हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५९ – आत्मकथ्य – श्रेयस कृत काव्य कथा वीथिका की कविताएं : कविता में लघुकथा ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५९ ☆

☆ आत्मकथ्य ☆ ~ श्रेयस कृत काव्य कथा वीथिका की कविताएं : कविता में लघुकथा ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

कोविड अपने चरम पर था, उन दिनों मैं फेसबुक पर लगभग प्रतिदिन एक कविता लिखा करता था। इस पोस्ट का नाम मैंने काव्य कथा वीथिका ही रखा था। धीरे धीरे मेरी ऐसी कई रचनाएं बनकर तैयार हो गयीं। फिर मैंने इन रचनाओं को संकलित कर संकलित कर पुस्तक का स्वरूप दिया। यह पुस्तक काव्य कथा वीथिका थी। इस पुस्तक की कविताएं, सामान्य, सरल एवं आम जन के लिए आसानी से समझ में आने वाली थी। इन कविताओं की विशेषता यह थी कि मेरे जीवन में (पूर्व में और वर्तमान में) जो कुछ भी घटनाएं घटती या जो कुछ भी मैंने अपने आंखों से घटते हुए देखता, उनका आश्रय लेते हुए कुछ काल्पनिक पुट से उसे साहित्यिक ढंग में सजाते हुए कविता के रूप दे देता। इसके अतिरिक्त भी सामाजिक समताओ एवं विषमताओं पर आधारित मनोभावों को कविता का स्वरूप दे देता था। यह सब उपक्रम करते एवं कविता लिखते वक्त मुझे यह पता ही नहीं चला कि कब इन कविताओं में छोटी सी लघुकथाएँ समा गयीं। मैं तो इन्हें बस एक सरल, तुकबंदी वाली, अगेय कविता ही समझ रहा था।

खैर पुस्तक के प्रकाशन की अवधि नजदीक आयी तो मैंने इसकी पांडुलिपि को मॉरीशस में जन्मे, भारतीय मूल के हिंदी गद्य साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के पास पुस्तक भूमिका लिखने हेतु भेज दी।

अब प्रश्न उठता है कि काव्य की भूमिका एक गद्य लेखक कैसे लिख सकता है। इस विषय में क्या सोच सकता है, तो इस पर मेरा मानना यह है कि एक गद्य लेखक अवश्य ही गद्य लिखता है लेकिन वह एक पाठक भी होता है। उसके भीतर भी हृदय होता है तथा शब्दों के भाव और रस को समझने की क्षमता होती है। कविताएं जो मन को प्रमुदित करती है, उनको सुनने का चाव सबके अंदर होता है. 

जब इस सुप्रसिद्ध कथाकार ने मेरी कविताओं के अंदर एक लघुकथा को समाते हुए देखा तो उन्होंने अपनी भूमिका में निम्न पंक्ति डाल दीं –

काव्य कथा वीथिका – यह आपका निजी शीर्षक था, जिसे आपने धारा प्रवाह बनाकर अब तक अनेक रचनाओं का पाठकों को रसास्वादन करवा दिया है। विशेष कर आपबीती को आप आधार बना कर लिखते हैं जो किसी भी कोण से साहित्य होता है। मैंने शुरू में लिखा था आप अपनी ओर से एक विधा की नींव रख रहे हैं आज भी मैं अपनी इस बात पर कायम हूँ. “

प्रसिद्ध गीतकार स्व.श्री नीरज अवस्थी (लखीमपुर) के देख रेख में प्रकाशित इस पुस्तक की एक रचना आपके समक्ष रखता हूँ, जो कि निम्नवत है

☆ दादी की होली ☆

*

होली का त्योहार आज था, दादी घर पर न थी।

 अम्मा चाचा को दादी की, चिंता आज लगी थी। ।

 बुधिया काकी के घर में, चूल्हा नहीं जला क्यों।

 चिंता न हो दादी को, इसकी आज भला क्यों। ।

 ऐसे कैसे हो सकता था, हम सब पूआ खाएं।

 बुधिया काकी के घर के, बच्चे भूखे भूखे सोए। ।

 घर से आँटा घी लेकर के, दादी वही गई थी।

 मेरी दादी की होली, ऐसे आज मनी थी।।

मुझे बेशक अपनी कविताओं में लघुकथा नहीं समझ में आयी लेकिन श्री रामदेव तुरंत ने इन कविताओं में एक लघुकथा देखा था।

युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच उत्तर प्रदेश इकाई के तत्वावधान में दिनांक 28 -10 2023 को, कविता में लघुकथा विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन गूगल मीट के आभासी पटल पर किया गया l कार्यक्रम में श्री राम किशोर उपाध्याय जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच, श्री रामदेव धुरंधर मॉरीशस, डॉ0 नूतन पाण्डेय जी, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली रहीं l डॉ 0 अभय नाथ सिंह, प्राचार्य किसान स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय रकसा, रतसर बलिया, श्री चंद्रेश्वर प्रताप सिंह छ. ग., प्रवासी साहित्यकर डा. अनिता कपूर जी (अमेरिका) एवं डा. दीपक पाण्डेय जी सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली श्रीमती प्रमिला कानपुर डॉ मोहम्मद जावेद, श्री रामसनेही विश्वकर्मा ‘सजल’, डॉ श्री प्रकाश मिश्रा, श्री मृदुल कुमार सिंह ‘मृदुल’, श्री नरेंद्र सिंह सिसोदिया, श्री अमित कुमार गुप्ता नेश्री शकील अहमद (बिलासपुर छ. ग.), श्री रामराज भारती, श्री बृजेश यादव, श्री अतुल राय, श्री नंदकिशोर वर्मा जी आदि ने अपने वक्तव्य एवं विचार रखें।

इस विषय में एक प्रस्ताव युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच केंद्रीय इकाई के समक्ष भी रखा गया कि क्या इसे एक विधा का रूप में देख सकते हैं या नहीं।

“श्रेयस की काव्य कथा विथिका का कविताओं के माध्यम से छोटी-छोटी लघुकथाओं और घटनाओं का अवलोकन कराती है।

इनकी कविताओं में किसी लघु कथा के विभिन्न तत्व – पात्र, परिवेश, संघर्ष, समस्या घटनाक्रम और संदेश सभी समाहित है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ मिठलबरा की आत्मकथा – लेखक – गिरीश पंकज ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ मिठलबरा की आत्मकथा – लेखक – गिरीश पंकज ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

मिठलबरा की आत्मकथा

यशस्वी साहित्यकार पत्रकार गिरीश पंकज कृत वह उपन्यास जो पत्रकारिता की भीतरी दुनिया की पड़ताल करता है। वैचारिकी को उष्मा प्रदान करने वाली जबर्दस्त प्रस्तुति जो सहज हास्य में छिपे तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ मन पर अमिट छाप छोड़ जाएगी।

☆ विहंगम दृष्टिपात “मिठलबरा” पर – इन्दिरा किसलय ☆

“समकालीन हिन्दी पत्रकारिता का रेशा रेशा उधेड़ता हुआ सच का बेखौफ दस्तावेज है—मिठलबरा की आत्मकथा। जहाँ कटघरे में व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति है।

मिशन को कमीशन में तब्दील करते संपादक, पिन/पीत पत्रकारिता से लिपटे हुए पत्रकार, विज्ञप्तिजीवी नेता, चमचे, दिलजले, छपासपीड़ित, यूनियनबाज, शोषित-मातहत और छद्म बुद्धिजीवियों को बेनकाब करते हुए पंकज, पाठकों की धड़कन में समा जाते हैं।

धनबल और मिठलबरों की फौज के बीच मासूम सच बलि के बकरे सा लगता है।

उपभोक्तावादी पंक में आपादमस्तक डूबी महानगरीय पत्रकारिता का आतंक नैतिक चेतना को छटपटाने तक की इज़ाजत नहीं देता। चेहरा पाने की तलाश में बेचेहरा होते लोग पंकज के निशाने पर हैं। क्रान्तदर्शी उपन्यासकार की भूमिका में उन्होंने मुद्दतों से बेचैन वक्त को राहत प्रदान की है।

मिठलबरा-छत्तीसगढ़ी भाषा का शब्द है। यानी वो शख्स जो आदतन झूठ बोले और झूठ को चाशनी में डुबाकर बोले। सामने तो मुस्कुराए और आदमी के घूमते ही पीठ में छुरा घोंप दे।

प्रसंगवश सामिष गालियांऔर व्यावहारिक हिन्दी का आंचलिक रूप कथ्य को जीभ पर हरी मिर्च सा रख जाता है। पाठक पानी भी नहीं मांगता। आनुषंगिक प्रस्तुतियों की एक धारा कभी “जूली” तो कभी चाटुकार चुगलखोरों की रसीली बोली के माध्यम से बेसाख्ता गुदगुदाती हुई नग्न सत्य के कालकूट विष को पचाने की सामर्थ्य देती है। झोंक, खांटी, गरियाना, चुम्मू, भदभदाकर हँसना जैसे शब्द अँचल का रंग उड़ेलते हैं पाठकों पर।

काश “पंकज” उपन्यास को महज फंतासी न कहते। यह उपन्यास नहीं चलचित्र है। अखबारों की दुनिया में व्याप्त भ्रष्टाचार पर उनकी तड़प सतत अग्निवर्षा में तब्दील हो गई है। स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने उन काँच की दीवारों को कलम के हीरे से काटा है जो चीखों को उस पार जाने नहीं देतीं।

उपन्यास की परंपरा में बहुत संभव है श्रीलाल शुक्ल की “राग दरबारी”और हरिशंकर परसाई की “रानी नागफनी की कहानी स्मरण हो आए। पर मिठलबरा की आत्मकथा अनोखी तथा अपूर्व है। क्योंकि इसमें उपन्यासकार ने सच्चाई से द्रविड़ प्राणायाम नहीं करवाया है। ऐसे में उनका साहस ऐतिहासिक हो गया है। तथा स्तुत्य है इस मायने में कि उनके व्यक्तित्व और ईमानदारी के बीच किसी किस्म की पर्दादारी नहीं है।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आत्मकथ्य ☆ व्यंग्य संग्रह – ये इश्क़ नहीं आसाँ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है उनकी हाल ही में आये  व्यंग्य संग्रह – ये इश्क़ नहीं आसाँपर उनका आत्मकथ्य)

(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ कुंदन सिंह परिहार जी को उनकी १४वीं पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई।)

यह पुस्तक निम्न ऑनलाइन वेबसाइट्स पर उपलब्ध है :-

Amazon >> https://amzn.in/d/0gGPPQGq

Flipkart >> Ye Ishq Nahi Aasan / ये इश्क़ नहीं आसाँ: Buy Ye Ishq Nahi Aasan / ये इश्क़ नहीं आसाँ by Kundan Singh Parihar at Low Price in India | Flipkart.com

Notion Press >> Ye Ishq Nahi Aasan

Everand  >> ये इश्क़ नहीं आसाँ by कुन्दन सिंह परिहार (Ebook) – Read free for 30 days

Kobo  >> ये इश्क़ नहीं आसाँ eBook by कुन्दन सिंह परिहार – EPUB | Rakuten Kobo New Zealand

☆ आत्मकथ्य – ये इश्क़ नहीं आसाँ ☆ डॉ कुन्दन सिंह परिहार ☆

यह मेरा सातवां व्यंग्य-संकलन है। अब मेरे कथा-संग्रहों और व्यंग्य-संग्रहों की संख्या बराबर हो गयी, यानी दोनों ही 7-7 हो गये।  कुल पुस्तकों की संख्या 14 हो गयी। 13 पुस्तकों के प्रकाशन के बाद सोचा था कि अब शायद अगली पुस्तक जन्म नहीं लेगी, लेकिन सिद्ध हुआ कि लिखने और न लिखने पर लेखक का वश नहीं होता।

अब रचनाएं पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों को नहीं भेजता क्योंकि अब सारा सिस्टम पूर्व के सिस्टम से भिन्न हो गया है। अब साहित्यिक रचनाओं को पहले जैसा महत्व नहीं दिया जाता। अब  अक्सर लेखक को रचना के प्रकाशन की जानकारी भी नहीं  मिल पाती। इसलिए मेरे जैसे लेखकों के लिए फेसबुक अच्छा साधन है। रचना तुरन्त पाठकों के सामने आ जाती है और पाठकों की प्रतिक्रिया भी मिल जाती है, जो समाचार-पत्रों में नहीं होता। अधिकांश पत्रिकाएं अब अनियमित हैं। रचना के प्रकाशन की कोई समय-सीमा नहीं होती।

व्यंग्य-लेखन एक सामाजिक उपक्रम है। यदि व्यंग्य समाज के लिए नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। व्यंग्य व्यक्तिगत  शिकवा- शिकायत नहीं है, न ही वह मनोरंजन का साधन है। व्यंग्यकार अन्याय, अनीति के विरुद्ध समाज की पीड़ा को प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसीलिए परसाई जी ने लिखा कि व्यंग्य हंसने हंसाने की चीज़ नहीं है। मैं लिखता हूं क्योंकि मेरी संवेदना अभी जागृत है, क्योंकि मेरी दृष्टि में समाज में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान करता है और मुझे लिखने के लिए बाध्य करता है।

मेरे प्रकाशक, वर्जिन साहित्यपीठ के संचालक भाई ललित मिश्र को पुनः धन्यवाद देता हूं क्योंकि उनके सहयोग से ही मेरी लगभग सभी रचनाएं पुस्तक के रूप में आ सकी हैं। 1982 से 2018 तक के लगभग 36 वर्षों में अन्य प्रकाशकों के द्वारा मेरी 7 पुस्तकें प्रकाशित  हुईं, जबकि मिश्र जी ने 2019 से 2024 के 5 वर्षों में मेरी 6 पुस्तकें प्रकाशित  कीं। मेरे लिए यह बड़ी राहत की बात रही। मिश्र जी के साफ-सुथरे व्यवहार के कारण मुझे  इस दौर में कभी परेशानी नहीं हुई। पूर्व में पुस्तकों के प्रकाशन में  विलंब का मूल कारण यह रहा कि मैं संपर्क बनाने और दौड़-भाग करने में हमेशा कमज़ोर रहा। संयोग से ही मिश्र जी से परिचय हुआ, जो मेरे लिए संकटमोचक बना।

पुणे से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ब्लॉग संचालित करने वाले भाई हेमंत बावनकर का भी मैं ऋणी हूं। वे प्रति रविवार को मेरा एक लेख प्रकाशित करते हैं। अभी तक वे मेरे 300 से अधिक लेखों को पाठकों के सम्मुख ला चुके हैं। वे भी बहुत भले व्यक्ति हैं।  उन्हीं ने मेरा परिचय ललित मिश्र जी से कराया।

रायपुर से प्रकाशित अखबार ‘चैनल इंडिया’ के साहित्य संपादक श्री स्वराज करुण ने मेरी 70 से अधिक रचनाएं प्रकाशित कीं, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं। वे भी बहुत सज्जन व्यक्ति हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०९ ☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ द्वारा सम्पादित  “प्रबोध-बोध पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०९ ☆

☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक – प्रबोध-बोध (प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित)

संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर ‘

प्रकाशक – साहित्यागार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

प्रबोध जी पर विभिन्न एंगल से साहित्यिक सामाजिक शोध बोध – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

( इन दिनों लंदन से)

किसी लेखक पर लिखी गई पुस्तक तभी सार्थक बनती है जब वह केवल व्यक्ति का परिचय न दे, बल्कि उसके रचना संसार के भीतर छिपे उस जीवंत मनुष्य को भी सामने लाए जो अपने समय, समाज और संवेदनाओं से निरंतर संवाद करता है।

लेखक को समझने के लिए उसके परिवेश , का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है, इसीलिए रचना के साथ फुटनोट में सूक्ष्म लेखक परिचय प्रकाशित किया जाता है। पाठक और लेखक के बीच दूरी मिटाती यह पुस्तक स्वागतेय साहित्यबोध है।

प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित पुस्तक प्रबोध बोध इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज के रूप में अब पाठकों के साथ है।

यह पुस्तक प्रबोध जी के बहाने से उस रचनात्मक चेतना की पड़ताल है जिसने दशकों तक हिंदी साहित्य को अपनी विशिष्ट दृष्टि, वैचारिक निर्भीकता और मानवीय सरोकारों से समृद्ध किया है।समय के साथ लेखक के चश्मे के नम्बर , उनके फ्रेम परिस्थितियों की पृष्ठ भूमि बदलती रहती है, किंतु उसके लेखकीय लक्ष्य , उसका दृष्टिकोण उम्र की परिपक्वता के साथ विकसित होता  चलता है।

इस पुस्तक का आकर्षक पक्ष यह है कि इसमें प्रबोध कुमार गोविल को केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं देखा गया है। उनके भीतर के मनुष्य, चिंतक, समाज दृष्टा और संवेदनशील रचनाकार को समान महत्त्व दिया गया है।

 पुस्तक पढ़ते हुए यह अनुभव बार बार होता है कि साहित्य अंततः जीवन से ही जन्म लेता है और जीवन के विविध रंग ही किसी लेखक की रचनाओं में रूपांतरित होकर पाठक तक किताबों और स्फुट रचनाओं के माध्यम से पहुंचते हैं , यही लेखकीय यात्रा का जीवन संदेश बन जाता है।

प्रबोध कुमार गोविल का साहित्य अपने समय की धड़कनों को दर्ज करता है। उनके पात्र केवल कथा को आगे बढ़ाने वाले माध्यम नहीं हैं। वे समाज के भीतर छिपे प्रश्नों, अंतर्विरोधों, इच्छाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। पुस्तक इस तथ्य को अनेक दृष्टियों से प्रमाणित करती है। उनके लेखन में महानगरीय अकेलापन भी है। बदलते सामाजिक मूल्य भी हैं। संबंधों की जटिलताएँ भी हैं। मनुष्य की आंतरिक बेचैनियाँ भी हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य,  पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता बल्कि उसे वैचारिक मंथन के लिए भी बाध्य करता है।

इस पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह लेखक की रचनात्मक यात्रा को उसके सामाजिक संदर्भों से जोड़कर देखती है। आज जब साहित्य को अक्सर केवल पाठ या विचार के रूप में पढ़ा जाता है, तब यह पुस्तक स्मरण कराती है कि हर रचना के पीछे एक जीवित अनुभव संसार होता है। प्रबोध कुमार गोविल ने जीवन को बहुत निकट से देखा है। समाज के विविध वर्गों, परिस्थितियों और मानवीय मनोदशाओं को समझा है। यही अनुभव उनकी रचनाओं को विश्वसनीय बनाते हैं।

पुस्तक में उनके व्यक्तित्व के जिन आयामों का उल्लेख किया गया है, वे भी कम रोचक नहीं हैं। सहजता, विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवीय आत्मीयता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरती हैं। यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान खींचता है कि उनकी रचनात्मकता केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं है। उसके पीछे मनुष्य और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में विचार और संवेदना साथ साथ चलते हैं।

प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य की चर्चा करते हुए पुस्तक के आलेख उनके कथा साहित्य, उपन्यासों, कविताओं तथा बाल साहित्य की ओर संकेत करती है। इससे उनके बहुआयामी रचनाकार होने का परिचय मिलता है। वे किसी एक विधा तक सीमित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनात्मक ऊर्जा अनेक साहित्यिक रूपों में व्यक्त हुई है। यह विस्तार उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की शक्ति को रेखांकित करता है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी भाषा और शिल्प पर किया गया विमर्श भी है। उनकी भाषा सरल है, पर साधारण नहीं। उसमें जीवन की सहजता है। संवाद की ऊष्मा है। विचार की स्पष्टता है। यही कारण है कि उनका साहित्य विद्वानों के साथ साथ सामान्य पाठकों तक भी पहुँचता है। साहित्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह पाठक के मन में उतर सके और उसके अनुभव का हिस्सा बन जाए।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह भी महसूस होता है कि लेखक के मूल्यांकन का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता। उसका वास्तविक उद्देश्य उसके साहित्यिक अवदान को समझना और समझाना होता है। प्रबोध बोध इस कसौटी पर खरी उतरती दिखाई देती है। यह पुस्तक प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का अवसर प्रदान करती है। साथ ही यह बताती है कि किसी लेखक की वास्तविक पहचान उसके पुरस्कारों से नहीं, उसकी रचनाओं की जीवंतता और समय से संवाद करने की क्षमता से निर्मित होती है।

समग्र रूप से देखा जाए तो प्रबोध बोध एक ऐसी पुस्तक है जो व्यक्ति और कृतित्व के बीच सेतु का काम करती है। यह पाठक को लेखक के निकट ले जाती है। उसके साहित्य को नए सिरे से पढ़ने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह विश्वास भी जगाती है कि सच्चा साहित्य समय के साथ पुराना नहीं होता। वह हर युग में नए अर्थों के साथ पाठकों के सामने उपस्थित होता रहता है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता भी है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆ तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह) – कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ समीक्षा – डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा  – “तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆

✍ पुस्तक समीक्षा – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

पुस्तक का नाम – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)

कवि – महेन्द्र वर्मा

प्रकाशक – आस्था प्रकाशन गृह, जालंधर-नई दिल्ली-कनाडा

संस्करण – 2026

मूल्य – 325 रु.

सार्त्र ने कहा था – “सब कुछ गुजर जाता है। आंधी, तूफान, सुनामी, सब आते हैं, रुकते नहीं, थमते नहीं, पतझड़ में रंग-बिरंगे पत्ते, अपनी शाख से, आज़ादी पा, मंडराते हैं, खिलखिलाते हैं और फिर बिखर जाते हैं ज़मीं पर”…  किसी काव्य-संग्रह में सार्त्र का नाम होना ही कवि की उच्चता दर्शाता है, क्योकि ज्याँ पॉल सार्त्र बीसवीं सदी के सुविख्यात फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता को बनाए रखते हुए नोबेल पुरस्कार भी लेने से इंकार कर दिया था।

विदेश में विदेशी भाषा के माध्यम से हिंदी पढ़ाने वाले महेन्द्र वर्मा जी जैसा व्यक्तित्व जब कविता रचेगा तो उसमें अपने उत्स और विदेश की धरती पर अपनों परायों के बीच जीवन जीना कितना अनुभूत, कितना परानुभूत होगा, यह उनकी कविताओं से थोड़ा सा परिलक्षित होता है, थोड़ा सा इसलिए कि अपनी भाषा की सुगंध को विदेशी भाषा की सुगंध में अवगुंठित करना और अपनी मांटी की सौंध से सात समुंदर पार की धरती तक के वितान पर अनुभवों की रेखा खींच पाना एक काव्य-संग्रह में संभव नहीं है, परंतु सात समुंदर पार भी अपनी मांटी की सौंध को अपने में बसाये रखने वाले महेन्द्र वर्मा जैसे व्यक्तित्व की एक ही कविता ऐसी हो सकती है कि पाठक उसे पढ़कर बरसों प्रभावित रह सकता है।

महेन्द्र वर्मा की अपनी पहली कविता, “क्या खोया, क्या पाया”, में ही बयान कर देते हैं-

अक्तूबर का दिन था

खुशनुमा दिन

जब आया था न्योता

सात समंदर पार

यू.के. से

एक नहीं

दो-दो

यॉर्क और मेनचेस्टर से।

करना है

मजबूत-प्रवास में

हिंदी की नींव को

यॉर्क ने,

दूर से दी थी आवाज।“

 

इस कविता में ही उन्होंने अपनी यात्रा का ऐसा वर्णन कर दिया है कि पाठक पढ़कर सोचता रह जाता है। आगे पढने के लिए उसे हिम्मत जुटानी पड़ती है। आगे वर्मा जी सोचें लेकिन उनकी यात्रा हिंदी से ही पूरी होती है, जो उनका बहुत बड़ा संबल भी बनती है। इसी कव्ता में आगेलिखते हैं-

“प्रवासी को

हाथ बढ़ा कर

दे दिया

हिंदी ने

इतना कुछ,

विधि में

मिलता नहीं

सदा

सब कुछ।

कुछ खोया, कुछ पाया।“

 

लेकिन विरासत उन्हें कुछ भूलने नहीं देती। दूसरी कविता “विरासत” में वे कह उठते हैं-

 

 “है संबंध अनूठा

मानवता औ विरासत का,

है एक विशाल कोश

वेदों औ पुराणों में

विरासत का

करता है प्रदान जो

मानवता को अंतर्दृष्टि।

……

मिला दर्शन

वसुधैव कुटुंबकम्

सर्वे भवंतु सुखिना

औ’

ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत

का भी।”

 

विदेश में रहते वे रामायण, गीता, मानस, तमिल कंब रामायण, मलयालम अध्यातम रामायणम्, नानक, गौतम और महावीर के साथ-साथ शंकर और चार्वाक किसी को नहीं भूलते।

 

महेन्द्र वर्मा जी का काव्य कौशल उस समय ऊंचाइयों की पराकाष्ठा पर होता है जब वे “पतझड़” को एक नया सकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हैं, जो किसी कवि ने नहीं दिया। वे लिखते हैं-

 

“पतझड़ है यह तो

ज़मीं पर बिखरी पत्तियाँ

सूरज की

सुनहली रोशनी में

चमकती-दमकती

इठला रही हैं,

मुक्ति मिली है

आज”

 

अंग्रेजी कवि कीट्स की कविता को उन्होंने आगे बढ़ाया है। इसी कविता में आगे लिखते हैं—

 

“और मिला है

वह अंतिम सुख

जब बटोर- बटोर कर

माली ने

किया

उनका अंतिम संस्कार।”

 

प्रकृति का अवलोकन ही नहीं अवीक्षण भी उनका अभूतपूर्व है। “कली बोली” कविता उऩकी दृष्टि देखिए—

“कली बोली-

मैं अधखिली रह गयी,

था मेरे

यौवन का क्षण, वह

तुषारापात कर दिया

अचानक

जब तुमने।”

 

और वे “गुलमोहर” से पूछ बैठते हैं—

 

“गुलमोहर से पूछो

खुल कर, खिलखिला कर बोलेगा,

पतझड़ आया तो क्या

चला गया

हर वर्ष

जाड़ा भी आकर।”

 

ऐसा कोई कवि नहीं हुआ, जिसने येन-केन-प्रकारेण सृष्टि पर कुछ न लिखा हो। प्रकृति और सृष्टि कवियों के चहेते विषय हैं, तो वर्मा जी पीछे कैसे रहते, “सृष्टि” कविता में लिखते हैं—

 

“सृष्टि का भी तो

अजीबो-ग़रीब

रंगो-रिवाज़ है।

सुनामी आती तो है

पर

दस्तक देकर ,

चली भी जाती।”

 

उनकी कल्पना शक्ति “सुगंध” नामक कविता में तो देखते ही बनती है। अमूर्त को मूर्त कैसे बनाया जाता है उसकी बानगी इस कविता में है—

 

“निःशब्द हो

तुम सुगंध,

पर निष्प्राण नहीं।

धार्मिक अनुष्ठानों में

मंदिर हो या मस्जिद

कहाँ नहीं मिलती हो तुम

 ….

सुगंध, तेरी है विचित्र कहानी

पवन का दामन छोड़

पहुँच जाती हो

जब अंतरिक्ष में

फैलादेती हो ऐसा

अपना सुवास, अपना सौरभ

बतला नहीं पाती,

रह जाती है

नाकाम

अंतरिक्ष निर्वात में

नाक हमारी।”

 

सड़कों के किनारे वृक्ष लगाए जाते हैं और वे ऊंचे होकर सड़क को ढंकते हुए मिल जाते हैं। ऐसा मैंने देखा है। आपने भी देखा होगा। और महेन्द्र वर्मा ने भी देखा, लेकिन कैसे, उनकी कविता “आमने-सामने” में देखिए—

 

“रख दिया तुमने मुझे

अपनों से दूर

जमा दिया सड़क के

इस पार- उस पार

आमने-सामने

,………

प्यार का नशा हो जाए

तो लगती हैं खिसकने

दूरियाँ।

उम्र बढ़ती गयी

और हम पास आते गए

आलिंगन होने लगा

फुनगियाँ, फुनगियों से मिलती रहीं

हमारी दूरियाँ फिसलती गयीं।”

 

सृष्टि, प्रकृति पर ही उनकी निगाह नहीं गई, अपितु विज्ञान पर गहरी नजर गई और वैज्ञानिकों को सुनाया भी। उनकी “विज्ञान और वैज्ञानिक” कविता में है—

 

“विज्ञान नहीं, वैज्ञानिकों,

कर डाला तुमने

क्या

विज्ञान का।

……

पैदा कर दी है

वैमनस्यता कैसी

भेद डाल

मित्रता में

विज्ञान औ प्रकृति की।

….

रख दिया ताक पर

सृष्टि के मूल्यों को

मत दो विध्वंस का नुस्खा,

दे दो संजीवनी की औषधि।”

 

इंतज़ार पर उन्होंने तीन कविताएँ लिखी हैं। तीनों हृदयस्पर्शी हैं। लेकिन एक “इंतजार-2” मेरे दिल को भेद गई, आंसू ढल आए। आप भी देखिए—

 

“व्यग्रता से था

माँ को इंतज़ार

बेटा आएगा

लौट कर युद्ध से।

आया तो अवश्य

पर, अंतिम संस्कार के लिए।”

 

इंतज़ार 1 और 3 भी बहुत गंभीर रचनाएँ हैं। वर्मा जी लिखते हैं तो कविता लेकिन दर्शन उनकी हर बात में रहता है। वास्तव में वे एक भाषावैज्ञानिक कवि ही नहीं अपितु दार्शनिक कवि हैं। उनकी प्रतीक्षा नामक कविता में ऐसे दिखता है—

 

“करूँ प्रतीक्षा किस की

कब तक

..

उस मौसम की

जो कभी न आया।

प्रतीक्षा में नींद आने की

रात को थाम लेता हूँ,

रात आती तो है

पर फटकने देती नहीं,

नींद को पास

और हो जाती है सुबह।”

 

ऐसे ही प्रतीक्षा की घड़ी कविता में लिखते हैं—

“खिसकती जा रही है

प्रतीक्षा की घड़ी

सूइयाँ फिर भी

थकती नहीं

अनवरत चलती जा रही हैं,

घूम-घूम कर

मोक्ष का दामन पकड़े

मुक्ति की आशा

रख रही है-

ज़िंदा उन्हें।”

 

उन्होंने खूब लिखा है। पर माँ को नहीं भूलते—

 

“माँ बैठी है, चुपचाप

आँखें हो गयी हैं

पथरायी-सी

बाट जोहते-जोहते

उसकी

जो कभी न लौटा,

लौटा भी तो तब

जब बंद हो चुकीं थीं

माँ की आँखें।”

 

मुक्ति कविता में वर्मा जी लिखते हैं—

 

“ईश्वर ने

मानव से पूछा-

मुक्ति मेरी

कब आएगी

उत्तर आया-

जब मेरी होगी।”

 

आगे पाठक स्वयं पढ कर देखेंगे कि और क्या उत्तर आता है। “ऐसे ही लोगे कब तक परीक्षा,” “कब तक रहोगा उदास”, “जी करता है” उऩकी बहुत मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं। उनका प्रवासी मन मसोस उठता है।

 

“जी करता है

कुछ बोलूँ,

क्या बोलूँ

किस से बोलूँ

कैसे बोलूँ

बतियाऊँ भी तो

किस भाषा में”

 

अकेलापन तो वे बड़े नज़दीक से महसूस करते हैं। लिखते हैं—

 

“खड़ा हूँ

अब अकेला अंतिम पड़ाव पर।

दिखते बहुत हैं लोग

मुड़कर देखता कोई नहीं।

कैसा है अकेलापन यह।”

 

वर्मा जी विदेश में रहते हैं, पर संस्कारों का पूरा ध्यान रखते हैं और संस्कार पर कविता लिखना नहीं भूलते, लिखते हैं-

“तुम्हारे संस्कार, औ’ मेरे संस्कार

क्या दोनों का सामंजस्य

नहीं हो सकता .

जीवन का अर्थ क्या है.

जीने का मतलब क्या है.

जीवन एक जैसा नहीं रहता हमेशा,

नहीं रहते संदर्भ और मूल्य एक जैसे।”

 

मानव मन के अध्येता के रूप में वर्मा जी तब उभर कर आते हैं जब घृणा पर कविता लिखते हैं। घृणा पर शायद ही किसी ने ऐसी कविता लिखी हो, विदेश में नस्ल भेद और घृणा को उन्होंने स्वयं भोगा है शायद। दृष्टव्य है—

“घृणा करना कितना

घिनौना होता है

इंसान जब इंसानियत

भूल बैठता है

नस्ल के नशे में

……

नस्ल, धर्म, जाति, पंथ, रंग

के नाम पर

घिनौनी हरकतें

जब कभी भी

दूसरों का रंग

उसे लगता है बदरंग। ”

 

वे व्यक्ति को सचेत भी करते हैं कि—

 

“दीप

दीप तो

कभी न कभी

सारे बुझेंगे ।

सोच कर यह

हो जाना

अकर्मण्य

विपरीत है

धर्म के।”

 

वे शब्दों के चितेरे हैं, तभी तो शब्द पर तीन कविताएं लिखी हैं। शब्दों की शक्ति में लिखते हैं—

 

“शब्दों में समाहित है

संगीत की शक्ति,

होती है शब्दों में

कोलाहल को भेदने की शक्ति,

शब्दों में शक्ति होती है

ममता औ’ मनुहार करने की,

लड़ने औ लड़ मरने की भी।”

 

महेन्द्र वर्मा जी एक दार्शनिक कवि हैं। उनकी हर कविता में दर्शन झलकता है। जैसे “नाम” शीर्षक वाली कविता में लिखते हैं—

 

“सोचता हूँ कभी-कभी

क्या धरा है मात्र नाम में.

 सोचता हूँ फिर,

हुआ होगा

सृष्टि में

कभी क्या

बिना नाम के संबोधित

कोई कभी.”

 

ऐसे ही उत्सव की परिभाषा में –

 

“होता है, मुक्ति का उत्सव

त्यागने पर अपना शरीर।

उत्सव, उत्सव हो सकता है

सारा जीवन ही उत्सव।”

 

“बेसलन, रूस” कविता में वे आतंकवादियों को ललकारते हैं—

 

“कितने बच्चे थे

मासूम

नन्हें-नन्हें

नए जीवन की

करने शुरुआत,

……

जब किया प्रहार

निर्दयी आतंकवादी

तुमने।“

 

फिर “मौत” कविता में जज़्बाती भी हो जाते हैं—

 

“जब भी आती है

मौत

कभी दस्तक

देती नहीं।“

 

अपने देश से दूसरे देश में बसने वाले या प्रवास करने वाले प्रवासियों की पीड़ा को वर्मा जी से अच्छा कौन

बता सकता है, “प्रवासी की पीड़ा” में देखिए—

 

“समझ गया मैं।

देसी कभी

नहीं समझोगे मुझको.

रंग भेद है

जाति भेद है

नस्ल भेद है

…..

करा दिया

स्वीकार तुम्हीं ने,

अंश नहीं

बन सकता

तेरी धरती का मैं।

 

वर्मा जी भाषाविज्ञानी तो हीं ही, विदेश में पढाया भी है। लेकिन भाषा और मातृभाषा को काव्य में भी नहीं भूलते, जैसे, “आप्रवासी की मातृभाषा” में देखिए—

 

“पहचानो, समझो मुझको।

अंग्रेजी नहीं जानतीं

पर, नहीं हूँ बिन भाषा के मैं ।

मेरी माँ की भाषा

भी सशक्त थी जब,

शिक्षा द्वार पहुँचते ही

दुत्कारा मेरी भाषा को

तुमने।”

 

भाषा के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों और स्वार्थलिप्सा में बंधे विद्वानों को भी नहीं छोड़ते, “भाषा हितैषी” कविता में लिखते हैं—

 

“और तुम

बहुत व्यस्त रहे तुम,

भाषाकर्मी बन

शोध जगत में।

….

बहुत कर लिए

शोध तुम ने।

शोधक भी हो गए

और संशोधक भी।

…..

दिखता नहीं तुम्हें क्या

होती जा रही है लुप्त

मेरी अपनी भाषा।

बनी रहेगा पीड़ा उसकी

पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक।

…..

मेरी पीड़ा है साक्षी

उस भाषाई भेदभाव की।

डिगा दिया है जिसने

संस्कृति की वह नींव हमारी।”

 

“मम्मी-डैडी” कविता में हिंदी-अंग्रेजी ध्वनियों की बात करते हैं तो “पनप न पाएगी” कविता में कहते हैं—

 

“कर लो कितनी भी कोशिश

पनप न पाएगी

इस धरती पर,

तेरी, उनकी भाषाएँ।”

 

इसके भी आगे “मेरी भाषा-तेरी भाषा” कविता में लिखते हैं—

 

“तेरी भाषा

मेरी भाषा

भाषा तो भाषा ही है

जैसी तेरी

वैसी मेरी।”

 

महेन्द्र वर्मा प्रवासी तो रहे पर जहाँ रहे वहाँ प्रकृति के बनके रहे, जैसे “ट्यूलिप के फूल” कविता में—

 

“आता है वसंत

औ’ निकल पड़ते तुम

गर्भ से ज़मीं के,

सुर्ख लाल,पीले

रंग-बिरंगे।

चंद दिनों का तुम्हारा जीवन

मुर्झाने लगता है,

मानकर

नियति के नियम को

हो जाते हो

धीरे-धीरे लुप्त

स्वीकार कर

आने-जाने के दर्शन को।”

 

“यूस्टन स्टेशन” का दर्शन वे कुछ इस तरह कराते हैं—

 

“भाग रहे हैं

भाग रहे हैं

सब के सब

बस दौड़ रहे हैं,

यह जाना पहचाना

यूस्टन का स्टेशन।”

 

“तुम, न आए लौट कर” कविता में उनका गहन सोच, दर्शन बहुत सुंदर ढंगे से प्रस्फुटित होता है—

 

“तुम न आए लैट कर

सृष्टिकर्ता,

रच तो दिया

इस अद्भुत सृष्टि को,

पर न आए लौट कर।”

“तुम, न आए लौटकर” काव्य संग्रह में कुल अस्सी कविताएँ हैं। हर कविता एक से बढकर एक, चयन करना मुश्किल, क्योंकि महेन्द्र वर्मा जी का शब्दों और अर्थों पर पूरा अधिकार है। काव्य संग्रह पढ़कर ही सुधी पाठक उसका आनंद उठा पाएंगे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०८ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” – लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

(१४ जून को लोकार्पित)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०८ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक:सुरेश पटवा

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

 मुखौटे उतारती एक बेबाक कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज के भीतर झाँकने की एक पैनी दृष्टि है।

मैं प्रायः कहता रहा हूं कि व्यंग्यकार को गन्ने का शुगर फ्री रस निकाल कर प्रस्तुत करना आना चाहिए । वह खुद समाज से भिन्न नहीं होता । उसे समाज में रहते हुए उसकी मरम्मत का जिम्मा उठाना पड़ता है। मां की भांति दुलारते पुचकारते हुए समाज सुधार करना व्यंग्य का नैतिक कार्य है।

“व्यंग्य  स्वतंत्र विधा से पहले, एक ‘स्पिरिट’ है जो कहीं भी समाहित हो सकती है।

इन तथ्यों के साथ ” सुरेश पटवा की कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ का मूल्यांकन करना  प्रासंगिक हो जाता है। पटवा एक बहुविध रचनाकार हैं, जिनकी भाषा में सहजता, शैली में चुटीलापन और दृष्टि में जन-सरोकारों की स्पष्टता है।

 एक सजग लेखक का सामाजिक आईना

‘व्यंग्य पच्चीसी’ अपने शीर्षक के अनुरूप पच्चीस विविध व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है। यह पुस्तक न केवल पाठक का मनोरंजन करती है, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए बाध्य भी करती है। लेखक का व्यंग्य उपहास नहीं, बल्कि यथार्थ का ‘अनावरण’ है। वे व्यक्ति पर प्रहार करने के बजाय समाज में व्याप्त कुत्सित प्रवृत्तियों, सत्ता के छल-प्रपंच, बौद्धिक पाखंड, और बाजारवाद की विडंबनाओं को बेनकाब करते हैं।

पटवा जी की लेखन प्रक्रिया स्वयं में एक प्रयोग है। वे जिस कृति पर काम करते हैं, उसके प्रतिदिन के लेखन को सार्वजनिक कर बौद्धिक पाठकों के साथ  सतत संवाद स्थापित करते हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और चुटीली है। इस संग्रह की प्रमुख शिल्पगत विशेषता , बुंदेली के स्थानीय प्रयोग, सटीक मुहावरे और ‘आइटम संत’ जैसे स्वनिर्मित शब्दों का  जीवंत प्रयोग है।

 व्यंग्य लेखों में शिल्पगत विविधता है ।।व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग, रूपकों एवं फैंटेसी के माध्यम से व्यंग्य को धारदार बनाया गया है।

 अभिव्यक्ति में कटाक्ष और शिष्टता का संतुलन है। तीखे प्रहारों के बावजूद भाषा मर्यादित है। व्यक्तिगत आक्षेप या किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध फूहड़ता नहीं है, जो लेखक की परिपक्वता को दर्शाता है। वैचारिक धरातल पर

यह संग्रह समकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करता है। ‘मोबाइल व्यथा कथा’ और ‘फ़ेस्बुकिया करनी-भरनी’ आज के डिजिटल दौर की विसंगतियों पर  कटाक्ष हैं।

‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ जैसे व्यंग्य लेखों में पुरस्कार-लोलुपता और साहित्यिक परिवेश की विडंबनाओं का यथार्थ चित्रण है।

प्रशासनिक विडंबनाएं उजागर करते व्यंग्य  ‘छिद्दी का बकरी लोन’, ‘भ्रष्टाचार का बुल्डोजर’ और ‘ओम बजटाय नमः’ आदि रचनाएँ सत्ता और दफ्तरों की नौकरशाही मानसिकता पर चोट करती हैं। ‘सभ्य जंगल की सैर’ आधुनिकता और प्रकृति-विमुखता के अंतर्विरोधों को बखूबी रेखांकित करती है।

 

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पारंपरिक व्यंग्य-परंपरा का विस्तार है, जिसमें व्यंग्य के ट्रायपॉड परसाई , जोशी और त्यागी जैसे पुरोधाओं की वैचारिक परंपरा की गूँज तो है, किंतु शैली पूर्णतः मौलिक और समकालीन है।

यद्यपि कहीं-कहीं लेखक की विद्वत्ता व्यंग्य की संक्षिप्तता को  प्रभावित करती है, तथापि यह पुस्तक समकालीन व्यंग्य का एक  दस्तावेज़ है।

यह संग्रह सामान्य पाठक के लिए रोचक, चिंतनशील पाठक के लिए गंभीर और नए लेखकों के लिए व्यंग्य की समझ को लेकर एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में  सक्षम है। सुरेश जी की यह कृति सिद्ध करती है कि आज व्यंग्य विधा समाज की चेतना को झकझोरने का  सशक्त माध्यम है।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त)

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८ – पुस्तक समीक्षा – लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन  ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री सुमति कुमार जैन जी द्वारा संपादित पुस्तक – “लघु की विराटताकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक- लघु की विराटता

संपादक-  सुमति कुमार जैन

प्रकाशक- दीपज्योति ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन, महावीर मार्ग, अलवर- 301001 (राज) मोबाइल नंबर 94148 93120

पृष्ठ संख्या- 444

मूल्य- 500

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ लघु की विराटता को दर्शाती पुस्तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

लघु में कथा समेटे हो वह लघुकथा होती है। इसमें निदान होता है। समस्या के समाधान से दूर रहती है। बस ! अपने में एक तीक्ष्णता और व्यंग्यता को समाए रखती है। प्रारंभ में इसे लघु कथा कहा जाता था। इस मायने में भारतेंदु हरिश्चंद्र को लघुकथा का जनक माना जाता है। इन्होंने इसी पैमाने पर खरी उतरने वाली लघुकथाएं लिखी थी।

इसके पश्चात कई रचनाकारों ने इसे पुष्पित व पल्लवित किया है। इसमें मुख्य रूप से प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, वजाहत, जगदीश कश्यप, विष्णु नागर, यशपाल, चंद्रभान शर्मा गुलेरी, राजेंद्र यादव, काशीनाथ सिंह, हरिशंकर परसाई, सतीशराज पुष्करणा सहित अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने इसे विकसित व स्थापित किया है।

वहीं वर्तमान में अनेक रचनाकार इसे गति प्रदान कर रहे हैं। ये नवोदित रचनाकारों को प्रशिक्षित करते हुए अपने रचनाकर्म में भी लिप्त हैं। इनमें मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, रूप देवगुण, राजकुमार निजात, अनिल शूर आजाद, रामकुमार घोटड़, मधुकांत, अशोक भाटिया, अशोक जैन, बलराम, सतीश दुबे  सुभाष नीरव, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा, माधव नागदा, संतोष सुपेकर, कांताराय, चंद्रेश कुमार छतलानी आदि अनेक नामों को प्रमुखता से लिया जा सकता है।

लघुकथा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं और संकलनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रस्तुत समीक्ष्य लघुकथा संकलन- लघुकथा की विराटता, उसी परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। इसका संपादन- जगमग दीप ज्योति, मासिक पत्रिका के संपादक सुमति कुमार जैन ने किया है। जो अनेक वर्षों से संपादनकर्म में संलग्न है।

प्रस्तुत संकलन में लघुकथा की विराटता को रचनाओं की गुणवत्ता में समेटने का प्रयास किया गया हैं। इसमें अनेक लघुकथाएं प्रतिष्ठित रचनाकारों की सम्मिलित की गई है। लघुकथा के चमकते नामों में से प्रमुख- कमल चोपड़ा, माधव नागदा, मधुकांत, पूरणसिंह,  प्रबोधकुमार गोविल, राजकुमार निजात, रामकुमार घोटड़, रामचरण यादव, रमेश मनोहरा, रामेश्वर कांबोज, रामरतन यादव, रूप देवगुण, शराफत अली खान, मुकेश साहनी, त्रिलोकसिंह ठकुरेला सहित अनेक लघुकथाकारों को इसमें सम्मिलित किया गया है।

इसके अलावा इस पुस्तक में कई नवोदितों को स्थान देकर प्रोत्साहित किया गया है। मगर, इसी के साथ ही संपादक ने रचनाधर्मिता को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है। इस प्राथमिकता के आधार पर जनजीवन के संघर्ष, उसके यथार्थ स्वरूप और उत्थान-पतन पर प्रश्नचिन्ह लगाती कथाओं को प्राथमिकता के साथ सम्मिलित किया है।

चार सौ छिय्यासी पृष्ठों के इस विराट संकलन में कुल मिलाकर एक सौ दस रचनाकारों की लघुकथाएं संकलित की गई है। मुख्य पृष्ठ इसकी सांकेतिकता को प्रदर्शित करता है। साज-सज्जा व छपाई उत्तम है । पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य वाजिब है। साथ ही सभी लघुकथाएं पठनीय बन पड़ी है। इस संकलन का लघुकथा के क्षेत्र में हार्दिक स्वागत किया जाएगा। ऐसा समीक्षक का विश्वास है।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

24-09-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०७ ☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है किरण लता वैद्य ‘कठिन’ जी द्वारा लिखित  खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०७ ☆

☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक .. खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)

लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’

प्रकाशक: माय बुक्स 

मूल्य : २५० रु

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

खिड़की से झाँकता चेहरा समकालीन हिंदी कहानी की उस परंपरा का  संग्रह है , जिसमें कथा का उद्देश्य मनोरंजन मात्र नहीं, मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विडंबनाओं और जीवन मूल्यों को पाठक तक पहुँचाना  है। इस संग्रह की कहानियाँ किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि जीवन के साधारण से दिखने वाले प्रसंगों के भीतर छिपे असाधारण मानवीय अनुभवों को उजागर करती हैं।

लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जटिल सामाजिक प्रश्नों को सहज और संप्रेषणीय भाषा में प्रस्तुत करती हैं।

संग्रह की चौदह कहानियाँ रिश्तों, संघर्षों, स्त्री जीवन, सामाजिक असमानताओं और मानवीय करुणा के विविध रंगों को समेटती हैं।

संग्रह की पहली कहानी वीरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह कहानी अपराध, दंड और पुनर्वास जैसे गंभीर विषय को नवाचारी मानवीय दृष्टि से देखती है। एक किशोर की भूल उसके पूरे जीवन को अंधकार में धकेल सकती थी, किंतु कहानी स्थापित करती है कि मनुष्य को उसके एक अपराध से नहीं, बल्कि उसके परिवर्तन की स्वीकार्यता क्षमता से भी पहचाना जाना चाहिए। वीरा का तबला वादक के रूप में स्थापित होना केवल व्यक्तिगत सफलता की कथा नहीं, बल्कि समाज द्वारा दिए गए दूसरे अवसर की सार्थकता का प्रमाण है। कहानी में करुणा, आत्मग्लानि, संघर्ष और पुनर्जन्म की भावनाएँ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में लेखिका सफल हैं। 

शीर्षक कहानी , खिड़की से झाँकता चेहरा संग्रह की प्रभावी मार्मिक रचनाओं में है। खिड़की यहाँ केवल वास्तु का हिस्सा नहीं, बल्कि स्त्री जीवन की सीमाओं और उसकी आकांक्षाओं का प्रतीक बन जाती है। कंचन का चरित्र उस भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जो घर की चारदीवारी में कैद होकर भी बाहर की दुनिया को लालसा के साथ देखती है।

लेखिका बिना आक्रोश की भाषा के इस्तेमाल किए , स्त्री की मौन यातना को पाठक के मन तक पहुँचा देती हैं।  

कृतज्ञ , कहानी मानवीय संबंधों में स्मृति और ऋण स्वीकार की दुर्लभ भावना को रेखांकित करती है। आज के स्वार्थ प्रधान समय में जब सफलता अक्सर व्यक्ति को उसकी जड़ों से दूर कर देती है, यह कहानी बताती है कि जीवन में आगे बढ़ने के बाद भी उन हाथों को याद रखना कितना आवश्यक है जिन्होंने कठिन समय में सहारा दिया था। कहानी का भावपक्ष अत्यंत सशक्त है और पाठक के भीतर मानवीय विश्वास को पुनर्जीवित करता है।

कथनी और करनी ,  वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कहानी है। थर्ड जेंडर के प्रश्न को केंद्र में रखकर लेखिका समाज की उस दोहरी मानसिकता को उजागर करती हैं जहाँ समानता की बातें तो बहुत की जाती हैं, किंतु व्यवहार में स्वीकार्यता का अभाव दिखाई देता है। कहानी अपने शीर्षक को पूर्णतः सार्थक करती है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है।

संग्रह की शक्ति इसकी संवेदनात्मक प्रामाणिकता है। लेखिका ने जीवन को दूर खड़े होकर नहीं देखा, बल्कि उसके बीच उतरकर अनुभव किया है। इसलिए पात्र कृत्रिम नहीं लगते और घटनाएँ बनावटी प्रतीत नहीं होतीं।

भाषा सरल है, किंतु उसमें भावों की ऊष्मा बनी है। कहीं-कहीं कथानक आदर्शवादी मोड़ लेते हैं, फिर भी वे पाठक को अस्वाभाविक नहीं लगते क्योंकि उनके पीछे लेखिका का मानवीय विश्वास सक्रिय रहता है।

खिड़की से झाँकता चेहरा उन कहानी संग्रहों में है जिन्हें पढ़कर केवल कथाएँ याद नहीं रहतीं, बल्कि उनके पात्र मन में बस जाते हैं। यह संग्रह पाठक को निराशा के अंधेरे में भी आशा की  किरण दिखाता है और यही इसकी साहित्यिक उपलब्धि है।

मानवीय मूल्यों, रिश्तों की गरिमा और सामाजिक संवेदना को केंद्र में रखने वाला यह संग्रह समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति है। मेरी शुभेच्छा लेखिका के साथ हैं।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक,  समालोचक)

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कथाकार सुश्री मृदुल कोस्टा की लघु कथा कृति – मृदुल दृष्टि’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ कथाकार सुश्री मृदुल कोस्टा की लघु कथा कृति – मृदुल दृष्टि ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

यह सर्व मान्य है कि जबलपुर के पाथेय प्रकाशन ने पिछले वर्षों में अधिकाधिक साहित्यिक कृतियों को प्रकाशित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। इसी तारतम्य में पिछले दिनों पाथेय प्रकाशन ने चर्चित लेखिका सुश्री मृदुल कोस्टा की एक ऐसी पठनीय कृति की प्रभावी प्रस्तुति की है जिसमें पाठकों को अपनी अपनी रुचि के अनुसार गद्य और पद्य की विभिन्न रचनायें पढ़ने को मिल सकती है।

 मृदुल दृष्टि संकलन की अनेक रचनाएं ऐसी हैं जो लेखिका के हृदय में सहज मानवीय संवेदना से उत्पन्न हुई प्रतीत होती हैं। कृति का गहनता से अध्ययन मनन करने के बाद यह बात तो सामने आती है कि लेखिका की दृष्टि अत्यंत व्यापक है और उन्होंने पाठकों के प्रत्येक वर्ग की रुचि और पसंद के अनुरूप अपनी सृजित रचनाओं को पुस्तक में शामिल किया है। इस संग्रह में विभिन्न सारगर्भित और सामयिक विषयों पर आलेख, कहानियां, संस्मरण, कविताओं इत्यादि ऐसी रचनाओं सम्मिलित हैं जो कि पाठकों के लिए पठनीय तो हैं ही साथ में उनके जीवन के लिए दिशा दर्शक और प्रेरणा का विषय भी बन सकती हैं। इस कृति की एक अन्य खूबी यह भी है कि वह पाठकों को भटकाव या पलायन से रोकती है और परिस्थितियों से संघर्ष करने की अपील करती है। कुरीतियों में जकड़ी नारी हो या संघर्ष से घबराया – थका पुरुष, सभी के लिए अधिकांश रचनाओं में अविराम संघर्षजयी बनने का प्रोत्साहन देने की लालसा भी लेखिका में विद्यमान है और इस कारण वे प्रायः सकारात्मक दृष्टिकोण कायम रखती हैं। यद्यपि कहीं कहीं विषमताओं और विद्रूपताओं के प्रति खीझ भी स्पष्ट दिखती है लेकिन उसके बाद भी अनौचित्य से संघर्ष की उनकी मानसिक दृढ़ता कहीं कमजोर दिखाई नहीं देती है। मुझे विश्वास है कि यह कृति समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगिता और पठनीयता की दृष्टि से एक श्रेष्ठ कृति साबित होगी।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०६ ☆ “आकांक्षा” (काव्य संग्रह) – कवि : श्री परमानन्द सिन्हा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री परमानन्द सिन्हा जी द्वारा लिखित  काव्य संग्रह आकांक्षापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०६ ☆

☆ “आकांक्षा” (काव्य संग्रह) – कवि : श्री परमानन्द सिन्हा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

काव्य संग्रह : आकांक्षा

कवि : श्री परमानन्द सिन्हा

प्रकाशक : बुक्स क्लिनिक, बिलासपुर

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ ‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का निचोड़ है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।

इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए,

सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।

 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं

अंधियारे को देखा पिघलते हुये,

रवि की किरणों को मचलते हुये।

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार,

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये।

इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।

एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं।

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है।

संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं।

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है।

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह ‘आकांक्षा’ को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, ‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और ‘आकांक्षा’ पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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