श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “यूं ही बैठे – बैठे “.)

 ☆ कविता ☆ यूं ही बैठे – बैठे ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

तुम मुस्कुराने की वजह

क्यों खोजती हो

आईना देख लो,

चेहरा खिल उठेगा -1

 

यूॅं  अकेले बैठकर

शिकायत क्यों करें

खुद से कुछ देर

बातें कर लो

मन यूॅं ही हल्का हो जाएगा -2

 

दुनिया जैसी है,

यह वैसी ही रहेगी

खुद को बदल सको तो,

जिंदगी आबाद होगी -3

 

बहुत से ग़म हैं  जमाने में

कुछ ग़म तुम्हारे ,

कुछ हमारे भी

अगर आपस में बांट सको

तो खुशी ही मिलेगी -4

 

खुशी की तलाश में,

क्यों वक्त जाया करते हो

खुद से मोहब्बत करना सीख लो

फिर किसी तलाश की

जरूरत नहीं रहेगी -5

 

हार -जीत जिंदगी में तो

चलती ही रहेगी

गिर कर अगर उठ सको,

तो जीत तुम्हारी ही होगी -6

 

माना खुशी हमेशा कहाॅं  रहती

पर ग़म का भी कोई

स्थायी मुकाम नहीं होता -7

 

हर मुकाम हासिल ही हो

कोई ज़रुरी नहीं

कुछ मुकाम बेवजह छोड़ दो

सुकून  ही मिलेगी -8

 

यूं अकेले बैठकर

रोने से क्या फायदा

मेरे कंधे पर सर रख लो

मन हल्का हो जाएगा -9

 

खुद का मुस्कुराना,

कोई बड़ी बात नहीं

किसी रोते हुए चेहरे पर

मुस्कुराहट ला सको

तो फिर कोई बात हुई -10

 

जुगनुओं से उजाले की

उम्मीद मत कर

उठ कर एक दीपक जला लो

अंधेरा दूर हो जायेगा -11

 

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

29.04.2026

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

ई-मेल – om1955prakashpandey@gmail.com मो – 9619885135

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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