श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ प्रतिष्ठित कवियत्री और शिक्षाविद डा. संध्या जैन श्रुति की कृति – नर्मदा महाकाव्य ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित)
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वैसे तो अनेक साहित्यकारों ने अपनी कलम के माध्यम से मां नर्मदा की साधना, आराधना की है और उनकी कृति साहित्यिक क्षेत्र में पाठकों के बीच काफी चर्चित भी हुई हैं। इसी तारतम्य में अगर देखा जाए तो डॉ. संध्या जैन ‘श्रुति’ कृत ‘नर्मदा महाकाव्य’ भी माँ नर्मदा के इसी आध्यात्मिक, प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक वैभव का एक अप्रतिम और भावपूर्ण काव्यात्मक आलेखन है।
डा . संध्या जैन ‘श्रुति’
कवयित्री स्वयं ‘आत्मकथ्य’ में अपने जीवन की एक अद्भुत घटना का स्मरण करते हुए व्यक्त करती हैं कि बाल्यकाल में भेड़ाघाट के जलप्रपात में जलधार के बीच गिर जाने पर किस प्रकार माँ नर्मदा कीज्ञ कृपा से उनका जीवन सुरक्षित रहा। यह महाकाव्य उसी जीवनदान के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और अनन्य निष्ठा का भक्तिपुष्प है।
शारदा प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित डा. संध्या जैन श्रुति जी का यह महाकाव्य मंगलाचरण से प्रारंभ होकर १३ सर्गों में सुनियोजित ढंग से विभक्त है। कवयित्री ने माँ नर्मदा की उत्पत्ति, उनके पौराणिक एवं प्राकृतिक स्वरूप, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व तथा आध्यात्मिक चेतना को प्रत्येक सर्ग में विस्तार से प्रस्तुत किया है। उदाहरण स्वरुप अगर हम कृति के कुछ भागों की चर्चा करें तो इस महाकाव्य की पठनीयता से हम परिचित हो सकते हैं।
मंगलाचरण एवं नर्मदा स्तुति:
महाकाव्य का प्रारंभ देवाधिदेव महादेव और उमा-पति शिव की अराधना से होता है। कवयित्री ने शिव-शंकर के पसीने की बिंदु से प्रवाहित होती रेवा के अवतरण को अद्भुत काव्यात्मक छटा में पिरोया है:
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“शिवशंकर की दिव्य-देह से, सतत पसीना बह निकला।
सरल-तरल, अविरल उस जल ने, किया रूप धारण अबला ॥”
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मातृत्व और अनुग्रह का भाव:
कवयित्री का समर्पण भाव महाकाव्य के प्रत्येक छंद में मुखरित होता है। वे अपने अल्पज्ञ स्वरूप को स्वीकारते हुए माँ के सम्मुख आत्म-समर्पण करती हैं:
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“ममता मयी हो मात तुम्हारी समता कहीं नहीं
तेरे सजुल सबल इस जल से सिंचित सारी मही ॥”
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घाटों का आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य:
‘नर्मदा के घाट’ शीर्षक के अंतर्गत कवयित्री ने नर्मदा तटों पर व्याप्त अनहद नाद, मंदिरों की घंटियों और आत्मिक शांति का जीवंत सजीव चित्रण किया है:
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“अटके-भटके रागी प्राणी ऋद्धि-सिद्धि पा जाते
मन की शांति प्राप्त कर लेते शक्ति रूप पतियाते ॥
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ओम् अनहद नाद घंटा-घाट तट की बात
रम्य दृश्यों से सुसज्जित नर्मदा के घाट ॥”
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नर्मदा महाकाव्य’ केवल एक काव्य ग्रंथ नहीं, बल्कि अमरकंटक से लेकर सागर संगम तक बहने वाली रेवा की चेतना का काव्यात्मक संस्मरण है। जैसा कि श्री कल्याण सेवा आश्रम के पूज्य बाबा कल्याण दास जी ने अपने मंगलाशीष में लिखा है— यह कृति माँ नर्मदा की सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक महिमा को सर्वांगपूर्ण रूप में प्रस्तुत करने का एक स्तुत्य एवं सफल प्रयास है।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







