हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार के व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ पर एक दृष्टि ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ पुस्तक चर्चा 📖 डॉ कुंदन सिंह परिहार के व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ पर एक दृष्टि 🌿 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

ये इश्क़ नहीं आसाँ : व्यंग्य-संग्रह 🔥

लेखक: कुंदन सिंह परिहार

प्रकाशक: वर्जिन साहित्यपीठ

ई-मेल: virginsahityapeeth@gmail.com

प्रथम संस्करण: जून 2026

पृष्ठ संख्या: 157

मूल्य: ₹235.00

उपलब्धता: अमेज़न एवं फ्लिपकार्ट

डॉ कुंदन सिंह परिहार

वर्तमान परिवेश की विसंगतियों पर प्रहार करते सार्थक व्यंग्य 🔥

वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा जून 2026 में प्रकाशित व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कुंदन सिंह परिहार जी का सातवाँ व्यंग्य-संग्रह है। इसके अलावा, उनके सात कथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे 1960 के बाद से निरंतर कहानी और व्यंग्य लेखन कर रहे हैं।

पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है, “व्यंग्य लेखन एक सामाजिक उपक्रम है। यदि व्यंग्य समाज के लिए नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। व्यंग्य व्यक्तिगत शिकवा-शिकायत नहीं है, न ही वह मनोरंजन का साधन है। व्यंग्यकार अन्याय, अनीति के विरुद्ध समाज की पीड़ा को प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसलिए परसाई जी ने लिखा कि व्यंग्य हँसने-हँसाने की चीज़ नहीं है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरी संवेदना अभी जागृत है, क्योंकि मेरी दृष्टि में समाज में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान करता है और मुझे लिखने के लिए बाध्य करता है।”

इस संग्रह में उनकी अड़तालीस सामयिक और ताज़ातरीन रचनाएँ संकलित हैं। वर्तमान परिवेश की विसंगतियों को उन्होंने बारीकी से देखा, परखा है और उन पर अत्यंत परिपक्वता से प्रहार किया है। उनके लेखन में कहीं भी हल्के, कटु या कठोर शब्द नज़र नहीं आते। गहरी से गहरी और तीखी से तीखी बात भी वे बेहद सहजता से, मजे-मजे में बयाँ कर जाते हैं। जहाँ एक ओर वे अंग्रेज़ी के कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरी ओर ठेठ हिंदी और देहात के मुहावरों का भी। विषयवस्तु का चयन वे आसपास से और देश में घटित हो रही चिंताजनक घटनाओं से करते हैं। वे कपोल-कल्पित विषयों अथवा नॉन-इश्यूज़ पर बैठे-ठाले अपने तरकश के तीर व्यर्थ नहीं करते। न ही विशुद्ध हास-परिहास के लिए लेखन करते हैं। हरिशंकर परसाई की तरह उनका समग्र व्यंग्य-लेखन सार्थक और उद्देश्यपूर्ण है।

साहित्य से जुड़ाव के चलते, व्यंग्यकार का अन्य (तथाकथित) साहित्यकारों से गाहे-बगाहे मिलना-जुलना होता रहता है। व्यंग्यकार की पैनी दृष्टि सूक्ष्म अवलोकन करती रहती है। तत्पश्चात् इन निरीह प्राणियों पर हल्की-फुल्की फुहार करती है। कवियों का नामकरण, यथा—कवि कोमल प्रसाद ‘उदासीन’, झलकन लाल ‘अनोखे’, छोटेलाल ‘अनमने’, ‘निर्मम’ जी, ‘नश्तर’ जी और ‘खंजर’ जी—उन कवियों की साहित्य-साधना के विषय में काफी कुछ इंगित कर जाता है। व्यंग्यकार के शिल्प का विनोदपूर्ण पक्ष इन रचनाओं को पढ़ने के दौरान पाठक के मुख से स्मित-रेखा को लुप्त नहीं होने देता। ज्यों-ज्यों बात आगे बढ़ती है, विद्रूप की परतें भी खुलती जाती हैं। प्रथम कविता-संग्रह प्रकाशित होने पर, नए उभरते कवि को नगर के वरिष्ठ कवि किताब के विमोचन, उस पर चर्चा और उसके प्रचार विषयक समझाइश देते हुए कहते हैं, “भैया, किताब के कर्मकांड के लिए लोग अपने प्रोविडेंट फंड का पैसा खर्च कर देते हैं, बेटी के ब्याह के लिए रखा पैसा समर्पित कर देते हैं…”

परिहार जी का लेखन मल्टी-डाइमेंशनल है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टि है, इतिहास-बोध है, देश-विदेश की घटनाओं का समावेश है और साहित्यिक गहराई भी है। वे गहन चिंतक और विचारक हैं, जो आवश्यकतानुसार दोहरे चरित्रों की साहित्यिक शल्य-चिकित्सा भी करते हैं। उनकी एक रचना प्रकृति की ‘फूड चेन’ यानी आहार-श्रृंखला पर केंद्रित है, जिसके अनुसार पोषक-तत्व और ऊर्जा का स्थानांतरण पहले जीव से दूसरे जीव में हो जाता है। इसका विस्तारपूर्वक वैज्ञानिक विवरण देने के उपरांत उनका व्यंग्यकार प्रकट होता है। वे कहते हैं, मनुष्य अन्य जीवों की तुलना में अधिक बुद्धि-संपन्न प्राणी है। प्रकृति द्वारा निर्मित आहार-श्रृंखला से उसका मन नहीं भरता। मनुष्य के द्वारा निर्मित आहार-श्रृंखला में उत्पादक से ऊर्जा और पोषण का संग्रह सबसे निचले अधिकारी या सबसे ऊपर के अधिकारी के द्वारा किया जाता है। मुझे लगता है, यह एक अद्भुत व्यंग्य-रचना है।

व्यंग्य-संग्रह में सर्वाधिक संख्या में व्यंग्य धार्मिक आडंबर और पाखंड पर केंद्रित हैं। वर्तमान राजनीतिक परिवेश में जिस तरह के मिथ्या और बड़बोले धर्मचक्र का प्रवर्तन हो रहा है, उससे व्यंग्यकार खासा उद्वेलित लगते हैं। उन्होंने मिथ्याचार का पर्दाफाश करने में कतई कोई मुरव्वत नहीं की है। बाबाओं और अंधभक्तों के हास्यास्पद क्रियाकलापों पर कटाक्ष करते हुए, आस्था का विज्ञान-सम्मत विश्लेषण किया है। स्वर्ग और नर्क, पाप और पुण्य, और आस्तिक और नास्तिक की मान्यताओं को लेकर कुछ-कुछ फंतासी के अंदाज़ में, या भगवान विष्णु से सीधे संवाद की शैली में लिखी गई रचनाएँ आनंदित करती हैं। धार्मिक मिथ्याचार को लेकर उनका आक्रोश बहुत गहरा है, जो बार-बार उनको इस पर कलम से प्रहार करने के लिए बाध्य करता है।

इसके अलावा, उन्होंने राजनेताओं के मूल चरित्र और भ्रष्टाचार को भी खूब अच्छी तरह पहचाना है और छुटभैया नेताओं से लेकर स्थापित नेताओं की खूब खबर अपने व्यंग्यों में ली है। विदेशों में बसे प्रवासियों के “रूट्स” की उथली तलाश पर भी उन्होंने कटाक्ष करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शीर्षक व्यंग्य ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ प्रेम और विवाह की सामयिक विडंबनाओं की ओर इंगित करता है। आज के सामाजिक परिवेश और कुछेक लोगों के विचित्र व्यवहार पर भी उन्होंने सटीक एवं सार्थक प्रहार किए हैं। इनका पूर्ण आनंद तो उन व्यंग्य-रचनाओं को डूबकर पढ़ने में ही आएगा, जैसी कि अंग्रेज़ी में कहावत है—The proof of the pudding is in the eating.

पुस्तक के अंत में, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई पर केंद्रित एक संस्मरण है। परिहार जी नियमित रूप से उनसे मिलने उनके आवास पर जाते थे। परसाई जी को याद करते हुए, वे लिखते हैं, “मैंने महसूस किया कि परसाई जी के संपर्क में आने से व्यक्ति का जीवन प्रभावित और परिवर्तित होता था। उनके जीवन को देखने और उनके साथ उठने-बैठने से व्यक्ति अनेक क्षुद्रताओं से मुक्त हो जाता था। उसके लिए उन मार्गों को अपनाना भी कठिन हो जाता था जो आज ऊपर पहुँचने की आसान सीढ़ी माने जाते हैं। मेरे जीवन पर परसाई जी की जो छाप पड़ी वह शायद अंत तक कायम रहेगी।”

डॉ. कुंदन सिंह परिहार का जीवन सादगीपूर्ण और आडंबर-रहित है। वे स्पष्टवादिता और विद्वतापूर्ण ढंग से अपनी बात रखते हैं। अंग्रेज़ी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने डॉक्टरेट और लॉ की उपाधियाँ भी प्राप्त कीं। लम्बे समय तक अध्यापन करने के बाद वे प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्हें मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के वागीश्वरी सम्मान और भवभूति अलंकरण के अलावा अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करे। उनका रचनाकर्म इसी तरह निर्बाध चलता रहे और उनका स्नेह एवं आशीर्वाद हमें मिलता रहे।

©  जगत सिंह बिष्ट 🔥

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१५ ☆ “MAYA: Seed Takes Root” – लेखक : Anand Gandhi और Zain Memon ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है Anand Gandhi और Zain Memon द्वारा लिखित  MAYA: Seed Takes Rootपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१५ ☆

“MAYA: Seed Takes Root” – लेखक : Anand Gandhi और Zain Memon ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

इन  दिनों चर्चित किताब – MAYA: Seed Takes Root 

लेखक – Anand Gandhi और Zain Memon

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ यह 2026 में प्रकाशित होने वाला एक महत्वाकांक्षी साइंस फिक्शन, फैंटेसी और दर्शन का मिश्रण है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किताब की मूल परिकल्पना

कहानी का संसार है Neh नाम का एक ग्रह। वहाँ Maya कोई सामान्य पेड़ या जंगल नहीं, बल्कि एक विशाल जीवित नेटवर्क है। पूरे ग्रह के लोग इन पेड़ों से जुड़ते हैं और उनके माध्यम से काम, मनोरंजन, शिक्षा, स्मृतियों और साझा स्वप्नों की दुनिया में प्रवेश करते हैं।

सबसे रोचक बात यह है कि Maya हर व्यक्ति के बारे में जानती है। उसकी स्मृतियाँ, विचार और व्यवहार इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं। इस विशाल डेटा के आधार पर वहाँ के शासक, जिन्हें Divyas कहा गया है, भविष्य की घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं और लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

अर्थात यह केवल भविष्य की काल्पनिक दुनिया नहीं है। इसके भीतर आज की दुनिया का इंटरनेट, सोशल मीडिया, बिग डेटा, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिखाई देता है।

कहानी का केंद्रीय पात्र Yachay, 19 वर्षीय युवक है। वह अपने बीमार दादा Daddu के साथ अलगाव में पला है और उसने कभी Maya नेटवर्क से जुड़कर जीवन नहीं बिताया।

इसका एक अप्रत्याशित परिणाम है।

Maya उसे देख नहीं सकती।

जिस समाज में हर व्यक्ति नेटवर्क से जुड़ा है, वहाँ Yachay का Maya से बाहर होना उसे लगभग अदृश्य बना देता है। उसके दादा चाहते हैं कि वह Divya Trials में भाग ले। यह ऐसी प्रतियोगिता है जिसमें अरबों लोग भाग लेंगे और विजेता को लगभग देवत्व जैसी शक्ति और अमरता प्राप्त हो सकती है।

यहीं से कहानी एक बड़े प्रश्न में बदल जाती है, अगर किसी ऐसी व्यवस्था में जहाँ हर व्यक्ति को पूरी तरह देखा, समझा और भविष्यवाणी किया जा सकता हो, कोई व्यक्ति उस व्यवस्था की निगाह से बाहर हो जाए, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र हो सकता है?

विषय बहुत समकालीन है

मुझे लगता है कि इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी कथा से भी अधिक इसका वैचारिक आधार है।

लेखक स्वयं इसे systems fiction कहते हैं, अर्थात ऐसी कथा जिसमें केवल व्यक्ति या घटनाएँ नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था कहानी का पात्र बन जाती है।

पुस्तक कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है।

हमारी सूचनाओं का मालिक कौन है?

हमारे डेटा से लाभ कौन कमाता है?

अगर कोई प्रणाली हमारे व्यवहार का अनुमान हमसे पहले लगा सके तो हमारी स्वतंत्र इच्छा कितनी स्वतंत्र रह जाएगी?

क्या भविष्य को जान लेना भविष्य को नियंत्रित करने के बराबर है?

आज जब सोशल मीडिया एल्गोरिदम यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि हमें क्या पसंद आएगा, कौन सी खबर हम पढ़ेंगे और कौन सा विज्ञापन हमें प्रभावित कर सकता है, तब Maya का विचार अचानक बहुत काल्पनिक नहीं लगता।

Anand Gandhi भारतीय सिनेमा के महत्वपूर्ण प्रयोगधर्मी फिल्मकारों में हैं। उनकी फिल्म Ship of Theseus को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था और Tumbbad ने भारतीय मिथक, हॉरर और आधुनिक सिनेमा के मेल का एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया।

उनकी रुचि केवल फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं रही है। वे दर्शन, विज्ञान, तकनीक, गेम डिजाइन और वैकल्पिक कथा संरचनाओं में भी काम करते रहे हैं। यही पृष्ठभूमि इस उपन्यास में दिखाई देती है।

दूसरे लेखक Zain Memon गेम डिजाइनर और ट्रांसमीडिया क्रिएटर हैं। उनके प्रसिद्ध राजनीतिक रणनीति बोर्ड गेम SHASN और SHASN: AZADI ने राजनीति, खेल और सामाजिक शिक्षा को जोड़ने का प्रयोग किया है।

 यह पुस्तक दो लेखकों द्वारा लिखा गया सामान्य साइंस फिक्शन उपन्यास मात्र नहीं है। इसके पीछे फिल्म, गेम, मिथक, दर्शन और तकनीक का मिला-जुला रचनात्मक अनुभव है।

पुस्तक पश्चिमी साइंस फिक्शन की नकल करने के बजाय South Asian mythology को आधुनिक विज्ञान और तकनीकी कल्पना के साथ जोड़ती है। नामों में भी इसका संकेत मिलता है, जैसे Maya, Divya, Yachay, Kshar, Tarkash आदि।

इस तरह इसकी कल्पना कु छ ऐसी बनती है जिसमेंप्राचीन मिथकीय संसार, आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दर्शन और राजनीतिक सत्ता एक ही कथा संसार में आ जाते हैं।

यही शायद इस पुस्तक को भारतीय लेखकों द्वारा लिखे जा रहे समकालीन speculative fiction के संदर्भ में खास बनाता है।

शीर्षक: MAYA: Seed Takes Root

लेखक: Anand Gandhi और Zain Memon

श्रृंखला: MAYA, Book 1

भाषा: अंग्रेजी

विधा: Science Fiction, Fantasy, Dystopian Fiction, Epic Fantasy

 लगभग 416 पृष्ठ

प्रकाशक: Authors Equity

वितरण: Simon & Schuster

ISBN: 9798893311891

Foreword: Neuroscientist Anil Seth

Audiobook narrator: Hugo Weaving

पुस्तक का ऑडियो संस्करण 25 अगस्त 2026 से उपलब्ध होने की जानकारी प्रकाशक ने दी है, जबकि ब्रिटेन में हार्डकवर संस्करण की सूचीबद्ध रिलीज़ 8 अक्टूबर 2026 है।

इस किताब की चर्चा का एक बड़ा कारण इसका crowdfunding भी है। प्रकाशक इसे crowdfunding इतिहास का highest-funded debut novel बता रहा है।

यह अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि पाठक अब केवल पारंपरिक प्रकाशकों के माध्यम से आने वाली कहानियों का इंतजार नहीं कर रहे। किसी बड़े साहित्यिक प्रोजेक्ट के निर्माण में पाठक स्वयं शुरुआती निवेशक और समुदाय का हिस्सा बन रहे हैं।

 MAYA में भारतीय मिथकीय संकेतों को भविष्य की तकनीकी सभ्यता के प्रश्नों के साथ जोड़ा गया है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ मीना भट्ट सिध्दार्थ का दोहा संग्रह – सुधियों में सिध्दार्थ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

मीना भट्ट सिध्दार्थ का दोहा संग्रह – सुधियों में सिध्दार्थ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

साहित्य जब केवल कल्पना न रहकर जीवन के गहनतम अनुभवों, अश्रुओं और आत्मीय स्मृतियों का प्रतिरूप बन जाता है, तब वह कालजयी कृति का रूप ले लेता है। आदरणीय मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ जी द्वारा रचित दोहा संग्रह ‘सुधियों में सिद्धार्थ’ एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी साहित्यिक संचेतना है। यह पुस्तक केवल छंदों का संकलन नहीं है, बल्कि एक माँ के हृदय का वह हाहाकार और वात्सल्य है, जो अपने प्रिय पुत्र ‘सिद्धार्थ’ की असामयिक विदाई के बाद स्मृतियों के कल्पतरु के रूप में पल्लवित हुआ है। लेखिका ने अपने जीवन की सबसे बड़ी रिक्ति को साहित्यिक सृजन का माध्यम बनाकर पुत्र को एक अनूठी काव्यांजलि अर्पित की है।

पुस्तक के प्रारंभिक पृष्ठों में समाहित आत्मकथ्य पाठकों को लेखिका के गरिमामयी व्यक्तित्व और उनके पारिवारिक परिवेश से परिचित कराता है। 30 अप्रैल 1953 को छतरपुर जिले की नौगांव तहसील में जन्मी मीना भट्ट जी ने न्यायिक सेवा में व्यवहार न्यायाधीश से लेकर जिला न्यायाधीश के पद पर कार्य करते हुए समाज को न्याय दिया। जीवन के उत्तरार्ध में जबलपुर संभाग की लोकायुक्त कमेटी की चेयरपर्सन जैसे उच्च पदों को सुशोभित करने वाली लेखिका का अंतर्मन सदैव साहित्यिक संवेदनाओं से ओतप्रोत रहा। 3 अप्रैल 2022 का वह निष्ठुर दिन, जिसने उनके युवा पुत्र डॉ. सिद्धार्थ को उनसे छीन लिया, लेखिका के जीवन का सबसे अंधकारमय मोड़ था। इस अपार शोक को उन्होंने दोहों की साधना में बदला। पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर अंकित ये पंक्तियाँ हृदय को झकझोर देती हैं:

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“बसे क्षितिज के पार तुम, भूल गए सिद्धार्थ।

अब जीवन यह बोझ है, क्या साउथ क्या नार्थ।।”

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‘सुधियों में सिद्धार्थ’ मुख्य रूप से दोहा विधा पर आधारित है। दोहा अर्ध-सम मात्रिक छंद है, जिसके शिल्प विधान और मात्राओं के नियम का लेखिका ने पूर्ण अनुशासन के साथ पालन किया है। पुस्तक की भाषा तत्सम प्रधान, सुबोध और गंभीर है। छंदों में गेयता, प्रवाह और रसात्मकता का ऐसा अनूठा संगम है कि पाठक स्वतः ही भाव-प्रवाह में बह जाता है। किताब की शुरुआत ‘गणपति’, ‘श्री राम’ और ‘नौ देवियाँ’ जैसी मंगлаचरण की अनूठी रचनाओं से होती है, जो भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को प्रदर्शित करती हैं। ‘गणपति’ वंदना का यह रूप द्रष्टव्य है:

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“वक्रतुंड गणपति सतत, मंगलकारी नाथ।

लंबोदर गजमुख सदा, मोदक प्रिय है हाथ।।”

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वहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम को याद करते हुए वे लिखती हैं:

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“धनुष-बाण है हाथ में, तिलक लगा है भाल।

कमलनयन मोहित करें, आज्ञाकारी लाल।।”

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लेखिका केवल व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि जीवन के शाश्वत सत्यों, साहित्य की शक्ति और दार्शनिकता पर भी अपनी कलम चलाती हैं। ‘शब्द’ शीर्षक के अंतर्गत वे शब्दों की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहती हैं:

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“तौल मोल के बात हो, शब्द बड़े अनमोल।

मिश्री सम मीठे रहें, बोल सुधा सम बोल।।”

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इसी प्रकार ‘वेद’ और ‘दिनमान’ पर लिखे गए दोहे सृष्टि की ऊर्जा, ज्ञान और चेतना को समर्पित हैं। वे प्रकृति को संपूर्ण जगत की आत्मा के रूप में देखते हुए लोक-कल्याण की भावना व्यक्त करती हैं:

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“कर सेवा निस्वार्थ भी, प्रेम रखो भरपूर।

रवि सम करो प्रकाश तुम, रहो दंभ से दूर।।”

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‘सुधियों में सिद्धार्थ’ एक माँ के अश्रुओं से धुला हुआ वह दर्पण है, जिसमें जीवन की नश्वरता और वात्सल्य की अमरता एक साथ दिखाई देती है। मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ जी ने अपनी न्यायिक तार्किकता और काव्यात्मक कोमलता का जो संतुलन यहाँ प्रस्तुत किया है, वह अद्भुत है। यह कृति हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से दोहा लेखन की परंपरा को समृद्ध करती है और पाठकों के दिलों में एक स्थायी संवेदना छोड़ जाती है। यह पुस्तक हर उस सुधी पाठक के लिए संग्रहणीय है जो शब्दों में छिपे जीवन-दर्शन और आत्मीय संबंधों की गहराई को महसूस करना चाहता है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१४ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१4 ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला

लेखक – अरविंद तिवारी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ श्रीमती अनुराधा गर्ग दीप्ति की कृति – युवान ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

श्रीमती अनुराधा गर्ग दीप्ति की कृति – युवान ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत)

बालमन और किशोरवय की भावनाएं मिट्टी के उस लोंदे की तरह होती हैं, जिसे सही समय पर यदि सही आकार न मिले, तो भविष्य की संरचना अधूरी रह जाती है। इसी पावन और महती उद्देश्य को केंद्र में रखकर पाथेय प्रकाशन, जबलपुर से प्रकाशित कवयित्री श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ की नव-प्रकाशित कृति ‘युवान’ (बाल-किशोरी गीतमाला) साहित्य जगत में एक अत्यंत स्वागतयोग्य और श्लाघनीय हस्तक्षेप है। यह पुस्तक मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी के नैतिक, चारित्रिक और सामाजिक परिष्कार का एक सशक्त माध्यम है। कवयित्री स्वयं एक आदर्श शिक्षिका रही हैं, और उनके लंबे शैक्षणिक जीवन का व्यावहारिक अनुभव इस पुस्तक के पृष्ठ-पृष्ठ पर पूरी प्रामाणिकता के साथ झलकता है। उन्होंने बच्चों के आसपास के परिवेश और उनके बौद्धिक स्तर को बहुत सूक्ष्मता से समझा है। जैसा कि आचार्य भगवत दुबे जी ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही रेखांकित किया है कि ये रचनाएं बच्चों को अनेक बुराइयों एवं कुरीतियों से बचाकर उनमें उच्च मानवीय संस्कारों का अनवरत पोषण करती हैं।

साहित्यिक दृष्टि से दीप्ति जी ने ‘युवान’ को छह वैविध्यपूर्ण भागों में विभक्त किया है, जिसमें धर्म-ज्ञान, प्रखर देशभक्ति, आधुनिक शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महापुरुषों के प्रेरक व्यक्तित्व और तत्कालीन सामाजिक यथार्थ का अनूठा ताना-बाना बुना गया है। बाल-मनोविज्ञान के धरातल पर अवस्थित होकर रची गई इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता इनकी ‘गेयता’, प्रांजलता और भाषा की अत्यंत सरल बोधगम्यता है। पुस्तक में प्रकृति प्रेम और वसुंधरा के संरक्षण को लेकर कवयित्री का मन उद्वेलित हो उठता है, और वे ‘करो श्रृंगार धरती का’ कविता में नई पौध को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए लिखती हैं:

0

“सँवारोगे, सजाओगे,

बचाओगे इसे हर दिन।

ये ऋण माँ का उऋण होने का,

फिर आह्वान देती है।”

0

‘युवान’ के अंतस में राष्ट्रीय चेतना और स्वदेश-अनुराग का स्वर अत्यंत प्रखर और मुखर है। ‘स्वर्णिम भारत’ और ‘ये भारत देश हमारा’ जैसी रचनाएं नई पीढ़ी के भीतर अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति के प्रति अगाध गौरव का संचार करती हैं। आज के वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्र को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का स्वप्न इन भव्य पंक्तियों में जीवंत हो उठता है:

0

“विश्व शक्ति का प्रतीक,

परिश्रमी, बुद्धिमान।

शिक्षा की अलख से,

विश्व हो प्रकाशवान।

विश्व गुरु बने भारत,

एक साथ राष्ट्र गान गाइए।”

0

कवयित्री केवल अतीत के वैभवशाली इतिहास के गौरवगान तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखतीं, बल्कि वर्तमान समाज में फैली विसंगतियों जैसे भ्रष्टाचार पर भी निर्भीकता से चोट करती हैं। वे भावी कर्णधारों को जागरूक करते हुए एक दृढ़ संकल्प की ओर प्रेरित करती हैं:

0

“भ्रष्टाचारी का दलदल,

फैला है इतना ज्यादा।

इसे मिलकर दूर करेंगे,

हम सबका है यह वादा।”

0

भारतीय संस्कृति की शाश्वत उत्सवधर्मिता, अनेकता में एकता और सर्वधर्म समभाव का पावन संदेश इस कृति की मूल आत्मा है। ‘उत्सवधर्मी देश मेरा’ जैसी कविताओं के माध्यम से अनुराधा जी बच्चों को बहुत ही सहज और आत्मीय ढंग से देश की सांप्रदायिक समरसता का पाठ पढ़ाती हैं:

0

“सनतनी है संस्कृति अपनी

भारत भूमि माता अपनी।

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई

आपस में है भाई-भाई।”

0

इसके अतिरिक्त, इस संकलन में समसामयिक और प्रासंगिक आधुनिक विषयों को भी अत्यंत कलात्मकता से स्थान दिया गया है। डिजिटल साक्षरता, ‘डिजीलेप’, ‘व्हाट्सएप असेसमेंट’ और ‘कोरोनाकाल की ऑनलाइन क्लास’ जैसी नवीनतम व्यावहारिक परिस्थितियों को गीतों के सांचे में ढालकर रचनाकार ने यह अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है कि बाल-साहित्य को केवल परियों की कहानियों तक सीमित न रहकर समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।

साहित्यिक भाषा की प्रांजल तरलता, सुरुचिपूर्ण शब्द-चयन और भावों का विलक्षण सौष्ठव ‘युवान’ को एक अत्यंत मूल्यवान और संग्रहणीय कृति बनाता है। जैसा कि पुस्तक के संयोजक राजेश पाठक ‘प्रवीण’ जी ने पूर्णतः सटीक लिखा है, यदि शिक्षक-शिक्षिकाएं और अभिभावक इन प्रेरक कविताओं से विद्यार्थियों को परिचित कराएं, तो यह बाल-चेतना के उन्नयन और राष्ट्र-निर्माण में एक महती पुण्य का कार्य होगा। श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ जी का यह सुप्रयास बालकों की नैसर्गिक जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान भी करता है और उनके अंतर्मन को राष्ट्र-प्रेम की पावन ज्योति से आलोकित भी करता है। बाल और किशोर मनोविज्ञान को समृद्ध करती यह कृति हिंदी बाल-साहित्य की एक अमूल्य धरोहर सिद्ध होगी, जो हर संवेदनशील पाठक और शिक्षार्थी के अंतस को गहराई से छुएगी।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(एक साहित्यिक मूल्यांकन)

आचार्य भगवत दुबे हिन्दी के एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। प्रचार प्रसार से दूर वे एक मौन साधक हैं और उन्होंने न केवल काव्य के कथ्य शिल्प को नये नये रुपों में संजाया संवारा है बल्कि महाकाव्य से लेकर मुक्तक -गजल तक को अपनी लेखनी का पाटल -स्पर्श। प्रदान किया है।

सुविख्यात कवि श्री नीरज की इस प्रभावी प्रतिक्रिया का उल्लेख किया था सुप्रसिद्व कवि श्री चन्द्रसेन विराट ने राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले श्रद्धेय कवि आचार्य भगवत दुबे की काव्य कृति कांटे हुए किरीट में। कवि चन्द्रसेन विराट ने कवि नीरज की इस बात का उल्लेख करते हुए अपनी मंगल कामनाओं में अपनी जो बात इस काव्य पुस्तक में शामिल की वह भी आचार्य जी के काव्य को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए काफी है। वे कहते हैं कि यह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, कथाकार कितनी दिशाओं में एक साथ रचनारत रहा है, यह जानकर सुधी पाठक चकित रह जाता है। इसी कृति में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य सृजन से प्रभावित होकर एक और राष्ट्रीय कवि श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने भी लिखा है कि कवि में अपनी कल्पनाओं को रुपक में डालने की विशेष प्रवृत्ति। दिखाई पड़ती है। भाषा में प्रवाह है और अच्छे प्रयोग देखने को मिलते हैं। उन्होंने लिखा है कि अधिकांश कविताएं उपदेशात्मक और शोषण, अन्याय एवं सांप्रदायिक संकीर्णता के विरोध में है। तदर्थ इन रचनाओं का विशेष महत्व है।

आचार्य जी की इस कृति में अधिकांश कविताएं कृषकों और ग्रामीणों के दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित हैं। दरअसल आचार्य जी स्वयं भी गांव की सोंधी महक में पले बढ़े ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को न केवल अपने आस पास देखा है बल्कि उसे बड़ी गहराई से महसूस भी किया है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में यह बात बड़ी साफ तौर पर देखी जा सकती है। जैसे –

0

न्याय मांगने, गांव हमारे, जब तहसील गये,

न्यायालय, खलिहान खेत, घर गहनें लील गये।

0

और कवि जब ऐसी विषम परिस्थितियों से पीड़ित जनमानस को, परेशान देखता है तो अपनी कविता में आवेश मिश्रित सीख भी देता है –

0

अहंकार, अन्याय रौंदता फिरे जहां जन जीवन को

हे धिक्कार, अनीति सहन करने वाले, नर यौवन को

0

आचार्य जी की कविताओं में शोषण के प्रति चिंता तो है लेकिन वे निराश नहीं है। उनका आशावादी दृष्टिकोण उनकी कविताओं में साफ साफ नजर आता है –

0

संकल्पों की दीप्त प्रभा से सुखद सवेरा लाना है,

लेकर नयी उमंग, निराशाओं का तिमिर हटाना है।

0

गांवों की गरिमामयी संस्कृति और पावन संस्कारों का महत्व भी आचार्य जी की कविताओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, एक कविता में वे लिखते हैं –

पलक पांवड़े, जहां अतिथियों की

 खातिर बिछ जाते हैं,

नगरवासियों चलो तुम्हें,

 हम अपने गांव दिखाते हैं।

आचार्य जी को विरासत में मिले यही पावन संस्कार समाज के लिए प्रेरणा का विषय हो सकते हैं। जीवन में मातृ भक्ति का सिध्दांत उनके लिए सर्वोपरि था और इसकी झलक उनकी कविताओं में दिखाई देती है –

0

टूटी कुटिया के भीतर जब शीश झुकाकर मैं जाता हूं,

मां के ममतालू चरणों में, मंदिर जैसा सुख पाता हूं।

0

वर्ष 2001 में प्रकाशित राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक, और ग्रामीण परिवेश की 68 कविताओं के इस संग्रह में आचार्य जी की प्रेरक सोच वाली ऐसी काव्य रचनाएं शामिल हैं जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक हैं तभी तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और पाथेय के संस्थापक स्व. डा. राजकुमार सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि-  कवि आचार्य भगवत दुबे संस्कारधानी जबलपुर के ऐसे स्वनामधन्य साहित्य साधक हैं जिनके विविध वर्णी कृतित्व की यश सुरभि विंध्य -सतपुडा के शैल‌ शिखरों को लांघ कर भारत व्यापिनी हो गयी है।

आज हम सभी गौरवान्वित हैं कि। श्रद्धेय सुमित्र जी की इस बात से पूरा साहित्यिक क्षेत्र सहमत है।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१३ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१३ ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी की कृति पर विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक चर्चा

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों लंदन में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ साहित्य भूषण महाकवि आचार्य भगवत दुबे व्यक्तित्व एवं कृतित्व – संपादक डा . संध्या जैन ‘श्रुति’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ साहित्य भूषण महाकवि आचार्य भगवत दुबे व्यक्तित्व एवं कृतित्व – संपादक डा . संध्या जैन ‘श्रुति’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(एक साहित्यिक मूल्यांकन)

संस्कारधानी जबलपुर की उर्वरा साहित्यिक धरा पर जिस कालजयी प्रतिभा का उदय हुआ, वे हैं महाकवि आचार्य भागवत दुबे। एक ऐसा रचनाकार, जिसका संपूर्ण जीवन साहित्य की आराधना और लोक-मंगल के समर्पण में व्यतीत हुआ। यह व्यक्तित्व मात्र एक कवि का नहीं, अपितु उन मानवीय संवेदनाओं के संवाहक का है, जो शब्दों के माध्यम से समाज को नई दिशा और दृष्टि प्रदान करता है।

डा . संध्या जैन ‘श्रुति’

आचार्य दुबे का कृतित्व अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। हिंदी काव्य और गद्य की लगभग सभी विधाओं—गीत, नवगीत, दोहे, कुंडलियाँ, मुक्तक, गजल, बालगीत, हाइकू, कहानी और महाकाव्य—पर उनका समान अधिकार है।

पिछले कुछ दिनों पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रपति प्राप्त पुरस्कार शिक्षा विद डा. संध्या जैन श्रुति के कुशल और सफल संपादन में श्रद्धेय आचार्य जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर एक संग्रहणीय ग्रंथ का प्रकाशन किया गया। डा. संध्या जैन श्रुति एवं उनके संपादक मंडल के सुयोग्य सदस्यों श्री राजेश पाठक प्रवीण, डा.अभिजात कृष्ण त्रिपाठी, डा.डी .सी . जैन, श्री अशोक मनोध्या, डाअरुणा पांडेय, डा.श्याम मनोहर सिरोठिया, श्री मथुरा जैन उत्साही, श्री राजेन्द्र मिश्रा, श्री आशुतोष तिवारी, श्री सोहन परौहा सलिल, डा . अनिल कोरी, डा.मोहन तिवारी आनंद के महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं सराहनीय प्रयासों से 404 पृष्ठों का यह शोध परक ग्रंथ आचार्य जी की साहित्य साधना पर आधारित साहित्य जगत की एक स्मरणीय और संग्रहणीय प्रस्तुति सिद्ध होगी ऐसी मेरी ही नहीं बल्कि साहित्यिक क्षेत्र के सुधी पाठक वर्ग की सार्थक सोच है।

राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले आचार्य भगवंत दुबे जी ने गद्य और पद्य दोनों ही में काफी लिखा है काफी अच्छा लिखा है और उनकी अभी तक शताधिक कृतियां प्रकाशित भी हो चुकी हैं और चर्चित भी।

आचार्य जी की सशक्त लेखनी से उपजी प्रत्येक पंक्ति आज साक्षात् अनुभूति का प्रमाण है। ‘दधीचि’ जैसा महाकाव्य उनके गंभीर चिंतन, सूक्ष्म शोध और निरंतर साधना का प्रतिफल है, जिसने उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उनका साहित्य केवल बाह्य सृजन नहीं, अपितु अंतस की वह निस्पृह साधना है, जो प्रकृति के मोहक परिवेश और सामाजिक यथार्थ के बीच एक सेतु का कार्य करती है।

उनकी रचनाधर्मिता में राष्ट्रीय चेतना, मानवतावाद और लोक-सरोकारों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। वे बुंदेली जन-संस्कृति के वाहक हैं, जो लोक-भाषा की मिठास और भावों की गहराई को मानक हिंदी की गंभीरता के साथ पिरोने में सिद्धहस्त हैं। उनके साहित्य में व्याप्त ‘रस-शृंगार’ और ‘लोक-संवेदना’ का अनूठा मिश्रणu पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है। वे एक ऐसे ‘लोक-मंगल’ के कवि हैं, जिन्होंने जीवन के कटु सत्य और विसंगतियों पर प्रहार करते हुए भी सदैव मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा है।

आचार्य दुबे का साहित्य सृजन समय की वह उत्कृष्ट पहचान है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। उन्होंने केवल काल को शब्दों में नहीं बाँधा, बल्कि काल के प्रवाह में मानवता के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी किया है। यह कृतित्व उनकी उस विराट सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना निहित है। सरल, सौम्य और बहुभाषी व्यक्तित्व के धनी आचार्य जी का संपूर्ण जीवन ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का साक्षात उदाहरण है।

(चित्र – फेसबुक से साभार)

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१२ ☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

ज प्रस्तुत है श्री अखंड गहमरी जी द्वारा लिखित  “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१२ ☆

☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)

लेखक – अखंड गहमरी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ मुख्य विषय : यात्रा, प्रकृति, संस्कृति, लोकजीवन एवं मानवीय संवेदनाएँ– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह किताब यात्रा के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य का सजीव चित्रण, स्थानीय समाज और जीवन-मूल्यों का सजीव परिचय, अनुभव प्रधान एवं संवेदनशील रोचक पठनीय अभिव्यक्ति, यात्रा, संवेदना और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है।

प्रारंभिक पृष्ठों से ही यह किताब स्पष्ट संकेत देती है कि यह केवल पर्यटन-वृत्तांत नहीं, बल्कि अनुभवों, संस्कृतियों और मानवीय संवेदनाओं का संग्रह योग्य दस्तावेज़ है।  लेखक ने यात्रा को मनोरंजन या स्थल-दर्शन तक सीमित न मानकर जीवन को समझने का माध्यम माना है। अनुक्रम पर दृष्टि डालने से ही स्पष्ट होता है कि पुस्तक में विभिन्न स्थलों, प्रसंगों और अनुभवों को क्रमबद्ध रूप से स्वतंत्र अध्यायों में अभिव्यक्त किया गया है। यह संरचना पाठक को यात्रा के विविध आयामों से हिस तरह परिचित कराती है, मानो वह स्वयं सहयात्री है।

लेखक की दृष्टि केवल प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक स्थान के सांस्कृतिक परिवेश, वहाँ के लोगों के जीवन, उनकी परम्पराओं तथा मानवीय संबंधों को भी समान महत्त्व देती है। इसी कारण पुस्तक का स्वर केवल विवरणात्मक न होकर अनुभवात्मक और चिंतनपरक है। लेखक पाठक को यह अनुभव कराता है कि यात्रा का वास्तविक अर्थ बाहरी संसार को देखने के साथ-साथ उन संदर्भों में स्वयं के भीतर झाँकना भी है।

भाषा की दृष्टि से पुस्तक अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय शैली में लिखी हुई है। लेखक अनावश्यक शब्दाडम्बर से बचते हुए सरल शैली में अपने अनुभवों को व्यक्त करता है। वर्णन में दृश्यात्मकता इतनी प्रभावी है कि पाठक स्वयं को यात्रा का सहभागी अनुभव करने लगता है। प्रकृति, पर्वत, मार्ग, स्थानीय वातावरण और जनजीवन के चित्रण में गहमरी जी की संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है।

पुस्तक के स्पष्ट रूप से पठनीय अंशों में लेखक का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है— “यात्राएँ मनुष्य को केवल नए स्थानों से नहीं, नए अनुभवों से भी परिचित कराती हैं।” यह वाक्य सम्पूर्ण पुस्तक की मूल चेतना को अभिव्यक्त करता है। लेखक के अनुसार यात्रा का वास्तविक लाभ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि अनुभवों का विस्तार है। यही अनुभव व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं और उसे जीवन के विविध रूपों को समझने की क्षमता प्रदान करते हैं।

इसी तरह उनका उल्लेखनीय कथन है— “प्रकृति के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने भीतर की शांति को पहचानने लगता है।” इस विचार में लेखक की प्रकृति-दृष्टि निहित है। प्रकृति यहाँ केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का आधार बनकर उभरती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।

पुस्तक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक स्थानीय संस्कृति को बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग, उनकी जीवनशैली, व्यवहार, परम्पराएँ और सामाजिक मूल्य लेखक के वर्णन में स्वाभाविक रूप से समाहित होते हैं। इससे पुस्तक केवल स्थानों का परिचय देने वाली रचना नहीं रह जाती, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ग्रहण कर लेती है।

शिल्प की दृष्टि से पुस्तक वर्णनात्मक और संस्मरणात्मक शैली का सफल समन्वय प्रस्तुत करती है। घटनाओं का क्रम स्वाभाविक है तथा प्रत्येक प्रसंग अपने आप में पूर्ण प्रतीत होता है। भाषा में आत्मीय संवाद का गुण है, जिससे पाठक लेखक के अनुभवों से सहज रूप से जुड़ जाता है।

यह कृति यात्रा-साहित्य की उस राहुल सांस्कृतायायन परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें यात्रा केवल स्थानों का भ्रमण नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और जीवन-दृष्टि की खोज है। लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठक को यह विश्वास दिलाता है कि प्रत्येक यात्रा मनुष्य को कुछ नया सिखाती है और उसके व्यक्तित्व को समृद्ध बनाती है।

समग्रतः यह पुस्तक यात्रा, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का संतुलित एवं प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करती है। इसकी सरल भाषा, आत्मीय अभिव्यक्ति, अनुभवों की प्रामाणिकता तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण इसे एक पठनीय और संग्रहणीय कृति बनाते हैं। यात्रा-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक केवल जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि संवेदनात्मक अनुभवों की ऐसी यात्रा है जो पाठक को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के संसार से भी परिचित कराती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ काव्य कृति –  सपनों के गांव में – कविवर – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ काव्य कृति –  सपनों के गांव में – कविवर – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(कविवर श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ के जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित 🌹)

भाई श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ का काव्य संग्रह “सपनों के गांव में” इस समय मेरे सामने है इस संग्रह में संकलित सभी कविताओं की यह विशेषता है कि इन में कृत्रिमता नहीं है और ये सभी कविताएं बिना किसी लाग-लपेट के सीधी सरल भाषा में हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये कविताएं मेरे मन के आंगन में उतर गई हैं।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

श्री संतोष नेमा की यह खासियत है कि वे जितनी खूबी से ईश्वर के विभिन्न रूपों में आस्था अभिव्यक्त करते हैं उतने ही अधिकार से प्रकृति का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार उनकी सिद्ध हस्तता उनके लिखे उन गीतों में मिलती है जब वे मानवता और सद्भाव की बात करते हैं। उदाहरण के लिए उनकी लिखी कविताएं “सपनों के गांव में” तथा “मेरा गांव” ली जा सकती हैं। “सपनों के गांव” शीर्षक कविता में वे कहते हैं –

 नारी जहां पुजती हो, सच्चाई न बिकती हो,

 बने रहें सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

इसी कविता में वे आगे कहते हैं –

दिव्य स्वप्न आंखों में, झरते फूल बातों में,

जीवन के रसमय सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

ऐसा लगता है कि कवि का विश्वास सद्भावना की स्थापना में है। यह उचित भी है। जब भी कोई साहित्यकार स्वस्थ समाज की चर्चा करता है, वह ऐसे समाज की कल्पना करता है जहां सद्भावना हो।

यह वास्तविकता भी है। कोई भी समाज बिना सद्भाव के नहीं रह सकता। उनकी लिखी कविता “मेरा गांव”  में भी यही जरूरत सामने आती है, जब वे कहते हैं –

 सादा जीवन रीत निराली, सच्चाई की पीते प्याली

 रहता सदा यहां सद्भाव, सबसे सुन्दर मेरा गांव।

 भारत के गांवों की यह खासियत है। शहरों में व्याप्त कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर  ग्रामीण परिवेश का परिचय श्री संतोष नेमा कराते हैं जब वे यह कहते हैं –

 छल प्रपंच पाखंड ने घेरा,

 लोभ मोह का सघन अंधेरा

 मन से तृष्णा दूर भगाएं

 अन्तर्मन में ज्योति जलायें।

इस संग्रह में ऐसे विचारों की बहुलता है। कवि का जोर सदैव इस बात पर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति में सद्भाव जगाने की आवश्यकता है। वह मानवता का अग्रदूत बनता है। बिना सद्भाव और मानवता के समाज की कल्पना श्री संतोष नेमा नहीं करते हैं। यह इस संकलन की विशेषता है कि ग्राम्य परिवेश का सुन्दर वर्णन ईश्वर के विभिन्न रूपों और अवतारों के श्रद्धापूर्ण स्मरण के साथ मिलता है। हिन्दू आस्था इस संग्रह में जगह जगह मिलती है। भगवान राम, कृष्ण, दुर्गा की भक्ति की कविताएं हैं लेकिन कवि को अन्य संप्रदायों का ख्याल है। वह दूसरे मतों की चर्चा करते हुए इसके लिए राजनीति को दोषी ठहराता है।

यह सही भी है। हम राजनीति में इस तरह डूब गए हैं कि हमें अपने पास पड़ोस का ख्याल नहीं रहता।

कवि को हमारी इस कमजोरी का ध्यान है। वह कहते हैं-

 सियासत ने हमें बांटा कुछ कदर,

 हिन्दू हिन्द के,

मुसलमान पाकिस्तानी हो गए।

यह इस संकलन की विशेषता है। कवि का यद्यपि अडिग हिन्दू देवी देवताओं पंर विश्वास है और

इसे अभिव्यक्त करने में पीछे नहीं रहता लेकिन उसे अन्य संप्रदायों का भी ध्यान है। यह सर्व धर्म सद्भाव और हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप है। जिन मुसलमानों ने भारत में रहना स्वीकार किया और पाकिस्तान नहीं गए उन्हेंं पाकिस्तानी कहना ग़लत होगा।

इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भाषा और शैली। इसकी भाषा जहां सुबोध है, इसकी शैली बोधगम्य और अकृत्रिम है। कवि बिना किसी बहाने बाजी या लाग लपेट के अपनी भावना रखता है। शब्दाडंबर और अलंकारों का उपयोग कर कविता को बोझिल नहीं बनाया गया है। अमिधा गुणों की खूबसूरती इन कविताओं में है। “एक कहानी हो गये” कविता में जातिवाद पर प्रहार है। पर्यावरणीय वर्णन भी है। ग्रामीण परिवेश का परिचय भी मिलता है जैसा संकलन के नाम से प्रकट होता है।

 🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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