभव करता जितना मैं वह सौ के इकलौते नोट की संपदा जेब में ले कर घूमने में कर रहा था या मेरे उसकी उम्मीद से घटिया निकलने पर मन ही मन मुझे गालियां दे रहा होता। जो भी हो उस घटना ने जो कि आगे बढ़ते बढ़ते रूक गई मुझे सचेत कर दिया। मुझे वह कला सीखना होगी जिससे मेरा चेहरा और हाव भाव देख कर अनुमान ही न लगाया जा सके कि यह अनमना सा लगता इंसान किस हद तक मालदार या कड़का है। मैं सौ रूपये जेब में ले कर इतना फूला न समाया घूम रहा था कि मेरे बेहद मालदार होने जैसे हाव भाव चेहरे पर थे। अब मुझे अपने बारे में कुछ करना होगा । मैं गूगल गुरू की शरण में जा ही रहा था कि मेरी नजर एक समाचार पर ठिठक गई । किसी के घर एक दुर्घटना हुई या हुवाई गई और उसके एक कमरे में करोड़ों के अधजले नोट पाये गये । मैंने खबर विस्तार से पढ़ी उस व्यक्ति की फोटो भी देखीं, उसके कामकाज के बारे में जाना। फिर इतने ज्ञान के साथ गूगल गुरू की शरण में चला गया। 

वहां ऐसी घटनायें भरी पड़ीं थीं । किसी की कार में करोड़ों का सोना। किसी के घर में करोड़ों के नोट। ये व्यक्ति मेरे गुरू बन सकते हैं जिनसे सीख कर मैं किसी भी जेबकतरे को चकमा दे सकता हूं। इन लोगों के चेहरे से तो कोई अनुमान नहीं लगा पाया कि वे कितनी दौलत के ढेर पर बैठे हैं। ये अपनी नौकरी, अपना कामकाज यूं कर रहे थे जैसे कोई भी और करता है । एक साबुन के विज्ञापन में एक महिला की त्वचा से उम्र का पता ही नहीं चलता वाली बात कही गई वैसे ही इन लोगों की चमड़ी चाल ढाल से किसी को पता तक ना चला कि वे इतनी अकूत दौलत के स्वामी हैं । मैं इन लोगों की फोटो को बड़ा कर कर के देखता हूं शायद कहीं से पता चले । बिल्ली जब मलाई या दूध की तपेली चाट चूट कर उतने ही दबे पांव निकलती है तो गृह स्वामिनी पल में समझ जाती है कि उसके चेहरे पर के भाव क्या कह रहे हैं । पर ये भाई साब होन ? घर में इतना मालपानी भरा पड़ा और आपकी शक्ल यूं जैसे पहली तारीख को तनख्याह ना मिले तो आप भूखे ही मर जायें । कहां से लाते हो भाई इतनी सादगी ?

मुझे लगता है अगर आप चेहरे पर सदा भूख के भाव रखें तो दुनिया को भरम में रख सकते हैं । जैसे अगर आप ने एक करोड़ का धन आनन फानन में अर्जित कर लिया जो कि जाहिर है किसी ऐसे स्रोत से आया होगा जो मान्य नहीं है पर प्रचलित भरपूर है तो आप दूसरे एक या अधिक करोड़ की जुगाड़ में जुट जाईये। जैसे कोई मछली पकड़ने वाला या बगुला मग्न होकर नदी सरोवर समुद्र किनारे ताक में बैठा रहता है वैसे ही। मजाल है कोई आप को चीन्ह सके कि आप के तो घर में अपार धन रूपी मत्स्य संपदा भरी पड़ी है। आप यूं बैठे रहिये कि इस प्रयास के सफल होने पर ही आपके घर का चूल्हा जल सकेगा। आपके बच्चों की स्कूल की फीस भरी जा सकेगी । दोस्तों के साथ आप चाय पीने जायेंगे तो शायद इस बार आप का हाथ जेब में जाये तो कुछ पैसे ले कर बाहर निकले। मैं बता देना चाहता हूं कि ये सब कुछ मुझे गूगल गुरू ने नहीं बताया । मैंने खुद उन लोगों का प्रोफाईल देख कर ये लाभप्रद सीखें अपने लिये अर्जित कर लीं । पर उस से क्या ? हम भी रहे ढोर के ढोर ही । आदतें इतनी आसानी से नहीं जातीं । शऊर भी यूं एकाएक नहीं आ सकता । जिनके घर में करोड़ो के नोट बमुश्किल अपने भीतर के ताप को दबाये रहे और अंततः कोई चिंगारी भड़की जिसने रहस्य लगभग खोल ही दिया , उसके तप को और ताप दबाये रखने की क्षमता की आप तनिक भी प्रशंसा नहीं करेंगे ? और इसके बाद भी तो देखिये कितना ही बड़ा मनोवैज्ञानिक होगा उन महानुभाव के चेहरे को पढ़़ सके इतनी प्रतिभा उसमें नहीं होगी।

तो अब किया क्या जाये ? एक जेबकतरे ने हमें झकझोर कर रख दिया और इस उम्र में हमें पता है कि हम कहते ज़रूर हैं कि दुनिया न बदल पायें अपने को ज़रूर बदलेंगे पर होता यह है कि हम तनिक-सा बदलते हैं दुनिया अपने को पट से भारी बदल लेती है । लोगों के घरों से, मोटर गाड़ियों से करोड़ों की दौलत संयोग से धरी पकड़ाई जाती है पर जिनकी नहीं पकड़ी जाती उनकी संख्या हज़ारो लक्खों गुनी है। हम अपनी जेब की दौलत को किस तरह उजागर न होने दें वह कला हमें कौन सिखायेगा ? उतने तक तो ठीक , हमारी जेब में सौ के नोट की जगह एकाध लाख की दौलत से भरा बटुआ है ये कैसे लग जाता है दुनिया वालों को। ये मुस्काते रहने वाली मुद्रा और सदा संतोषी दिखते रहने का छदम कैसे लाद लिया हमने अपने पे के हमें पता ही ना चला और हमारी ऐसी नुकसानदेह इमेज बन गई ? अब इसका हर कोई अलग मीनिंग निकाल लेता है मौके बे मौके। जेब कतरे तो दृश्य में कभी कभार ही आते हैं , बकिया वक्त में कितनी तपती निगाहें हमें घूरती रहती हैं हम ही जानते हैं। 

हमें तो लगता है हमारे पसीने की गंध ही इतनी भन्नाट है कि लाख छुपाओ ये दौलत प्रकट हो ही जाती है और जित्ती है उससे अधिक ही समझ आती दुनिया को। कम पसीने से धन कमा सकें ऐसी कोई तरकीब किस उस्ताद या गुरू से मिलेगी ? या ऐसा कुछ हो सके कि कमाई हो और पसीना ही न निकले। एक पूरी रात मंथन करने के बाद हमें अपने में जो खोट है वह समझ आ ही गई। जब तक हम अपने को ये समझा कर तैयार नहीं कर लेंगे कि जितना हमारी जेब में है या जितना हमने कमाया हम उससे अधिक के लायक हैं तब तक हमारा कुछ नहीं होने का । जेबकतरे हम पर घात करते रहेंगे और निराश होते रहेंगे, हम ऐसी खबरें पढ़ पढ़ कर सीखने की नाकाम कोशिश करते रहेंगे। खुद अपने को अपनी औकात कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताने की कोशिश कर देखते हैं हैं एकाध बार। शायद कुछ हो सके। ये तो साबित हो ही चुका है कि खोट हम में ही है । देखिये न अभी अभी अपना हाथ अपनी फूली हुई जेब पर चला गया। जुकाम के कारण गीला, मुचा हुआ रूमाल और कुछ बिल ठुंसे थे जेब में। जेबकतरों और दुनिया के इस-उस टाइप के लोगों के और स्वयं अपने हित में हमें अपने आप को बदलना ही होगा, वरना जेबकतरे तक हमें ब्लेकलिस्ट कर देंगे। शायद अपने को हिंदी लेखक के रूप में प्रसिद्ध करवाने से कुछ बात बने , पर वह भी तो नहीं आता हमें। लगता है बिना जेब वाला वह अंतिम वस्त्र धारण करने तक हमारा कुछ नहीं होने का।

© श्री सुधीर मोता

संपर्क – राजविला 2 बी सिविल लाइन्स भोपाल 462 002. फोन 9303138889

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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