मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – पंख और परवाज़…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
किस किस के पंख होते हैं..
परिंदों के अलावा।
मन की भावनाओं के,
कल्पनाओं की उड़ानों के,
अभिलाषाओं और महत्वकांक्षाओं के
सपने सलौनों के
सजीली स्मृतियों के
रुपहले, सुनहरे और धुंधले, मटमैले अतीत के
परवाज़ के लिये आस्मां बहुत विशाल है
जैसे सीमाविहीन होता हो..?
कोई सरहद नहीं, कोई बंधन नहीं
जितना ऊंचा, जितनी दूर उड़ जाओ
भारी होने लगें जब तुम्हारे पंख
डैने जवाब देने लगें
उतर आना धीरे से धरातल पर
कुछ साकार होने को उत्साहित आशाएं
यहीं प्रतीक्षा करती मिल जाएंगी
धैर्य तो रखना होगा..
नतीजे आने में वक़्त तो लगता है, मेरे दोस्त…!!!!!
© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




