हेमन्त बावनकर

 

☆ जागती रहे नदी  ☆
 

(स्वर्गीय डॉ॰ गायत्री तिवारी जी की कृति ‘जागती रहे नदी’ से प्रेरित रचना।)

जाग ही तो रही है नदी।

 

हर्ष से हर्षित

प्रियतम प्रियम

मोहिनी सी आभा

ऊपर से शांत

अंतःस्थल

उतना ही अशांत।

जाग ही तो रही है नदी।

 

धीर गंभीर

बहती हुई नदी का

चारु-चिंतन,

यादों के नागपाश।

भावना और कामना

के तटों पर

संभावना की फसल।

जाग ही तो रही है नदी।

 

पथ पर अविरल

पाथेय अनुरूप लय

नियति है

अथाह समुद्र में विलय।

फिर भी सारे पथ

जाग ही तो रही है नदी।

 

किन्तु,

कैसे कर सकती है

विस्मृत

पथ – पाथेय

मित्र – सुमित्र’

दोनों तटों को दे पारस स्पर्श

बहती रहती है अविरल।

जाग ही तो रही है नदी।

 

एक-एक कर

एक-एक पावन तट पर

छूटते जाते हैं पीछे

फिर भी

बहती रहती है नदी

जागती रहती है नदी

जाग ही तो रही है नदी

जागती रहे नदी।

 

© हेमन्त बावनकर

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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Dr Bhavna Shukla
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बेहतरीन अभिव्यक्ति मां को समर्पित की। मां को शत शत नमन

Dr Bhavna Shukla
0

वाह सादर नमन