हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१७ ☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है  नौशाद जी द्वारा लिखित  “आठवाँ सुर” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१७ ☆

☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(किताब उपलब्ध करवाने हेतु, आभार Kavita Kafe UK – कविता कैफ़े यूके)

कृति – आठवाँ सुर

लेखक – नौशाद 

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ संगीत के उस्ताद का शब्द-संसार : ‘आठवाँ सुर’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नौशाद अली को हम हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार के रूप में याद करते हैं। बैजू बावरा, मुगल-ए-आज़म, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी जैसी फिल्मों का संगीत उनकी पहचान है।

लेकिन जब संगीत का यह जादूगर शब्दों के संसार में प्रवेश करता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक संवेदनशील शायर भी था। ‘आठवाँ सुर’ इसी शायर नौशाद अली से हमारा परिचय कराती है। पुस्तक उनकी शायरी का संग्रह है, जिसमें ग़ज़ल, शेर और आत्मानुभूति के स्वर एक साथ दिखाई देते हैं।

‘आठवाँ सुर’ शीर्षक अपने आप में बड़ा अर्थपूर्ण है। भारतीय संगीत में सामान्यतः सात स्वरों की चर्चा होती है, लेकिन नौशाद के लिए जीवन के अनुभवों, प्रेम, विरह, स्मृति, पीड़ा और मृत्यु से निकली अनुभूति जैसे किसी अनसुने आठवें स्वर की तरह है। यही स्वर उनकी शायरी में सुनाई देता है। संगीतकार नौशाद ने फिल्मों में सुरों से भावों को व्यक्त किया था, शायर नौशाद शब्दों से वही काम करते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में भी एक लयात्मकता सहज रूप से नज़र आती है।

 नौशाद की शायरी केवल प्रेम की रूमानियत तक सीमित नहीं है। उसमें जीवन की नश्वरता, बिछोह, स्मृति, आत्मसंवाद और मृत्यु का बोध भी है। एक जगह वे लिखते हैं   —

“क्यों मिली थी हयात याद करो

याद रखने की बात याद करो।”

दो छोटे-से मिसरे हैं, लेकिन इनके भीतर पूरी जिंदगी का प्रश्न खड़ा हो जाता है। जीवन क्यों मिला था? हमने उसका क्या किया? और जाते-जाते क्या याद रह जाएगा? यह प्रश्न शायर स्वयं से भी करता है और पाठक से भी।

इसी तरह उनका एक और शेर है—

“इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए

जब मिल गए हैं आप तो कुछ बात कीजिए।”

यहाँ भाषा सहज है, लेकिन भाव में गहराई है। ‘बेकरार दिल’ और ‘मुलाकात’ जैसे पारंपरिक ग़ज़ल के रूमानी शब्दों के माध्यम से नौशाद उस आत्मीय क्षण को पकड़ लेते हैं जिसमें मिलने के बाद भी मन की बात कहने की बेचैनी बनी रहती है।

 संग्रह की विशेषता इसकी सादगी है। नौशाद कठिन शब्दावली या चमत्कारपूर्ण बिंबों के पीछे नहीं भागते। वे उर्दू ग़ज़ल की परंपरा में रहते हुए भी अपनी बात को अपेक्षाकृत सीधे ढंग से कहते हैं। प्रेम है तो उसमें आत्मीयता है, विरह है तो उसमें पीड़ा है, स्मृति है तो उसके साथ एक कसक है। इसीलिए उनके शेर पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई केवल शायरी कर रहा है। लगता है जैसे कोई अपने जीवन का हिसाब-किताब पाठकों के सामने रख रहा हो।

उनकी शायरी की जड़ें परंपरा में हैं और वे स्वयं इस परंपरा से अनजान नहीं थे। पुस्तक के एक पृष्ठ पर उनका आत्मव्यंग्य पूर्ण शेर है—

“करना है शायरी अगर ‘नौशाद’

‘मीर’ का कुल्लियात याद करो।”

यह केवल मीर के प्रति श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अपनी शायरी की सीमाओं की विनम्र स्वीकृति भी है। रचनाकार की पहचान इसी विनम्रता से होती है कि वह अपने पीछे खड़ी महान परंपरा को पहचानता है। नौशाद यहाँ अपने लिए भी एक कसौटी निर्धारित करते दिखाई देते हैं।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आया उनका आत्मीय संस्मरण भी संग्रह को केवल शायरी की किताब नहीं रहने देता। उसमें परिवार, मृत्यु, स्मृति और अपने प्रियजनों से जुड़ा ऐसा मार्मिक प्रसंग आता है, जहाँ चार पंक्तियों में उनकी निजी पीड़ा कविता बन जाती है

“फिर उसी तरह कलेजे से लगा लो मुझको

गिरती दीवार हूँ लिल्लाह सँभालो मुझको।”

और आगे—

“जिसने फल-फूल दिये, प्यार दिया, साया दिया

मैं वही पेड़ हूँ मरने से बचा लो मुझको।”

यहाँ ‘पेड़’ केवल पेड़ नहीं रह जाता। वह जीवन, परिवार, आश्रय और बीतती उम्र का प्रतीक बन जाता है। यह प्रसंग पढ़ते हुए लगता है कि संगीतकार नौशाद के भीतर का शायर अपने जीवन के अंतिम सत्य से संवाद कर रहा है।

‘आठवाँ सुर’ की शायरी में याद एक महत्वपूर्ण भाव है। वे बीते हुये समय की बार-बार याद करते है। कभी प्रेम की याद के रूप में, कभी किसी बिछुड़े व्यक्ति की स्मृति बनकर और कभी अपने ही अतीत के आईने की तरह। एक शेर में वे कहते हैं—

“मैं लाख ढूँढूँ उसे ढूँढने से क्या होगा

मेरी तलाश में वो भी तो खो गया होगा।”

यहाँ तलाश का द्वंद्व बहुत सुंदर है। जिसे हम खोज रहे हैं, संभव है वह भी हमें खोजते-खोजते कहीं खो गया हो। प्रेम की यह पारस्परिक विडंबना शेर को साधारण विरह से उठाकर जीवन की व्यापक अनुभूति बना देती है।

नौशाद की शायरी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष समय और मृत्यु का बोध है। जीवन को वे स्थायी उपलब्धि की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ संसार आता-जाता है, रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं और अंततः मनुष्य स्मृतियों में बदल जाता है। यही दृष्टि उनकी शायरी को केवल प्रेम-कविता का संग्रह बनने से बचाती है।

इस दृष्टि से ‘आठवाँ सुर’ को नौशाद के संगीत से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। संगीत में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा को लोकप्रिय सिनेमा की भाषा में प्रतिष्ठित किया, शायरी में उन्होंने उसी सांस्कृतिक संस्कार को शब्दों का रूप दिया। उनके संगीत की तरह उनकी शायरी में भी माधुर्य, अनुशासन और भाव प्रधानता दिखाई देती है। किताब से गुजरते हुए नौशाद की रचनात्मक दुनिया में संगीत और कविता दो अलग-अलग धाराएँ नहीं, बल्कि एक ही संवेदनशील मन से निकले दो स्वर समझ आतें हैं। उनके जीवन और कला की यही बहुआयामी पहचान उन्हें विशिष्ट बनाती है।

‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए सबसे सुखद बात यह लगती है कि यहाँ एक प्रसिद्ध संगीतकार अपने स्थापित व्यक्तित्व का सहारा लेकर शायर बनने की कोशिश नहीं करता। वह अपने शब्दों के बल पर सामने आता है। कहीं वह प्रेमी है, कहीं विरही, कहीं आत्मालोचक, कहीं जीवन से सवाल करता हुआ मनुष्य और कहीं अपनी स्मृतियों में लौटता हुआ वृद्ध। यही मानवीयता इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है।

अनुमान लगा सकता हूं कि ये संग्रह उनके जीवन के लंबे सफर में मन का चैन ढूंढने का, समय समय पर कागज पर अभिव्यक्त प्रयासो का संकलन है।

नौशाद के संगीत को सुनते हुए हम उनके सुरों के जादू में खो जाते हैं,  ‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए उन्हीं सुरों के पीछे छिपे मनुष्य से हमारा परिचय होता है। सात सुरों के महान साधक ने शब्दों में जो अतिरिक्त स्वर खोजा, शायद वही इस पुस्तक का ‘आठवाँ सुर’ है, एक ऐसा स्वर, जिसे कानों से कम और मन से अधिक सुना जा सकता है।

उन्हें श्रद्धांजलि

#लंदन_डायरी, #पुस्तक, #bhawan

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ प्रतिष्ठित कवियत्री और शिक्षाविद डा. संध्या जैन श्रुति की कृति – नर्मदा महाकाव्य ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ प्रतिष्ठित कवियत्री और शिक्षाविद डा. संध्या जैन श्रुति की कृति – नर्मदा महाकाव्य ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित)

☆

वैसे तो अनेक साहित्यकारों ने अपनी कलम के माध्यम से मां नर्मदा की साधना, आराधना की है और उनकी कृति साहित्यिक क्षेत्र में पाठकों के बीच काफी चर्चित भी हुई हैं। इसी तारतम्य में अगर देखा जाए तो डॉ. संध्या जैन ‘श्रुति’ कृत ‘नर्मदा महाकाव्य’ भी माँ नर्मदा के इसी आध्यात्मिक, प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक वैभव का एक अप्रतिम और भावपूर्ण काव्यात्मक आलेखन है।

डा . संध्या जैन ‘श्रुति’

कवयित्री स्वयं ‘आत्मकथ्य’ में अपने जीवन की एक अद्भुत घटना का स्मरण करते हुए व्यक्त करती हैं कि बाल्यकाल में भेड़ाघाट के जलप्रपात में जलधार के बीच गिर जाने पर किस प्रकार माँ नर्मदा कीज्ञ कृपा से उनका जीवन सुरक्षित रहा। यह महाकाव्य उसी जीवनदान के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और अनन्य निष्ठा का भक्तिपुष्प है।

 शारदा प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित डा. संध्या जैन श्रुति जी का यह महाकाव्य मंगलाचरण से प्रारंभ होकर १३ सर्गों में सुनियोजित ढंग से विभक्त है। कवयित्री ने माँ नर्मदा की उत्पत्ति, उनके पौराणिक एवं प्राकृतिक स्वरूप, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व तथा आध्यात्मिक चेतना को प्रत्येक सर्ग में विस्तार से प्रस्तुत किया है। उदाहरण स्वरुप अगर हम कृति के कुछ भागों की चर्चा करें तो इस महाकाव्य की पठनीयता से हम परिचित हो सकते हैं।

मंगलाचरण एवं नर्मदा स्तुति:

महाकाव्य का प्रारंभ देवाधिदेव महादेव और उमा-पति शिव की अराधना से होता है। कवयित्री ने शिव-शंकर के पसीने की बिंदु से प्रवाहित होती रेवा के अवतरण को अद्भुत काव्यात्मक छटा में पिरोया है:

 ०

“शिवशंकर की दिव्य-देह से, सतत पसीना बह निकला।

सरल-तरल, अविरल उस जल ने, किया रूप धारण अबला ॥”

 ०

मातृत्व और अनुग्रह का भाव:

कवयित्री का समर्पण भाव महाकाव्य के प्रत्येक छंद में मुखरित होता है। वे अपने अल्पज्ञ स्वरूप को स्वीकारते हुए माँ के सम्मुख आत्म-समर्पण करती हैं:

 ०

“ममता मयी हो मात तुम्हारी समता कहीं नहीं

तेरे सजुल सबल इस जल से सिंचित सारी मही ॥”

 ०

घाटों का आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य:

‘नर्मदा के घाट’ शीर्षक के अंतर्गत कवयित्री ने नर्मदा तटों पर व्याप्त अनहद नाद, मंदिरों की घंटियों और आत्मिक शांति का जीवंत सजीव चित्रण किया है:

 ०

“अटके-भटके रागी प्राणी ऋद्धि-सिद्धि पा जाते

मन की शांति प्राप्त कर लेते शक्ति रूप पतियाते ॥

 ०

ओम् अनहद नाद घंटा-घाट तट की बात

रम्य दृश्यों से सुसज्जित नर्मदा के घाट ॥”

 ०

नर्मदा महाकाव्य’ केवल एक काव्य ग्रंथ नहीं, बल्कि अमरकंटक से लेकर सागर संगम तक बहने वाली रेवा की चेतना का काव्यात्मक संस्मरण है। जैसा कि श्री कल्याण सेवा आश्रम के पूज्य बाबा कल्याण दास जी ने अपने मंगलाशीष में लिखा है— यह कृति माँ नर्मदा की सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक महिमा को सर्वांगपूर्ण रूप में प्रस्तुत करने का एक स्तुत्य एवं सफल प्रयास है।

 🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१६ ☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है कवि – श्री आशुतोष झुड़ेलेजी द्वारा लिखित  “काश! मैं बादल होता” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१६ ☆

☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

कृति -काश! मैं बादल होता

कवि – आशुतोष झुड़ेले

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ जीवन को देखने की सहज दृष्टि – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कविता के लिए हमेशा किसी असाधारण घटना की जरूरत नहीं होती। एक खाली मेज़, उड़ती पतंग, पहली बारिश की खुशबू, किसी मित्र की स्मृति या मन में उठती कोई छोटी-सी शिकायत भी कविता का कारण बन सकती है। आशुतोष झुड़ेले ‘ओ रे कबीरा’ का संग्रह ‘काश! मैं बादल होता’ इसी सहज अनुभूति से निकली 51 कविताओं का संसार है। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि ये कविताएँ जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, त्योहारों, घटनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों से बनी हैं।

इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि कवि कविता लिखने से अधिक जीवन को पकड़ने की कोशिश करता है। ‘बग़ीचे की मेज़’ इसका सुंदर उदाहरण है। सामान्य-सी दिखाई देने वाली एक मेज़ कवि की दृष्टि में अनेक जीवन-कथाओं की साक्षी बन जाती है। वहाँ बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं, प्रेमी युगल हैं, अकेलेपन की तलाश में आए लोग हैं और अपने हिस्से के लिए संघर्ष करते चेहरे भी। अंततः वही मेज़ खाली होती है और कवि को लगता है,“यहीं तो मेरी मुलाक़ात आज उम्मीद से होने वाली है।”  वस्तु को जीवन के रूपक में बदल देना इस कविता की उपलब्धि है।

संग्रह में स्मृति एक महत्वपूर्ण संवेदनात्मक आधार है। ‘चुरा ले गए’ में कवि उन चीजों की तलाश करता है जो आधुनिक जीवन में धीरे-धीरे हमसे छूटती जा रही हैं, सुबह की ताजगी, शाम की सादगी, पहली बारिश की खुशबू, बगीचे के फूल और आँगन की मिट्टी। “कुछ लोग पहली बारिश की ख़ुशबू चुरा ले गए” केवल एक सुंदर बिंब नहीं, संवेदनाओं के क्षरण की ओर बड़ा संकेत है।

इसी क्रम में ‘पतझड़ के भी रंग होते हैं’ जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य खोजती है। पतझड़ यहाँ अंत नहीं, देखने की नई दृष्टि है। सूखे पत्तों, गिरे फूलों और पुराने गीतों में भी रंग और स्मृति बची हुई है। यह कविता संग्रह के आशावादी स्वर को पहचान देती है।

‘पतंग सी जिंदगी’ में जीवन की उड़ान और उसकी डोर का सुंदर साम्य है। पतंग दूर जाती है, लौटती है, हवा से संघर्ष करती है, फिर भी डोर से जुड़ी रहती है।  स्वतंत्रता और संबंधों के बीच मनुष्य की स्थिति को कवि ने एक परिचित लोक-प्रतीक में सहजता से बाँधा है।

आशुतोष की कविता केवल निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रहती। ‘भीड़ की आड़ में’ सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रश्न करती है। धर्म, जाति और सामूहिक पहचान के पीछे छिपकर मनुष्य अपने दोषों से बचने की कोशिश करता है। कविता का निष्कर्ष आत्ममंथन की ओर ले जाता है,दोष किसी भीड़ का नहीं, अंततः मनुष्य का अपना है।

‘हम सोचते हैं’ इसी तेवर को व्यंग्य में बदलती है और हमारी सामाजिक स्मृति तथा आत्ममुग्धता पर चोट करती है।

‘दर दर गंगे’ में सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरणीय चिंता साथ दिखाई देती हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा में कवि उस नदी की पीड़ा दर्ज करता है जिसे हम माँ कहते हैं, जिसकी आरती करते हैं, पर जिसकी रक्षा का दायित्व भूल जाते हैं। “बहाती जा रही बस आँसू” जैसे बिंब श्रद्धा को जिम्मेदारी से जोड़ देते हैं। इस तरह के कई नवाचारी रूपक कवि की अनुभव जन्य भाषा ,भाव , शब्द सामर्थ्य के परिचायक हैं। यद्यपि यह कवि की पहली ही कृति है, उनके व्यक्तित्व की तरह व्यापक सुगठित सरल तथा परिपक्व है।

‘भोपाल’ संग्रह की अत्यंत छोटी, किंतु गहरी कविता है। “हवा क्या होती है, पूछो भोपाल से…” जैसे लगातार प्रश्न एक त्रासदी को केवल घटना न रहने देकर सामूहिक स्मृति में बदल देते हैं।  शब्द कम हैं, लेकिन उनके पीछे भय, अन्याय और जीवन-मृत्यु का पूरा अनुभव उपस्थित है। भोपाल गैस त्रासदी पर केंद्रित यह कविता महत्वपूर्ण संवेदी, दस्तावेजी रचना बन पड़ी है।

रिश्तों की नाजुकता भी कवि की प्रमुख चिंता है। ‘डोर’ में समय और संबंध दोनों को ऐसे धागे की तरह देखा गया है जो लंबा होने पर अपना सिरा खो देता है और तनिक से झटके में टूट भी सकता है।  ‘रिश्ते’ कविता अपेक्षा और उपेक्षा के बजाय देने और कर्म को महत्व देती है।  ‘शिकायत थी मुझको’ में शिकायतों की पूरी सूची अंततः आत्मबोध  सामने लाती है। कबीरा का मुस्कुराकर ‘मूरख’ कहना कविता को उपदेश नहीं, आत्मव्यंग्य बना देता है।

खुद पर व्यंग्य कर पाना एक सामर्थ्यवान कवि की पहचान है।

‘पहचानो तुम कौन हो?’ संग्रह की उल्लेखनीय रचनाओं में है। भेड़ों के बीच पला शेर का बच्चा स्वयं को भेड़ समझता रहता है। अपनी वास्तविक पहचान से अपरिचित यह शेर हमारे भीतर छिपी संभावनाओं का रूपक बन जाता है।  कविता का प्रश्न इसलिए केवल शेर से नहीं, पाठक से भी है, हम अपने बारे में जो मानते हैं, क्या वास्तव में वही हैं?

संग्रह की भाषा उसकी अपनी पहचान है। हिंदी के साथ उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहजता से आते हैं। पुनरावृत्ति, संवाद और लोकलय कई कविताओं को मंचीय प्रभाव देते हैं। ‘तू है गज’ में लगातार दोहराया गया संबोधन हाथी को भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, शक्ति, करुणा और अस्तित्व के व्यापक प्रतीक में बदल देता है।

‘काश! मैं बादल होता’ की कविताएँ बड़े दार्शनिक निष्कर्षों का दावा नहीं करतीं। वे छोटे अनुभवों से छोटी-छोटी रोशनियाँ चुनती हैं। यही इनकी विशेषता है। कहीं स्मृति है, कहीं व्यंग्य, कहीं सामाजिक सरोकार, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं आत्मसंवाद। कवि बादल बनकर उड़ना चाहता है, पतंग बनकर लौटता है, खाली मेज़ पर उम्मीद खोजता है और अंततः स्वयं से ही पूछता है, “पहचानो तुम कौन हो?”

कविताएं पढ़कर समझ आता है कि आशुतोष जी साहित्य के एक अच्छे पाठक हैं, तथा कला संस्कृति उनकी अभिरुचि है, जो रचनाओं में मुखर हुई दिखती है।

कविता यहाँ जीवन से अलग कोई सजाया हुआ संसार नहीं, बल्कि जीवन को थोड़ी देर ठहरकर देखने की कला है। ‘काश! मैं बादल होता’ इसी ठहरने, देखने और फिर भीतर कुछ बदल लेने का सहज आमंत्रण है।

कवि की आगामी रचना यात्रा के पड़ाव की प्रतीक्षा रहेगी।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆  समीक्षक – श्री अनिल कुमार अस्थाना ☆

श्री अनिल कुमार अस्थाना

☆ पुस्तक समीक्षा ☆

☆ ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆  समीक्षक – श्री अनिल कुमार अस्थाना ☆

☆

पुस्तक समीक्षा: ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी)

 लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ प्रेम का मनोविज्ञान -बदलाव की बयार-“कोई नाम न दो” – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी द्वारा रचित पुस्तक ‘ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी)’ का अध्ययन करने का सुखद अवसर प्राप्त हुआ। भले ही इन कहानियों का परिवेश मूलतः ब्रिटिश है, परंतु ये सभी कहानियां किसी न किसी रूप में हमारी दादियों द्वारा भारत में सुनाई जाने वाली कथाओं की ही आत्मीय अनुभूति कराती हैं।

लेखक ने विदेशी लोक कथाओं में छिपे उन तत्वों को उकेरा है जो भारतीय जनमानस से गहराई से जुड़ते हैं:

रॉबिन हुड और शेरवुड का जंगल : यह कहानी पूरी तरह से भारतीय ऐतिहासिक परिवेश से मेल खाती प्रतीत होती है। यह उस कालखंड का स्मरण कराती है जब पहले मुगल और फिर ब्रिटिश शासक जनता से जबरन लगान वसूलते थे। इसके साथ ही, यह प्रसंग बरबस ही इस बात की याद दिलाता है कि कैसे भारत शासन ने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर ग्रामीण जनता को इस शोषण से बड़ी राहत दिलवाई थी।

राजा आर्थर और जादुई तलवार: यह कथा भारतीय महाकाव्य महाभारत के उस गौरवशाली प्रसंग की याद दिलाती है, जहां अर्जुन मछली की आंख पर अचूक निशाना लगाते हैं।

वर्तमान परिदृश्य में, यह पुस्तक आज की युवा पीढ़ी और बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय कहानियों से परिचित कराने का एक अत्यंत सार्थक माध्यम है।

इस पुस्तक की विषयवस्तु से प्रेरित होकर, मैंने यह निर्णय लिया है कि मैं कल्याण में रह रही अपनी 4 वर्षीय भांजी ‘अन्वी’ को ये बाल-कहानियां अवश्य सुनाऊंगा।

विदेशी लोक कथाओं को इतने सहज और ग्राह्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी को हार्दिक बधाई।

☆

©  श्री अनिल कुमार अस्थाना

जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆

मेरे पूज्य पिता स्व. पं.भगवती प्रसाद जी पाठक की 25 सितंबर को 127 वीं जयंती है और यह मेरे लिए सौभाग्य और सुखद संयोग की बात है कि संस्था मंथन श्री के द्वारा भी अभी 20 सितंबर को पिता को समर्पित काव्य रचनाओं का एक संग्रह पितृ नमन भी प्रकाशित किया गया। इस कृति में अपने पूज्य पिता पर आधारित एक कविता मेरी भी शामिल की गई जिसके लिए मैं मंथन श्री परिवार के प्रति आत्मीय रुप से आभार व्यक्त करता हूं।

अगर देखा जाए तो पिता कीअपेक्षा मातृ भक्ति को लेकर कवियों द्वारा अधिक काव्य रचनाओं का सृजन किया गया।काफी दिनों से वास्तव में पितृ भक्ति को लेकर भी एक ऐसे ही काव्य संग्रह की आवश्यकता महसूस भी की जा रही थी जिसमें पिता को समर्पित ऐसी कविताएं शामिल हों जो कि पाठकों के लिए पठनीय साबित हो सके।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

मंथन श्री द्वारा इसी पावन उद्देश्य को लेकर जबलपुर के कला वीथिका में प्रतिष्ठित कवियों की पिता को समर्पित श्रेष्ठ कविताओं के संग्रह पितृ नमन का लोकार्पण कार्यक्रम पिछले दिनों आयोजित किया गया।पितृ नमन को साहित्यिक क्षेत्र का एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जा सकता है जो कि पिता को समर्पित काव्य रचनाओं के सशक्त सृजन हेतु सहायक सिद्ध होगा। मंथन श्री के संस्थापक और प्रसिद्ध साहित्य साधक श्री संतोष नेमा संतोष जी की परिकल्पना, संयोजना एवं सफल संपादन में प्रकाशित इस कृति के प्रकाशन में श्री राजेश पाठक प्रवीण, श्री विजय नेमा अनुज‌ एवं सिद्धेश्वरी सराफ शीलू का संपादन सहयोग भी काफी सराहनीय रहा

प्रज्ञा पीठाधीश्वर श्री मां साध्वी विभानंद गिरी, महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी, महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे, श्री शरद अग्रवाल जी, कविवर श्री हरिशंकर भटनागर जी, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी, श्री विजय नेमा अनुज जी, श्री राजेश पाठक प्रवीण जी, की मंगल भाव सहित प्रभावी प्रतिक्रियाओं ने पुस्तक कृति को सार्थकता प्रदान की है।पितृ नमन में श्री संतोष नेमा संतोष जी की कृतज्ञता भाव के रुप में अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं कि यह संग्रह एक ही भाव के अनेक रंग हैं। किसी ने पिता को बरगद कहा, किसी ने हिमालय, , किसी ने पुरानी साईकिल की घंटी, किसी ने फटी हुई कमीज़ के पीछे छिपा गौरव। छंद, ग़ज़ल, गीत, मुक्तक और नयी कविता के माध्यम से रचनाकारों ने अपने अपने पिता को जिया है। यह विविधता ही इस संग्रह की की सबसे बड़ी शक्ति है।मंथन श्री द्वारा संयोजित इस पितृ नमन कृति को भाई श्री संतोष नेमा संतोष ने अपने पूज्य पिता स्व. श्री देवीचरण जी नेमा को समर्पित की है। पाथेय प्रकाशन की इस कृति में 208 कवियों की अपने पिता को समर्पित काव्य रचनाएं शामिल हैं।

इस पुस्तक के प्रारंभ में पिता पर आधारित ये‌ काव्य पंक्तियां पाठकों को प्रभावित और आकर्षित करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं:

०

पिता तप की ज्योति हैं,

त्यागों का विस्तार हैं।

मौन रहकर भी सदा,

जीवन के आधार हैं।

मंथन श्री ने शब्दों में,

पितृ महिमा को स्वर दिया।

संकलन में पितृ ऋण के,

श्रद्धा और संस्कार हैं।

०

पितृ भक्ति पर आधारित मंथन श्री की यह काव्य कृति साहित्यिक क्षेत्र के पाठकों के लिए इस वर्ष की एक संग्रहणीय, पठनीय और प्रशंसनीय कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१५ ☆ ☆ “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” –  संपादक : ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी जी द्वारा संपादित   “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१५ ☆

☆ “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” –  संपादक : ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

 

मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)

लेखक – अखंड गहमरी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ नाभिनाल का अटूट रिश्ता : स्मृति, ममत्व और मनुष्य होने की कविता – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

माँ को पढ़ना दरअसल उस मौन को पढ़ना है, जिसे जन्म से पहले से ही माँ पल पल स्वयं कष्ट सहकर भी आनंदित होती है और जीवन की कहानी लिखती चलती है।

माँ जीवन का अमर तत्व है। उस पर प्रायः प्रत्येक कवि ने लिखा  है। मुझे स्मरण है कि जागरण समूह ने इंदौर से मां शीर्षक से एक भव्य लघुकथा संग्रह निकाला था।

मुझे अपनी मां के अवसान पर स्वयं मुखरित हुई रचना की पंक्तियां याद आती हैं

“घर के हर दर पर चंदन की खुश्बू सी ,लगती हो माँ

तुलसी बिरवे के चौरे पर

रौशन बाती सी उजरी  हो माँ “

माँ और संतान का रिश्ता एक अदृश्य धागा है, जो जन्म के क्षण में भले ही शारीरिक रूप से अलग हो जाता है, लेकिन स्मृति, संवेदना और आत्मा के धरातल पर वह कभी विच्छिन्न नहीं होता।

ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी द्वारा बहुत ही गम्भीर चिंतन से संपादित काव्य संकलन ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी शाश्वत संबंध को कविता के अनेक स्वरों में अनुभव करने का अवसर देता है।

यह पुस्तक केवल माँ पर लिखी गई कविताओं का ऐसा संग्रह है जो उस  मानवीय अनुभव की साहित्यिक यात्रा है, जहाँ माँ एक व्यक्ति से आगे बढ़कर स्मृति, माटी, घर, त्याग, समय और अस्तित्व का रूपक बन जाती है।

विभिन्न कवियों की रचनाएँ इसी केंद्रीय भाव को अपने-अपने जीवनानुभवों , परिवेश और  भाषिक संस्कारों के साथ अभिव्यक्त करती हैं

‘नाभिनाल’ जैविक संबंध का प्रतीक है, जबकि ‘अटूट रिश्ता’ उसके भावात्मक विस्तार का व्याख्यान। जन्म के बाद नाभिनाल कटती है, लेकिन क्या माँ से हमारा संबंध कभी कट सकता है? यही प्रश्न इस संकलन के शीर्षक को साधारण नाम से उठाकर एक दार्शनिक प्रस्तावना में बदल देता है।

माँ हमारे जीवन का पहला स्पर्श है, पहली भाषा है और संभवतः पहली ऐसी उपस्थिति भी, जिसके अर्थ को हम उम्र भर समझने का प्रयास करते रहते हैं। हम बड़े होते हैं, घर बनाते हैं, अपनी सफलताओं का संसार रचते हैं, लेकिन हमारे भीतर कहीं एक बच्चा अपनी माँ की आवाज, उसकी हथेली और उसकी प्रतीक्षा में सदैव ठहरा रहता है।

इस संकलन की कविताएँ इसी ठहरे हुए बच्चे तक पहुँचने का रास्ता बनाती हैं।

ब्रज श्रीवास्तव की कविता ‘सबसे पहले माँ’ माँ की पारंपरिक छवि को एक आत्मीय और धरती से जुड़ी हुई व्याख्या देती है—

“माँ केवल माँ नहीं है सुखद उपस्थिति है किसी जज़्बात की”

और आगे कवि लिखते हैं—“माँ कोई जन्नत नहीं है वह तो खालिस धरती है ,धरती पर मौजूद घर का ओसारा है।”

इन पंक्तियों में माँ को किसी अमूर्त आदर्श या दूरस्थ स्वर्ग के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की ठोस, रोजमर्रा की सुरक्षा के रूप में देखा गया है। ओसारा यहाँ  घर का वास्तु-तत्व ,  विश्राम, आश्रय और अपनत्व का स्थान है। जीवन की तपिश भरी धूप से लौटकर मनुष्य जहाँ स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है, वही माँ का भावलोक है।

कविता का दार्शनिक सौंदर्य इस बात में है कि वह माँ को पूजनीय बनाने के बजाय पहले मनुष्य के जीवन में उसकी वास्तविक उपस्थिति को पहचानती है।

 माँ की आवाज, उसकी चिंता और उसकी परवाह करना, ये सभी हमें स्वयं से प्रेम करना सिखाते हैं।

 माँ को समझना , एक ऐसी भाषा,होती है जिसे पढ़ा नहीं जा सकता, वह अनुभव होती है।

भरत प्रसाद की कविता ‘कोई और धातु की होती है-माँ’ मातृत्व को असाधारण शक्ति और रहस्य के रूप में देखती है। कवि लिखते हैं— “गलती से भी मां को परखने की गलती मत करना उसके भीतर छिपी रहती हैं अज्ञात लिपियाँ”

यहाँ माँ एक ऐसी किताब बन जाती है, जिसके अक्षर सामान्य बौद्धिक उपकरणों से नहीं पढ़े जा सकते। मातृत्व को कवि प्रकृति द्वारा लिखी गई एक विशिष्ट भाषा कहते हैं—“मिट्टी की भाषा की तरह।”

इस कविता का भावात्मक केंद्र उस स्वीकार में है कि माँ को जानना केवल उसके कार्यों की सूची बना लेना नहीं है। उसके त्याग, धैर्य और मौन की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन उसकी संपूर्णता को नाप पाना कठिन है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस अनुभूति को और गहरा करती हैं

 “जीते जी हद से ज्यादा मिट जाने की कला है- मां होना।।”

माँ होने को मिट जाने की कला कहना एक मार्मिक दार्शनिक बिंब है। यह मातृत्व के समर्पण की ओर संकेत करता है, यद्यपि माँ को केवल आत्म-विलोपन तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। माँ की पहचान उसके अपने सपनों, संघर्षों और व्यक्तित्व से भी बनती है। इस दृष्टि से कविता पाठक को मातृत्व के त्याग के साथ उसके मानवीय विस्तार पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

शायद मां अपने सपने अपनी संतान में साकार करती है।

संग्रह की एक और कविता नरेंद्र गौड़ की ‘माँ का संदूक’ स्मृति को किसी बड़े दार्शनिक वक्तव्य में नहीं, बल्कि एक घरेलू वस्तु में खोजती है। पिता द्वारा संदूक पर लिखे गए माँ के नाम से कविता आरंभ होती है— “आइलपेंट से टेढ़ मेढ़े अक्षरों में संदूक पर छोड़ गए माँ का नाम”

माँ का संदूक परिवार की संपत्ति से कहीं अधिक उसकी सामूहिक स्मृति का पात्र बन जाता है। माँ के जाने के बाद उसके कपड़े, आभूषण और उपयोग की वस्तुएँ अचानक भावनात्मक और आर्थिक मूल्य के बीच खड़ी दिखाई देती हैं।

कविता का व्यंग्यात्मक और करुण पक्ष तब सामने आता है, जब भाई संदूक को लेकर अपनी आजमाइश करते हैं। जिस माँ ने परिवार के लिए अपने आभूषणों तक को बचाकर नहीं रखा, उसकी बची हुई वस्तुओं में संतानें अपने हिस्से का अर्थ खोजती हैं।

यहाँ संदूक एक वस्तु नहीं रह जाता, वह परिवार के बदलते मूल्यों का आईना बन जाता है। माँ की स्मृति के भीतर छिपे त्याग को समझने की जगह मनुष्य जब वस्तुओं के मूल्य में उलझ जाता है, तब कविता एक मौन प्रश्न छोड़ जाती है, क्या भावना और स्मृतियों का भी बँटवारा किया जा सकता है?

मिथिलेश रॉय की कविता ‘अपनी कथा में’ माँ को उसकी संतान की माँ होने से पहले एक स्वतंत्र बचपन वाली लड़की के रूप में देखने का प्रयास करती है। वह अपने पोते-पोतियों को खेलों, नदी और स्कूल की स्मृतियाँ सुनाती है।

कविता में माँ का बचपन धीरे-धीरे सामने आता है, वह लंबी दौड़ जीतती थी, नदी पार करती थी, तितली की तरह उड़ती थी। फिर विवाह और सामाजिक बंधनों की स्मृति उस कथा में प्रवेश करती है। “तब इतना बड़ा घूँघट लेना पड़ता था हमें ससुराल में”

बच्चों का उस घूँघट को देखकर हँसना और माँ का अपनी कथा के बीच रुक जाना कविता को एक गहरी संवेदनात्मक ऊँचाई देता है। उसके बाद— “रुंध जाता है उसका गला , भरने लग जाती है मां की आवाज।”

यहाँ कविता केवल अतीत का वर्णन नहीं करती,  वह पीढ़ियों के बीच अनुभवों की दूरी को सामने लाती है। जिस माँ को बच्चे केवल माँ के रूप में जानते हैं, उसके भीतर एक लड़की, एक विद्यार्थी, एक स्वप्नदर्शी और एक संघर्षशील स्त्री भी समाई हुई थी।

कविता हमें याद दिलाती है कि किसी व्यक्ति को उसके संबंधों की एकमात्र भूमिका में देखना उसके पूरे अस्तित्व को देखना नहीं है।

अमरजीत  की कविता ‘चिराग़ जैसी मां’ माँ की अनुपस्थिति को शहर के सामान्य जीवन के बीच रखती है। माँ के जाने के बाद शहर में सब कुछ पहले जैसा चलता रहता है, लोग काम पर जाते हैं, कारखाने चलते हैं, सड़कों पर भीड़ रहती है। लेकिन परिवार के भीतर एक ऐसी रिक्तता उत्पन्न हो जाती है, जिसे बाहरी दुनिया नहीं देख पाती।

कविता के अंत में आता है— “सिर्फ एक माँ के नाम का चिराग है बुझा हुआ।”

यह बिंब अत्यंत प्रभावी है। शहर की रोशनियों के बीच माँ के नाम का बुझा चिराग निजी शोक और सार्वजनिक सामान्यता के अंतर को प्रकट करता है। दुनिया चलती रहती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लिए समय का अर्थ बदल जाता है।

माँ की मृत्यु के बाद स्मृति ही वह दीपक बनती है, जिसके सहारे मनुष्य अतीत से संवाद करता रहता है।

इस संकलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न भाषायी और भौगोलिक पृष्ठभूमियों के कवियों का सम्मिलन है। असमिया और उड़िया सहित अलग-अलग क्षेत्रों के कवि मातृत्व के अनुभव को अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों और भाषिक संवेदनाओं के साथ भिन्न  भिन्न रचनाओं में व्यक्त करते हैं।

मानस रंजन महापात्र की कविता ‘माँ के लिए आकाश के सपने’ में माँ धरती और आकाश के बीच फैली हुई एक विराट उपस्थिति बन जाती है— “आकाश के चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है मेरी माँ!”

माँ और माटी का यह संबंध भारतीय संवेदना में गहरी जड़ें रखता है। मिट्टी हमें जन्म देती है, पोषित करती है और अंततः अपने भीतर समाहित कर लेती है। कविता इस चक्र को मातृत्व की स्मृति से जोड़ती है।

कवि आगे कहते हैं— “धरती के शब्द सारे असमर्थ हैं तेरा नाम लिखने को।”

इन पंक्तियों में अतिशयोक्ति के माध्यम से उस भाव को व्यक्त किया गया है, जहाँ माँ के प्रति प्रेम सामान्य शब्दावली की सीमा से बाहर चला जाता है। अनुवाद के माध्यम से यह अनुभव एक भाषिक सीमा से दूसरी भाषा तक पहुँचता है और संकलन को व्यापक भारतीय काव्य-संवेदना से जोड़ता है।

मधु सक्सेना की कविता ‘बंजारन माँ’ , माँ की गृहस्थी को एक छोटे टीन के बक्से में समेटती है। कुछ कपड़े, एक शाल, पति की तस्वीर और बच्चों के लिए तावीज, ये वस्तुएँ माँ के जीवन के भौतिक विस्तार को दर्शाती हैं।

कविता की खूबी यह है कि वह माँ की स्मृतियों को भव्यता से नहीं, सामान्य घरेलू विवरणों से रचती है। उसके हाथों से बने पकवान, व्रत, बच्चों की चिंता और नाती-पोतों को देखकर झुकी कमर का गर्व, ये सब मिलकर एक ऐसी स्त्री की छवि बनाते हैं, जिसके जीवन में संघर्ष और स्नेह साथ-साथ चलते हैं।

माँ के लिए परिवार केवल वर्तमान नहीं है; वह उसकी स्मृतियों, आदतों और प्रार्थनाओं में भी उपस्थित रहता है।

‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ का महत्त्व उसके विषय की भावुकता भर में नहीं, बल्कि इस बात में है कि माँ को देखने के लिए इसमें अनेक दृष्टियाँ उपलब्ध हैं। कहीं माँ धरती है, कहीं संदूक में सुरक्षित स्मृति, कहीं बचपन खो चुकी लड़की, कहीं चिराग और कहीं ऐसी भाषा, जिसका पूर्ण अनुवाद संभव नहीं।

यह विविधता पुस्तक को एकरेखीय भावुक संकलन बनने से बचाती है। हालाँकि मातृत्व पर लिखी कविताओं में पुनरावृत्त भाव-बिंबों की संभावना स्वाभाविक है, फिर भी अलग-अलग कवियों की निजी स्मृतियाँ इस विषय को नए कोण प्रदान करती हैं। इस प्रकार पुस्तक का साहित्यिक मूल्य केवल उसके भावनात्मक प्रभाव में नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद सामाजिक, पारिवारिक और दार्शनिक प्रश्नों में भी है।

माँ को याद करना यहाँ अतीत में लौटना भर नहीं है। यह स्वयं से पूछना भी है कि हमारी वर्तमान जीवन-व्यवस्था में उस व्यक्ति के लिए कितना स्थान बचा है, जिसने हमारे अस्तित्व के निर्माण में सबसे पहली भूमिका निभाई।

 नाभिनाल से स्मृति तक , पढ़ते हुए लगा कि कविता का काम हमेशा उत्तर देना नहीं होता। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न जगा देती है, जिनके साथ हम चुपचाप घर लौटते हैं।

माँ को लेकर लिखी गई कविताएँ हमें भावुक करती हैं, लेकिन उससे आगे जाकर वे हमें अपने व्यवहार, अपनी स्मृतियों और अपने संबंधों पर विचार करने का अवसर देती हैं। माँ के प्रति प्रेम केवल स्मरण का विषय नहीं, जीवन में निभाए जाने वाले दायित्व का प्रश्न भी है।

नाभिनाल जन्म के समय कटती है, पर उसकी स्मृति मनुष्य की चेतना में जीवन भर बनी रहती है। शायद इसीलिए माँ को याद करते हुए हम केवल अपनी माँ को नहीं पुकारते, हम अपने भीतर के उस आरंभ को पुकारते हैं, जहाँ से हमारी मनुष्यता ने पहली साँस ली थी।

‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी आरंभ की कविता है। एक ऐसा काव्य-संसार, जहाँ माँ स्मृति भी है, माटी भी, मौन भी और मनुष्य होने का पहला अर्थ भी है।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, स्वतंत्र लेखक, व्यंगयकार, समालोचक 

इन दिनों लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कविवर डा. सुरेन्द्र लाल साहू निर्विकार का खंड काव्य – ‘हे नारी! हे आद्य सुमन!’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ कविवर डा. सुरेन्द्र लाल साहू निर्विकार  का  खंड काव्य – ‘हे नारी! हे आद्य सुमन!’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆

निज पुत्र बलि दे जान बचाई,

धन्य धन्य हे ! पन्ना धाय।

०

आज जब मैं सुप्रसिद्ध कवि डा.  सुरेन्द्र लाल साहू के खंड काव्य हे नारी ! हे आध्य सुमन! की समीक्षात्मक चर्चा कर रहा हूं तो मुझे अपनी ही काव्य रचना की उपरोक्त पंक्तियां याद आ रही हैं।

डॉ. सुरेंद्र लाल साहू ‘निर्विकार’ द्वारा रचित खंड-काव्य ‘हे नारी! हे आद्य सुमन!’  भी  भारतीय नारी के त्याग  , संघर्ष , संवेदना और  सामाजिक  मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में नारी के गरिमामय  स्वरूप का एक यादगार दस्तावेज है। यह कृति केवल काव्य-संग्रह नहीं, अपितु हमारे राष्ट्रीय समाज के उस  वैचारिक  दर्शन की पड़ताल है जहाँ नारी के  सृजन  और त्याग की प्रेरक  चर्चा की गई है। कवि ने समाज में आ रहे वैचारिक परिवर्तनों और आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच पारिवारिक विघटन एवं नारी जीवन की त्रासदियों को अत्यंत मार्मिक भाषा में  व्यक्त किया है।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आधुनिकता के नाम पर पनप रही प्रवृत्तियों और उनके दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। कवि ने पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण तथा एकल परिवार की अवधारणा से उत्पन्न सामाजिक असंतुलन को बहुत ही तार्किक और वैचारिक धरातल पर रखा है। इसी संवेदनशील परिवेश के बीच जब कवि नारी के अंतर्मन की थाह लेता है, तो उसकी कविताएँ भावनाओं के ज्वार से भर जाती हैं। मन की अदम्य जिज्ञासा और ऊर्जा को व्यक्त करती हुई ये पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं:

0

री उठ, ओ मन की तरंग।

लहरों में भर गति उमंग ॥

मदुल स्वरों को सरसाती

ऊर्मि में घुल-मिल समाती…

0

‘मरु-थली’ शीर्षक कविता में कवि ने नारी के आंतरिक संताप और वेदना को अत्यंत खूबसूरती से शब्दों में ढाला है। जीवन के पथ पर आने वाले कंटक, राग-द्वेष और छल-छद्म की किरणें किस प्रकार प्राणों को विह्वल करती हैं, इसका जीवंत चित्रण इस खंड में देखने को मिलता है:

0

तप्त जीवन मरु-थली में

प्रिय, कौन-सा स्पर्श शीतल

हर लेगा ताप धरा का

जो बरस कर शांत निर्मल।

0

यही नहीं, नारी के नयन से बहने वाले अश्रु केवल पानी की बूंदें नहीं हैं, बल्कि वे उसके कठोर संघर्षों से तपे हुए अंतःकरण के वे मोती हैं जो उसकी आंतरिक शक्ति का परिचय देते हैं। ‘मोतियों से आँसू’ कविता में कवि ने बहुत ही दार्शनिक दृष्टिकोण से आँसुओं की सार्थकता को प्रतिपादित किया है:

0

आँसू देखे हैं तुमने

जो दृगों से हैं निकलते

मोतियों का रूप धरकर

हैं कपोलों में बिछलते।

0

संध्या की शांत बेला और जीवन का श्रम खंड-काव्य के आगे के पड़ाव में प्रकृति और मानव जीवन का अत्यंत रमणीय सामंजस्य दिखाई देता है। ‘संध्या’ कविता के माध्यम से कवि ने प्रकृति के परिवर्तनशील रूपों और परिश्रमी किसानों के जीवन की जीवंत झाँकी प्रस्तुत की है। दिनभर के प्रखर ताप और ऊर्जा के बाद जब संध्या अपनी काली झीनी चादर ओढ़कर धरा पर उतरती है, तो संपूर्ण परिवेश शांत और स्निग्ध हो उठता है:

0

फैला किरणों का प्रखर जाल।

यत्र-तत्र अंतरिक्ष में, उड़ रहीं रश्मियाँ अराल।

हरित वसन पहने द्रुमदल, कुसुम लता तरुण-तृमाल…

संध्या है बिखरा रही, काले केशों का तम-जाल

अस्ताचल को बनाकर ढाल।

0

आकृति प्रकाशन नयी दिल्ली से प्रकाशित इस कृति में कवि  की 44 काव्य रचनाएं  शामिल हैं। नारी की स्वानुभूत अभिव्यक्ति’ उपखंड के अंतर्गत संकलित ये रचनाएँ पाठक को आत्मावलोकन के लिए विवश करती हैं।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार के व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ पर एक दृष्टि ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ पुस्तक चर्चा 📖 डॉ कुंदन सिंह परिहार के व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ पर एक दृष्टि 🌿 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

ये इश्क़ नहीं आसाँ : व्यंग्य-संग्रह 🔥

लेखक: कुंदन सिंह परिहार

प्रकाशक: वर्जिन साहित्यपीठ

ई-मेल: virginsahityapeeth@gmail.com

प्रथम संस्करण: जून 2026

पृष्ठ संख्या: 157

मूल्य: ₹235.00

उपलब्धता: अमेज़न एवं फ्लिपकार्ट

डॉ कुंदन सिंह परिहार

वर्तमान परिवेश की विसंगतियों पर प्रहार करते सार्थक व्यंग्य 🔥

वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा जून 2026 में प्रकाशित व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कुंदन सिंह परिहार जी का सातवाँ व्यंग्य-संग्रह है। इसके अलावा, उनके सात कथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे 1960 के बाद से निरंतर कहानी और व्यंग्य लेखन कर रहे हैं।

पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है, “व्यंग्य लेखन एक सामाजिक उपक्रम है। यदि व्यंग्य समाज के लिए नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। व्यंग्य व्यक्तिगत शिकवा-शिकायत नहीं है, न ही वह मनोरंजन का साधन है। व्यंग्यकार अन्याय, अनीति के विरुद्ध समाज की पीड़ा को प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसलिए परसाई जी ने लिखा कि व्यंग्य हँसने-हँसाने की चीज़ नहीं है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरी संवेदना अभी जागृत है, क्योंकि मेरी दृष्टि में समाज में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान करता है और मुझे लिखने के लिए बाध्य करता है।”

इस संग्रह में उनकी अड़तालीस सामयिक और ताज़ातरीन रचनाएँ संकलित हैं। वर्तमान परिवेश की विसंगतियों को उन्होंने बारीकी से देखा, परखा है और उन पर अत्यंत परिपक्वता से प्रहार किया है। उनके लेखन में कहीं भी हल्के, कटु या कठोर शब्द नज़र नहीं आते। गहरी से गहरी और तीखी से तीखी बात भी वे बेहद सहजता से, मजे-मजे में बयाँ कर जाते हैं। जहाँ एक ओर वे अंग्रेज़ी के कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरी ओर ठेठ हिंदी और देहात के मुहावरों का भी। विषयवस्तु का चयन वे आसपास से और देश में घटित हो रही चिंताजनक घटनाओं से करते हैं। वे कपोल-कल्पित विषयों अथवा नॉन-इश्यूज़ पर बैठे-ठाले अपने तरकश के तीर व्यर्थ नहीं करते। न ही विशुद्ध हास-परिहास के लिए लेखन करते हैं। हरिशंकर परसाई की तरह उनका समग्र व्यंग्य-लेखन सार्थक और उद्देश्यपूर्ण है।

साहित्य से जुड़ाव के चलते, व्यंग्यकार का अन्य (तथाकथित) साहित्यकारों से गाहे-बगाहे मिलना-जुलना होता रहता है। व्यंग्यकार की पैनी दृष्टि सूक्ष्म अवलोकन करती रहती है। तत्पश्चात् इन निरीह प्राणियों पर हल्की-फुल्की फुहार करती है। कवियों का नामकरण, यथा—कवि कोमल प्रसाद ‘उदासीन’, झलकन लाल ‘अनोखे’, छोटेलाल ‘अनमने’, ‘निर्मम’ जी, ‘नश्तर’ जी और ‘खंजर’ जी—उन कवियों की साहित्य-साधना के विषय में काफी कुछ इंगित कर जाता है। व्यंग्यकार के शिल्प का विनोदपूर्ण पक्ष इन रचनाओं को पढ़ने के दौरान पाठक के मुख से स्मित-रेखा को लुप्त नहीं होने देता। ज्यों-ज्यों बात आगे बढ़ती है, विद्रूप की परतें भी खुलती जाती हैं। प्रथम कविता-संग्रह प्रकाशित होने पर, नए उभरते कवि को नगर के वरिष्ठ कवि किताब के विमोचन, उस पर चर्चा और उसके प्रचार विषयक समझाइश देते हुए कहते हैं, “भैया, किताब के कर्मकांड के लिए लोग अपने प्रोविडेंट फंड का पैसा खर्च कर देते हैं, बेटी के ब्याह के लिए रखा पैसा समर्पित कर देते हैं…”

परिहार जी का लेखन मल्टी-डाइमेंशनल है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टि है, इतिहास-बोध है, देश-विदेश की घटनाओं का समावेश है और साहित्यिक गहराई भी है। वे गहन चिंतक और विचारक हैं, जो आवश्यकतानुसार दोहरे चरित्रों की साहित्यिक शल्य-चिकित्सा भी करते हैं। उनकी एक रचना प्रकृति की ‘फूड चेन’ यानी आहार-श्रृंखला पर केंद्रित है, जिसके अनुसार पोषक-तत्व और ऊर्जा का स्थानांतरण पहले जीव से दूसरे जीव में हो जाता है। इसका विस्तारपूर्वक वैज्ञानिक विवरण देने के उपरांत उनका व्यंग्यकार प्रकट होता है। वे कहते हैं, मनुष्य अन्य जीवों की तुलना में अधिक बुद्धि-संपन्न प्राणी है। प्रकृति द्वारा निर्मित आहार-श्रृंखला से उसका मन नहीं भरता। मनुष्य के द्वारा निर्मित आहार-श्रृंखला में उत्पादक से ऊर्जा और पोषण का संग्रह सबसे निचले अधिकारी या सबसे ऊपर के अधिकारी के द्वारा किया जाता है। मुझे लगता है, यह एक अद्भुत व्यंग्य-रचना है।

व्यंग्य-संग्रह में सर्वाधिक संख्या में व्यंग्य धार्मिक आडंबर और पाखंड पर केंद्रित हैं। वर्तमान राजनीतिक परिवेश में जिस तरह के मिथ्या और बड़बोले धर्मचक्र का प्रवर्तन हो रहा है, उससे व्यंग्यकार खासा उद्वेलित लगते हैं। उन्होंने मिथ्याचार का पर्दाफाश करने में कतई कोई मुरव्वत नहीं की है। बाबाओं और अंधभक्तों के हास्यास्पद क्रियाकलापों पर कटाक्ष करते हुए, आस्था का विज्ञान-सम्मत विश्लेषण किया है। स्वर्ग और नर्क, पाप और पुण्य, और आस्तिक और नास्तिक की मान्यताओं को लेकर कुछ-कुछ फंतासी के अंदाज़ में, या भगवान विष्णु से सीधे संवाद की शैली में लिखी गई रचनाएँ आनंदित करती हैं। धार्मिक मिथ्याचार को लेकर उनका आक्रोश बहुत गहरा है, जो बार-बार उनको इस पर कलम से प्रहार करने के लिए बाध्य करता है।

इसके अलावा, उन्होंने राजनेताओं के मूल चरित्र और भ्रष्टाचार को भी खूब अच्छी तरह पहचाना है और छुटभैया नेताओं से लेकर स्थापित नेताओं की खूब खबर अपने व्यंग्यों में ली है। विदेशों में बसे प्रवासियों के “रूट्स” की उथली तलाश पर भी उन्होंने कटाक्ष करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शीर्षक व्यंग्य ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ प्रेम और विवाह की सामयिक विडंबनाओं की ओर इंगित करता है। आज के सामाजिक परिवेश और कुछेक लोगों के विचित्र व्यवहार पर भी उन्होंने सटीक एवं सार्थक प्रहार किए हैं। इनका पूर्ण आनंद तो उन व्यंग्य-रचनाओं को डूबकर पढ़ने में ही आएगा, जैसी कि अंग्रेज़ी में कहावत है—The proof of the pudding is in the eating.

पुस्तक के अंत में, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई पर केंद्रित एक संस्मरण है। परिहार जी नियमित रूप से उनसे मिलने उनके आवास पर जाते थे। परसाई जी को याद करते हुए, वे लिखते हैं, “मैंने महसूस किया कि परसाई जी के संपर्क में आने से व्यक्ति का जीवन प्रभावित और परिवर्तित होता था। उनके जीवन को देखने और उनके साथ उठने-बैठने से व्यक्ति अनेक क्षुद्रताओं से मुक्त हो जाता था। उसके लिए उन मार्गों को अपनाना भी कठिन हो जाता था जो आज ऊपर पहुँचने की आसान सीढ़ी माने जाते हैं। मेरे जीवन पर परसाई जी की जो छाप पड़ी वह शायद अंत तक कायम रहेगी।”

डॉ. कुंदन सिंह परिहार का जीवन सादगीपूर्ण और आडंबर-रहित है। वे स्पष्टवादिता और विद्वतापूर्ण ढंग से अपनी बात रखते हैं। अंग्रेज़ी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने डॉक्टरेट और लॉ की उपाधियाँ भी प्राप्त कीं। लम्बे समय तक अध्यापन करने के बाद वे प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्हें मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के वागीश्वरी सम्मान और भवभूति अलंकरण के अलावा अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करे। उनका रचनाकर्म इसी तरह निर्बाध चलता रहे और उनका स्नेह एवं आशीर्वाद हमें मिलता रहे।

—

©  जगत सिंह बिष्ट 🔥

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
1

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१५ ☆ “MAYA: Seed Takes Root” – लेखक : Anand Gandhi और Zain Memon ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है Anand Gandhi और Zain Memon द्वारा लिखित  “MAYA: Seed Takes Root” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१५ ☆

☆ “MAYA: Seed Takes Root” – लेखक : Anand Gandhi और Zain Memon ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆

इन  दिनों चर्चित किताब – MAYA: Seed Takes Root 

लेखक – Anand Gandhi और Zain Memon

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ यह 2026 में प्रकाशित होने वाला एक महत्वाकांक्षी साइंस फिक्शन, फैंटेसी और दर्शन का मिश्रण है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किताब की मूल परिकल्पना

कहानी का संसार है Neh नाम का एक ग्रह। वहाँ Maya कोई सामान्य पेड़ या जंगल नहीं, बल्कि एक विशाल जीवित नेटवर्क है। पूरे ग्रह के लोग इन पेड़ों से जुड़ते हैं और उनके माध्यम से काम, मनोरंजन, शिक्षा, स्मृतियों और साझा स्वप्नों की दुनिया में प्रवेश करते हैं।

सबसे रोचक बात यह है कि Maya हर व्यक्ति के बारे में जानती है। उसकी स्मृतियाँ, विचार और व्यवहार इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं। इस विशाल डेटा के आधार पर वहाँ के शासक, जिन्हें Divyas कहा गया है, भविष्य की घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं और लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

अर्थात यह केवल भविष्य की काल्पनिक दुनिया नहीं है। इसके भीतर आज की दुनिया का इंटरनेट, सोशल मीडिया, बिग डेटा, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिखाई देता है।

कहानी का केंद्रीय पात्र Yachay, 19 वर्षीय युवक है। वह अपने बीमार दादा Daddu के साथ अलगाव में पला है और उसने कभी Maya नेटवर्क से जुड़कर जीवन नहीं बिताया।

इसका एक अप्रत्याशित परिणाम है।

Maya उसे देख नहीं सकती।

जिस समाज में हर व्यक्ति नेटवर्क से जुड़ा है, वहाँ Yachay का Maya से बाहर होना उसे लगभग अदृश्य बना देता है। उसके दादा चाहते हैं कि वह Divya Trials में भाग ले। यह ऐसी प्रतियोगिता है जिसमें अरबों लोग भाग लेंगे और विजेता को लगभग देवत्व जैसी शक्ति और अमरता प्राप्त हो सकती है।

यहीं से कहानी एक बड़े प्रश्न में बदल जाती है, अगर किसी ऐसी व्यवस्था में जहाँ हर व्यक्ति को पूरी तरह देखा, समझा और भविष्यवाणी किया जा सकता हो, कोई व्यक्ति उस व्यवस्था की निगाह से बाहर हो जाए, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र हो सकता है?

विषय बहुत समकालीन है

मुझे लगता है कि इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी कथा से भी अधिक इसका वैचारिक आधार है।

लेखक स्वयं इसे systems fiction कहते हैं, अर्थात ऐसी कथा जिसमें केवल व्यक्ति या घटनाएँ नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था कहानी का पात्र बन जाती है।

पुस्तक कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है।

हमारी सूचनाओं का मालिक कौन है?

हमारे डेटा से लाभ कौन कमाता है?

अगर कोई प्रणाली हमारे व्यवहार का अनुमान हमसे पहले लगा सके तो हमारी स्वतंत्र इच्छा कितनी स्वतंत्र रह जाएगी?

क्या भविष्य को जान लेना भविष्य को नियंत्रित करने के बराबर है?

आज जब सोशल मीडिया एल्गोरिदम यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि हमें क्या पसंद आएगा, कौन सी खबर हम पढ़ेंगे और कौन सा विज्ञापन हमें प्रभावित कर सकता है, तब Maya का विचार अचानक बहुत काल्पनिक नहीं लगता।

Anand Gandhi भारतीय सिनेमा के महत्वपूर्ण प्रयोगधर्मी फिल्मकारों में हैं। उनकी फिल्म Ship of Theseus को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था और Tumbbad ने भारतीय मिथक, हॉरर और आधुनिक सिनेमा के मेल का एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया।

उनकी रुचि केवल फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं रही है। वे दर्शन, विज्ञान, तकनीक, गेम डिजाइन और वैकल्पिक कथा संरचनाओं में भी काम करते रहे हैं। यही पृष्ठभूमि इस उपन्यास में दिखाई देती है।

दूसरे लेखक Zain Memon गेम डिजाइनर और ट्रांसमीडिया क्रिएटर हैं। उनके प्रसिद्ध राजनीतिक रणनीति बोर्ड गेम SHASN और SHASN: AZADI ने राजनीति, खेल और सामाजिक शिक्षा को जोड़ने का प्रयोग किया है।

 यह पुस्तक दो लेखकों द्वारा लिखा गया सामान्य साइंस फिक्शन उपन्यास मात्र नहीं है। इसके पीछे फिल्म, गेम, मिथक, दर्शन और तकनीक का मिला-जुला रचनात्मक अनुभव है।

पुस्तक पश्चिमी साइंस फिक्शन की नकल करने के बजाय South Asian mythology को आधुनिक विज्ञान और तकनीकी कल्पना के साथ जोड़ती है। नामों में भी इसका संकेत मिलता है, जैसे Maya, Divya, Yachay, Kshar, Tarkash आदि।

इस तरह इसकी कल्पना कु छ ऐसी बनती है जिसमेंप्राचीन मिथकीय संसार, आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दर्शन और राजनीतिक सत्ता एक ही कथा संसार में आ जाते हैं।

यही शायद इस पुस्तक को भारतीय लेखकों द्वारा लिखे जा रहे समकालीन speculative fiction के संदर्भ में खास बनाता है।

शीर्षक: MAYA: Seed Takes Root

लेखक: Anand Gandhi और Zain Memon

श्रृंखला: MAYA, Book 1

भाषा: अंग्रेजी

विधा: Science Fiction, Fantasy, Dystopian Fiction, Epic Fantasy

 लगभग 416 पृष्ठ

प्रकाशक: Authors Equity

वितरण: Simon & Schuster

ISBN: 9798893311891

Foreword: Neuroscientist Anil Seth

Audiobook narrator: Hugo Weaving

पुस्तक का ऑडियो संस्करण 25 अगस्त 2026 से उपलब्ध होने की जानकारी प्रकाशक ने दी है, जबकि ब्रिटेन में हार्डकवर संस्करण की सूचीबद्ध रिलीज़ 8 अक्टूबर 2026 है।

इस किताब की चर्चा का एक बड़ा कारण इसका crowdfunding भी है। प्रकाशक इसे crowdfunding इतिहास का highest-funded debut novel बता रहा है।

यह अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि पाठक अब केवल पारंपरिक प्रकाशकों के माध्यम से आने वाली कहानियों का इंतजार नहीं कर रहे। किसी बड़े साहित्यिक प्रोजेक्ट के निर्माण में पाठक स्वयं शुरुआती निवेशक और समुदाय का हिस्सा बन रहे हैं।

 MAYA में भारतीय मिथकीय संकेतों को भविष्य की तकनीकी सभ्यता के प्रश्नों के साथ जोड़ा गया है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ मीना भट्ट सिध्दार्थ का दोहा संग्रह – सुधियों में सिध्दार्थ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ मीना भट्ट सिध्दार्थ का दोहा संग्रह – सुधियों में सिध्दार्थ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆

साहित्य जब केवल कल्पना न रहकर जीवन के गहनतम अनुभवों, अश्रुओं और आत्मीय स्मृतियों का प्रतिरूप बन जाता है, तब वह कालजयी कृति का रूप ले लेता है। आदरणीय मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ जी द्वारा रचित दोहा संग्रह ‘सुधियों में सिद्धार्थ’ एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी साहित्यिक संचेतना है। यह पुस्तक केवल छंदों का संकलन नहीं है, बल्कि एक माँ के हृदय का वह हाहाकार और वात्सल्य है, जो अपने प्रिय पुत्र ‘सिद्धार्थ’ की असामयिक विदाई के बाद स्मृतियों के कल्पतरु के रूप में पल्लवित हुआ है। लेखिका ने अपने जीवन की सबसे बड़ी रिक्ति को साहित्यिक सृजन का माध्यम बनाकर पुत्र को एक अनूठी काव्यांजलि अर्पित की है।

पुस्तक के प्रारंभिक पृष्ठों में समाहित आत्मकथ्य पाठकों को लेखिका के गरिमामयी व्यक्तित्व और उनके पारिवारिक परिवेश से परिचित कराता है। 30 अप्रैल 1953 को छतरपुर जिले की नौगांव तहसील में जन्मी मीना भट्ट जी ने न्यायिक सेवा में व्यवहार न्यायाधीश से लेकर जिला न्यायाधीश के पद पर कार्य करते हुए समाज को न्याय दिया। जीवन के उत्तरार्ध में जबलपुर संभाग की लोकायुक्त कमेटी की चेयरपर्सन जैसे उच्च पदों को सुशोभित करने वाली लेखिका का अंतर्मन सदैव साहित्यिक संवेदनाओं से ओतप्रोत रहा। 3 अप्रैल 2022 का वह निष्ठुर दिन, जिसने उनके युवा पुत्र डॉ. सिद्धार्थ को उनसे छीन लिया, लेखिका के जीवन का सबसे अंधकारमय मोड़ था। इस अपार शोक को उन्होंने दोहों की साधना में बदला। पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर अंकित ये पंक्तियाँ हृदय को झकझोर देती हैं:

0

“बसे क्षितिज के पार तुम, भूल गए सिद्धार्थ।

अब जीवन यह बोझ है, क्या साउथ क्या नार्थ।।”

0

‘सुधियों में सिद्धार्थ’ मुख्य रूप से दोहा विधा पर आधारित है। दोहा अर्ध-सम मात्रिक छंद है, जिसके शिल्प विधान और मात्राओं के नियम का लेखिका ने पूर्ण अनुशासन के साथ पालन किया है। पुस्तक की भाषा तत्सम प्रधान, सुबोध और गंभीर है। छंदों में गेयता, प्रवाह और रसात्मकता का ऐसा अनूठा संगम है कि पाठक स्वतः ही भाव-प्रवाह में बह जाता है। किताब की शुरुआत ‘गणपति’, ‘श्री राम’ और ‘नौ देवियाँ’ जैसी मंगлаचरण की अनूठी रचनाओं से होती है, जो भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को प्रदर्शित करती हैं। ‘गणपति’ वंदना का यह रूप द्रष्टव्य है:

0

“वक्रतुंड गणपति सतत, मंगलकारी नाथ।

लंबोदर गजमुख सदा, मोदक प्रिय है हाथ।।”

0

वहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम को याद करते हुए वे लिखती हैं:

0

“धनुष-बाण है हाथ में, तिलक लगा है भाल।

कमलनयन मोहित करें, आज्ञाकारी लाल।।”

0

लेखिका केवल व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि जीवन के शाश्वत सत्यों, साहित्य की शक्ति और दार्शनिकता पर भी अपनी कलम चलाती हैं। ‘शब्द’ शीर्षक के अंतर्गत वे शब्दों की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहती हैं:

0

“तौल मोल के बात हो, शब्द बड़े अनमोल।

मिश्री सम मीठे रहें, बोल सुधा सम बोल।।”

0

इसी प्रकार ‘वेद’ और ‘दिनमान’ पर लिखे गए दोहे सृष्टि की ऊर्जा, ज्ञान और चेतना को समर्पित हैं। वे प्रकृति को संपूर्ण जगत की आत्मा के रूप में देखते हुए लोक-कल्याण की भावना व्यक्त करती हैं:

0

“कर सेवा निस्वार्थ भी, प्रेम रखो भरपूर।

रवि सम करो प्रकाश तुम, रहो दंभ से दूर।।”

0

‘सुधियों में सिद्धार्थ’ एक माँ के अश्रुओं से धुला हुआ वह दर्पण है, जिसमें जीवन की नश्वरता और वात्सल्य की अमरता एक साथ दिखाई देती है। मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ जी ने अपनी न्यायिक तार्किकता और काव्यात्मक कोमलता का जो संतुलन यहाँ प्रस्तुत किया है, वह अद्भुत है। यह कृति हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से दोहा लेखन की परंपरा को समृद्ध करती है और पाठकों के दिलों में एक स्थायी संवेदना छोड़ जाती है। यह पुस्तक हर उस सुधी पाठक के लिए संग्रहणीय है जो शब्दों में छिपे जीवन-दर्शन और आत्मीय संबंधों की गहराई को महसूस करना चाहता है।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares