हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१४ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१4 ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला

लेखक – अरविंद तिवारी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ श्रीमती अनुराधा गर्ग दीप्ति की कृति – युवान ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

श्रीमती अनुराधा गर्ग दीप्ति की कृति – युवान ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत)

बालमन और किशोरवय की भावनाएं मिट्टी के उस लोंदे की तरह होती हैं, जिसे सही समय पर यदि सही आकार न मिले, तो भविष्य की संरचना अधूरी रह जाती है। इसी पावन और महती उद्देश्य को केंद्र में रखकर पाथेय प्रकाशन, जबलपुर से प्रकाशित कवयित्री श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ की नव-प्रकाशित कृति ‘युवान’ (बाल-किशोरी गीतमाला) साहित्य जगत में एक अत्यंत स्वागतयोग्य और श्लाघनीय हस्तक्षेप है। यह पुस्तक मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी के नैतिक, चारित्रिक और सामाजिक परिष्कार का एक सशक्त माध्यम है। कवयित्री स्वयं एक आदर्श शिक्षिका रही हैं, और उनके लंबे शैक्षणिक जीवन का व्यावहारिक अनुभव इस पुस्तक के पृष्ठ-पृष्ठ पर पूरी प्रामाणिकता के साथ झलकता है। उन्होंने बच्चों के आसपास के परिवेश और उनके बौद्धिक स्तर को बहुत सूक्ष्मता से समझा है। जैसा कि आचार्य भगवत दुबे जी ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही रेखांकित किया है कि ये रचनाएं बच्चों को अनेक बुराइयों एवं कुरीतियों से बचाकर उनमें उच्च मानवीय संस्कारों का अनवरत पोषण करती हैं।

साहित्यिक दृष्टि से दीप्ति जी ने ‘युवान’ को छह वैविध्यपूर्ण भागों में विभक्त किया है, जिसमें धर्म-ज्ञान, प्रखर देशभक्ति, आधुनिक शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महापुरुषों के प्रेरक व्यक्तित्व और तत्कालीन सामाजिक यथार्थ का अनूठा ताना-बाना बुना गया है। बाल-मनोविज्ञान के धरातल पर अवस्थित होकर रची गई इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता इनकी ‘गेयता’, प्रांजलता और भाषा की अत्यंत सरल बोधगम्यता है। पुस्तक में प्रकृति प्रेम और वसुंधरा के संरक्षण को लेकर कवयित्री का मन उद्वेलित हो उठता है, और वे ‘करो श्रृंगार धरती का’ कविता में नई पौध को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए लिखती हैं:

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“सँवारोगे, सजाओगे,

बचाओगे इसे हर दिन।

ये ऋण माँ का उऋण होने का,

फिर आह्वान देती है।”

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‘युवान’ के अंतस में राष्ट्रीय चेतना और स्वदेश-अनुराग का स्वर अत्यंत प्रखर और मुखर है। ‘स्वर्णिम भारत’ और ‘ये भारत देश हमारा’ जैसी रचनाएं नई पीढ़ी के भीतर अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति के प्रति अगाध गौरव का संचार करती हैं। आज के वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्र को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का स्वप्न इन भव्य पंक्तियों में जीवंत हो उठता है:

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“विश्व शक्ति का प्रतीक,

परिश्रमी, बुद्धिमान।

शिक्षा की अलख से,

विश्व हो प्रकाशवान।

विश्व गुरु बने भारत,

एक साथ राष्ट्र गान गाइए।”

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कवयित्री केवल अतीत के वैभवशाली इतिहास के गौरवगान तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखतीं, बल्कि वर्तमान समाज में फैली विसंगतियों जैसे भ्रष्टाचार पर भी निर्भीकता से चोट करती हैं। वे भावी कर्णधारों को जागरूक करते हुए एक दृढ़ संकल्प की ओर प्रेरित करती हैं:

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“भ्रष्टाचारी का दलदल,

फैला है इतना ज्यादा।

इसे मिलकर दूर करेंगे,

हम सबका है यह वादा।”

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भारतीय संस्कृति की शाश्वत उत्सवधर्मिता, अनेकता में एकता और सर्वधर्म समभाव का पावन संदेश इस कृति की मूल आत्मा है। ‘उत्सवधर्मी देश मेरा’ जैसी कविताओं के माध्यम से अनुराधा जी बच्चों को बहुत ही सहज और आत्मीय ढंग से देश की सांप्रदायिक समरसता का पाठ पढ़ाती हैं:

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“सनतनी है संस्कृति अपनी

भारत भूमि माता अपनी।

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई

आपस में है भाई-भाई।”

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इसके अतिरिक्त, इस संकलन में समसामयिक और प्रासंगिक आधुनिक विषयों को भी अत्यंत कलात्मकता से स्थान दिया गया है। डिजिटल साक्षरता, ‘डिजीलेप’, ‘व्हाट्सएप असेसमेंट’ और ‘कोरोनाकाल की ऑनलाइन क्लास’ जैसी नवीनतम व्यावहारिक परिस्थितियों को गीतों के सांचे में ढालकर रचनाकार ने यह अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है कि बाल-साहित्य को केवल परियों की कहानियों तक सीमित न रहकर समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।

साहित्यिक भाषा की प्रांजल तरलता, सुरुचिपूर्ण शब्द-चयन और भावों का विलक्षण सौष्ठव ‘युवान’ को एक अत्यंत मूल्यवान और संग्रहणीय कृति बनाता है। जैसा कि पुस्तक के संयोजक राजेश पाठक ‘प्रवीण’ जी ने पूर्णतः सटीक लिखा है, यदि शिक्षक-शिक्षिकाएं और अभिभावक इन प्रेरक कविताओं से विद्यार्थियों को परिचित कराएं, तो यह बाल-चेतना के उन्नयन और राष्ट्र-निर्माण में एक महती पुण्य का कार्य होगा। श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ जी का यह सुप्रयास बालकों की नैसर्गिक जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान भी करता है और उनके अंतर्मन को राष्ट्र-प्रेम की पावन ज्योति से आलोकित भी करता है। बाल और किशोर मनोविज्ञान को समृद्ध करती यह कृति हिंदी बाल-साहित्य की एक अमूल्य धरोहर सिद्ध होगी, जो हर संवेदनशील पाठक और शिक्षार्थी के अंतस को गहराई से छुएगी।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(एक साहित्यिक मूल्यांकन)

आचार्य भगवत दुबे हिन्दी के एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। प्रचार प्रसार से दूर वे एक मौन साधक हैं और उन्होंने न केवल काव्य के कथ्य शिल्प को नये नये रुपों में संजाया संवारा है बल्कि महाकाव्य से लेकर मुक्तक -गजल तक को अपनी लेखनी का पाटल -स्पर्श। प्रदान किया है।

सुविख्यात कवि श्री नीरज की इस प्रभावी प्रतिक्रिया का उल्लेख किया था सुप्रसिद्व कवि श्री चन्द्रसेन विराट ने राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले श्रद्धेय कवि आचार्य भगवत दुबे की काव्य कृति कांटे हुए किरीट में। कवि चन्द्रसेन विराट ने कवि नीरज की इस बात का उल्लेख करते हुए अपनी मंगल कामनाओं में अपनी जो बात इस काव्य पुस्तक में शामिल की वह भी आचार्य जी के काव्य को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए काफी है। वे कहते हैं कि यह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, कथाकार कितनी दिशाओं में एक साथ रचनारत रहा है, यह जानकर सुधी पाठक चकित रह जाता है। इसी कृति में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य सृजन से प्रभावित होकर एक और राष्ट्रीय कवि श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने भी लिखा है कि कवि में अपनी कल्पनाओं को रुपक में डालने की विशेष प्रवृत्ति। दिखाई पड़ती है। भाषा में प्रवाह है और अच्छे प्रयोग देखने को मिलते हैं। उन्होंने लिखा है कि अधिकांश कविताएं उपदेशात्मक और शोषण, अन्याय एवं सांप्रदायिक संकीर्णता के विरोध में है। तदर्थ इन रचनाओं का विशेष महत्व है।

आचार्य जी की इस कृति में अधिकांश कविताएं कृषकों और ग्रामीणों के दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित हैं। दरअसल आचार्य जी स्वयं भी गांव की सोंधी महक में पले बढ़े ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को न केवल अपने आस पास देखा है बल्कि उसे बड़ी गहराई से महसूस भी किया है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में यह बात बड़ी साफ तौर पर देखी जा सकती है। जैसे –

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न्याय मांगने, गांव हमारे, जब तहसील गये,

न्यायालय, खलिहान खेत, घर गहनें लील गये।

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और कवि जब ऐसी विषम परिस्थितियों से पीड़ित जनमानस को, परेशान देखता है तो अपनी कविता में आवेश मिश्रित सीख भी देता है –

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अहंकार, अन्याय रौंदता फिरे जहां जन जीवन को

हे धिक्कार, अनीति सहन करने वाले, नर यौवन को

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आचार्य जी की कविताओं में शोषण के प्रति चिंता तो है लेकिन वे निराश नहीं है। उनका आशावादी दृष्टिकोण उनकी कविताओं में साफ साफ नजर आता है –

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संकल्पों की दीप्त प्रभा से सुखद सवेरा लाना है,

लेकर नयी उमंग, निराशाओं का तिमिर हटाना है।

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गांवों की गरिमामयी संस्कृति और पावन संस्कारों का महत्व भी आचार्य जी की कविताओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, एक कविता में वे लिखते हैं –

पलक पांवड़े, जहां अतिथियों की

 खातिर बिछ जाते हैं,

नगरवासियों चलो तुम्हें,

 हम अपने गांव दिखाते हैं।

आचार्य जी को विरासत में मिले यही पावन संस्कार समाज के लिए प्रेरणा का विषय हो सकते हैं। जीवन में मातृ भक्ति का सिध्दांत उनके लिए सर्वोपरि था और इसकी झलक उनकी कविताओं में दिखाई देती है –

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टूटी कुटिया के भीतर जब शीश झुकाकर मैं जाता हूं,

मां के ममतालू चरणों में, मंदिर जैसा सुख पाता हूं।

0

वर्ष 2001 में प्रकाशित राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक, और ग्रामीण परिवेश की 68 कविताओं के इस संग्रह में आचार्य जी की प्रेरक सोच वाली ऐसी काव्य रचनाएं शामिल हैं जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक हैं तभी तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और पाथेय के संस्थापक स्व. डा. राजकुमार सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि-  कवि आचार्य भगवत दुबे संस्कारधानी जबलपुर के ऐसे स्वनामधन्य साहित्य साधक हैं जिनके विविध वर्णी कृतित्व की यश सुरभि विंध्य -सतपुडा के शैल‌ शिखरों को लांघ कर भारत व्यापिनी हो गयी है।

आज हम सभी गौरवान्वित हैं कि। श्रद्धेय सुमित्र जी की इस बात से पूरा साहित्यिक क्षेत्र सहमत है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१३ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१३ ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी की कृति पर विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक चर्चा

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों लंदन में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ साहित्य भूषण महाकवि आचार्य भगवत दुबे व्यक्तित्व एवं कृतित्व – संपादक डा . संध्या जैन ‘श्रुति’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ साहित्य भूषण महाकवि आचार्य भगवत दुबे व्यक्तित्व एवं कृतित्व – संपादक डा . संध्या जैन ‘श्रुति’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(एक साहित्यिक मूल्यांकन)

संस्कारधानी जबलपुर की उर्वरा साहित्यिक धरा पर जिस कालजयी प्रतिभा का उदय हुआ, वे हैं महाकवि आचार्य भागवत दुबे। एक ऐसा रचनाकार, जिसका संपूर्ण जीवन साहित्य की आराधना और लोक-मंगल के समर्पण में व्यतीत हुआ। यह व्यक्तित्व मात्र एक कवि का नहीं, अपितु उन मानवीय संवेदनाओं के संवाहक का है, जो शब्दों के माध्यम से समाज को नई दिशा और दृष्टि प्रदान करता है।

डा . संध्या जैन ‘श्रुति’

आचार्य दुबे का कृतित्व अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। हिंदी काव्य और गद्य की लगभग सभी विधाओं—गीत, नवगीत, दोहे, कुंडलियाँ, मुक्तक, गजल, बालगीत, हाइकू, कहानी और महाकाव्य—पर उनका समान अधिकार है।

पिछले कुछ दिनों पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रपति प्राप्त पुरस्कार शिक्षा विद डा. संध्या जैन श्रुति के कुशल और सफल संपादन में श्रद्धेय आचार्य जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर एक संग्रहणीय ग्रंथ का प्रकाशन किया गया। डा. संध्या जैन श्रुति एवं उनके संपादक मंडल के सुयोग्य सदस्यों श्री राजेश पाठक प्रवीण, डा.अभिजात कृष्ण त्रिपाठी, डा.डी .सी . जैन, श्री अशोक मनोध्या, डाअरुणा पांडेय, डा.श्याम मनोहर सिरोठिया, श्री मथुरा जैन उत्साही, श्री राजेन्द्र मिश्रा, श्री आशुतोष तिवारी, श्री सोहन परौहा सलिल, डा . अनिल कोरी, डा.मोहन तिवारी आनंद के महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं सराहनीय प्रयासों से 404 पृष्ठों का यह शोध परक ग्रंथ आचार्य जी की साहित्य साधना पर आधारित साहित्य जगत की एक स्मरणीय और संग्रहणीय प्रस्तुति सिद्ध होगी ऐसी मेरी ही नहीं बल्कि साहित्यिक क्षेत्र के सुधी पाठक वर्ग की सार्थक सोच है।

राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले आचार्य भगवंत दुबे जी ने गद्य और पद्य दोनों ही में काफी लिखा है काफी अच्छा लिखा है और उनकी अभी तक शताधिक कृतियां प्रकाशित भी हो चुकी हैं और चर्चित भी।

आचार्य जी की सशक्त लेखनी से उपजी प्रत्येक पंक्ति आज साक्षात् अनुभूति का प्रमाण है। ‘दधीचि’ जैसा महाकाव्य उनके गंभीर चिंतन, सूक्ष्म शोध और निरंतर साधना का प्रतिफल है, जिसने उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उनका साहित्य केवल बाह्य सृजन नहीं, अपितु अंतस की वह निस्पृह साधना है, जो प्रकृति के मोहक परिवेश और सामाजिक यथार्थ के बीच एक सेतु का कार्य करती है।

उनकी रचनाधर्मिता में राष्ट्रीय चेतना, मानवतावाद और लोक-सरोकारों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। वे बुंदेली जन-संस्कृति के वाहक हैं, जो लोक-भाषा की मिठास और भावों की गहराई को मानक हिंदी की गंभीरता के साथ पिरोने में सिद्धहस्त हैं। उनके साहित्य में व्याप्त ‘रस-शृंगार’ और ‘लोक-संवेदना’ का अनूठा मिश्रणu पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है। वे एक ऐसे ‘लोक-मंगल’ के कवि हैं, जिन्होंने जीवन के कटु सत्य और विसंगतियों पर प्रहार करते हुए भी सदैव मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा है।

आचार्य दुबे का साहित्य सृजन समय की वह उत्कृष्ट पहचान है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। उन्होंने केवल काल को शब्दों में नहीं बाँधा, बल्कि काल के प्रवाह में मानवता के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी किया है। यह कृतित्व उनकी उस विराट सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना निहित है। सरल, सौम्य और बहुभाषी व्यक्तित्व के धनी आचार्य जी का संपूर्ण जीवन ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का साक्षात उदाहरण है।

(चित्र – फेसबुक से साभार)

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१२ ☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

ज प्रस्तुत है श्री अखंड गहमरी जी द्वारा लिखित  “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१२ ☆

☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)

लेखक – अखंड गहमरी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ मुख्य विषय : यात्रा, प्रकृति, संस्कृति, लोकजीवन एवं मानवीय संवेदनाएँ– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह किताब यात्रा के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य का सजीव चित्रण, स्थानीय समाज और जीवन-मूल्यों का सजीव परिचय, अनुभव प्रधान एवं संवेदनशील रोचक पठनीय अभिव्यक्ति, यात्रा, संवेदना और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है।

प्रारंभिक पृष्ठों से ही यह किताब स्पष्ट संकेत देती है कि यह केवल पर्यटन-वृत्तांत नहीं, बल्कि अनुभवों, संस्कृतियों और मानवीय संवेदनाओं का संग्रह योग्य दस्तावेज़ है।  लेखक ने यात्रा को मनोरंजन या स्थल-दर्शन तक सीमित न मानकर जीवन को समझने का माध्यम माना है। अनुक्रम पर दृष्टि डालने से ही स्पष्ट होता है कि पुस्तक में विभिन्न स्थलों, प्रसंगों और अनुभवों को क्रमबद्ध रूप से स्वतंत्र अध्यायों में अभिव्यक्त किया गया है। यह संरचना पाठक को यात्रा के विविध आयामों से हिस तरह परिचित कराती है, मानो वह स्वयं सहयात्री है।

लेखक की दृष्टि केवल प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक स्थान के सांस्कृतिक परिवेश, वहाँ के लोगों के जीवन, उनकी परम्पराओं तथा मानवीय संबंधों को भी समान महत्त्व देती है। इसी कारण पुस्तक का स्वर केवल विवरणात्मक न होकर अनुभवात्मक और चिंतनपरक है। लेखक पाठक को यह अनुभव कराता है कि यात्रा का वास्तविक अर्थ बाहरी संसार को देखने के साथ-साथ उन संदर्भों में स्वयं के भीतर झाँकना भी है।

भाषा की दृष्टि से पुस्तक अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय शैली में लिखी हुई है। लेखक अनावश्यक शब्दाडम्बर से बचते हुए सरल शैली में अपने अनुभवों को व्यक्त करता है। वर्णन में दृश्यात्मकता इतनी प्रभावी है कि पाठक स्वयं को यात्रा का सहभागी अनुभव करने लगता है। प्रकृति, पर्वत, मार्ग, स्थानीय वातावरण और जनजीवन के चित्रण में गहमरी जी की संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है।

पुस्तक के स्पष्ट रूप से पठनीय अंशों में लेखक का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है— “यात्राएँ मनुष्य को केवल नए स्थानों से नहीं, नए अनुभवों से भी परिचित कराती हैं।” यह वाक्य सम्पूर्ण पुस्तक की मूल चेतना को अभिव्यक्त करता है। लेखक के अनुसार यात्रा का वास्तविक लाभ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि अनुभवों का विस्तार है। यही अनुभव व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं और उसे जीवन के विविध रूपों को समझने की क्षमता प्रदान करते हैं।

इसी तरह उनका उल्लेखनीय कथन है— “प्रकृति के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने भीतर की शांति को पहचानने लगता है।” इस विचार में लेखक की प्रकृति-दृष्टि निहित है। प्रकृति यहाँ केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का आधार बनकर उभरती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।

पुस्तक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक स्थानीय संस्कृति को बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग, उनकी जीवनशैली, व्यवहार, परम्पराएँ और सामाजिक मूल्य लेखक के वर्णन में स्वाभाविक रूप से समाहित होते हैं। इससे पुस्तक केवल स्थानों का परिचय देने वाली रचना नहीं रह जाती, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ग्रहण कर लेती है।

शिल्प की दृष्टि से पुस्तक वर्णनात्मक और संस्मरणात्मक शैली का सफल समन्वय प्रस्तुत करती है। घटनाओं का क्रम स्वाभाविक है तथा प्रत्येक प्रसंग अपने आप में पूर्ण प्रतीत होता है। भाषा में आत्मीय संवाद का गुण है, जिससे पाठक लेखक के अनुभवों से सहज रूप से जुड़ जाता है।

यह कृति यात्रा-साहित्य की उस राहुल सांस्कृतायायन परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें यात्रा केवल स्थानों का भ्रमण नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और जीवन-दृष्टि की खोज है। लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठक को यह विश्वास दिलाता है कि प्रत्येक यात्रा मनुष्य को कुछ नया सिखाती है और उसके व्यक्तित्व को समृद्ध बनाती है।

समग्रतः यह पुस्तक यात्रा, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का संतुलित एवं प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करती है। इसकी सरल भाषा, आत्मीय अभिव्यक्ति, अनुभवों की प्रामाणिकता तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण इसे एक पठनीय और संग्रहणीय कृति बनाते हैं। यात्रा-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक केवल जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि संवेदनात्मक अनुभवों की ऐसी यात्रा है जो पाठक को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के संसार से भी परिचित कराती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ काव्य कृति –  सपनों के गांव में – कविवर – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ काव्य कृति –  सपनों के गांव में – कविवर – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(कविवर श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ के जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित 🌹)

भाई श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ का काव्य संग्रह “सपनों के गांव में” इस समय मेरे सामने है इस संग्रह में संकलित सभी कविताओं की यह विशेषता है कि इन में कृत्रिमता नहीं है और ये सभी कविताएं बिना किसी लाग-लपेट के सीधी सरल भाषा में हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये कविताएं मेरे मन के आंगन में उतर गई हैं।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

श्री संतोष नेमा की यह खासियत है कि वे जितनी खूबी से ईश्वर के विभिन्न रूपों में आस्था अभिव्यक्त करते हैं उतने ही अधिकार से प्रकृति का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार उनकी सिद्ध हस्तता उनके लिखे उन गीतों में मिलती है जब वे मानवता और सद्भाव की बात करते हैं। उदाहरण के लिए उनकी लिखी कविताएं “सपनों के गांव में” तथा “मेरा गांव” ली जा सकती हैं। “सपनों के गांव” शीर्षक कविता में वे कहते हैं –

 नारी जहां पुजती हो, सच्चाई न बिकती हो,

 बने रहें सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

इसी कविता में वे आगे कहते हैं –

दिव्य स्वप्न आंखों में, झरते फूल बातों में,

जीवन के रसमय सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

ऐसा लगता है कि कवि का विश्वास सद्भावना की स्थापना में है। यह उचित भी है। जब भी कोई साहित्यकार स्वस्थ समाज की चर्चा करता है, वह ऐसे समाज की कल्पना करता है जहां सद्भावना हो।

यह वास्तविकता भी है। कोई भी समाज बिना सद्भाव के नहीं रह सकता। उनकी लिखी कविता “मेरा गांव”  में भी यही जरूरत सामने आती है, जब वे कहते हैं –

 सादा जीवन रीत निराली, सच्चाई की पीते प्याली

 रहता सदा यहां सद्भाव, सबसे सुन्दर मेरा गांव।

 भारत के गांवों की यह खासियत है। शहरों में व्याप्त कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर  ग्रामीण परिवेश का परिचय श्री संतोष नेमा कराते हैं जब वे यह कहते हैं –

 छल प्रपंच पाखंड ने घेरा,

 लोभ मोह का सघन अंधेरा

 मन से तृष्णा दूर भगाएं

 अन्तर्मन में ज्योति जलायें।

इस संग्रह में ऐसे विचारों की बहुलता है। कवि का जोर सदैव इस बात पर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति में सद्भाव जगाने की आवश्यकता है। वह मानवता का अग्रदूत बनता है। बिना सद्भाव और मानवता के समाज की कल्पना श्री संतोष नेमा नहीं करते हैं। यह इस संकलन की विशेषता है कि ग्राम्य परिवेश का सुन्दर वर्णन ईश्वर के विभिन्न रूपों और अवतारों के श्रद्धापूर्ण स्मरण के साथ मिलता है। हिन्दू आस्था इस संग्रह में जगह जगह मिलती है। भगवान राम, कृष्ण, दुर्गा की भक्ति की कविताएं हैं लेकिन कवि को अन्य संप्रदायों का ख्याल है। वह दूसरे मतों की चर्चा करते हुए इसके लिए राजनीति को दोषी ठहराता है।

यह सही भी है। हम राजनीति में इस तरह डूब गए हैं कि हमें अपने पास पड़ोस का ख्याल नहीं रहता।

कवि को हमारी इस कमजोरी का ध्यान है। वह कहते हैं-

 सियासत ने हमें बांटा कुछ कदर,

 हिन्दू हिन्द के,

मुसलमान पाकिस्तानी हो गए।

यह इस संकलन की विशेषता है। कवि का यद्यपि अडिग हिन्दू देवी देवताओं पंर विश्वास है और

इसे अभिव्यक्त करने में पीछे नहीं रहता लेकिन उसे अन्य संप्रदायों का भी ध्यान है। यह सर्व धर्म सद्भाव और हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप है। जिन मुसलमानों ने भारत में रहना स्वीकार किया और पाकिस्तान नहीं गए उन्हेंं पाकिस्तानी कहना ग़लत होगा।

इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भाषा और शैली। इसकी भाषा जहां सुबोध है, इसकी शैली बोधगम्य और अकृत्रिम है। कवि बिना किसी बहाने बाजी या लाग लपेट के अपनी भावना रखता है। शब्दाडंबर और अलंकारों का उपयोग कर कविता को बोझिल नहीं बनाया गया है। अमिधा गुणों की खूबसूरती इन कविताओं में है। “एक कहानी हो गये” कविता में जातिवाद पर प्रहार है। पर्यावरणीय वर्णन भी है। ग्रामीण परिवेश का परिचय भी मिलता है जैसा संकलन के नाम से प्रकट होता है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २११ ☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. अनुराग वाजपेयी जी द्वारा लिखित  “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २११ ☆

☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)

(समकालीन विसंगतियों का आईना)

लेखक – डॉ. अनुराग वाजपेयी

प्रकाशक – प्रकाशन, जयपुर

(संस्करण – 2026)

मूल्य-  रु 250/-

☆ समकालीन विसंगतियों का आईना – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

आजादी के बाद से देश ने प्रत्येक क्षेत्र में खूब प्रगति की है।

यदि कुछ ह्रास हुआ है तो वह है नैतिकता , आचरण और जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट स्पष्ट दिखती है।

साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य वह  औजार है जो इन विसंगतियों पर सफलता से प्रहार कर रहा है।

डॉ. अनुराग वाजपेयी उनके पिछले आधा दर्जन व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। उनके द्वारा रचित यह नव प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘ईमान का बोझा’ इसी कसौटी पर खरा उतरने वाला एक प्रभावशाली संग्रह है। यह किताब समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, प्रशासन और आधुनिक जीवनशैली की उन परत-दर-परत विसंगतियों को खोलती है, जिनसे आज का सामान्य नागरिक नित्य जूझ भी रहा है, तथा विडंबना और हास्यास्पद है कि जहां भी जिसे जो अवसर मिल रहा है वह बेइमानी से बाज नहीं आ रहा। बेईमानी नया सामाजिक लोकाचार बनता जा रहा है।

पुस्तक का शीर्षक ‘ईमान का बोझा’ मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। लेखक ने बड़े ही तीखेपन से यह स्थापित किया है कि आज के दौर में ईमानदारी एक भारी पत्थर की तरह है, जिसे ढोना कठिन हो गया है। जो व्यक्ति जितना अधिक ‘हल्का’ (यानी सिद्धांतहीन) है, वह उतनी ही तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। यह आधुनिक भौतिकवादी समाज में कड़वा यथार्थ है।

लेखक ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली, बाबुओं की मानसिकता और भ्रष्टाचार के जो चित्र खींचे हैं, वे यथार्थ के दर्शन करवाते हैं। रिश्वतखोरी के नए तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए लेखक दिखाते हैं कि कैसे समाज में अनैतिकता को अब ‘सभ्यता’ का लबादा ओढ़ा दिया गया है।

कोरोना काल, एवं लॉकडाउन के कुछ व्यंग्य किताब में शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि ये सारे व्यंग्य समय समय पर लिखे हुए हैं, तथा इस पुस्तक में  संकलित हैं।डिजिटल युग के प्रभावों को जिस तरह से पुस्तक में पिरोया गया है, वह पाठकों को वैचारिक मंथन के लिए विवश करता है। ‘छुट्टियों’ के प्रति देश के उत्साह और ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ के नाम पर किए जा रहे छलावे पर लेखक की टिप्पणियां व्यंग्य की शास्त्रीय परंपरा को पुष्ट करती हैं।

व्यंग्य के मूल्यों की कसौटी पर परखें, तो ‘ईमान का बोझा’  समाज को आईना दिखा रहा है। लेखक  केवल हास्य  रंजन करने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं।  वे समाज के प्रति अपनी ‘अकुलाहट’ और चिंता उनकी कलम से व्यक्त करते हैं।

अनुराग वाजपेयी की भाषा सहज है, वाक्य रीडर्स फ्रेंडली हैं। लेकिन उसमें कटाक्ष की धार पैनी है। वे कठिन विषयों को भी रोचक किस्सागोई के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो व्यंग्य अभिव्यक्ति की  बड़ी ताकत है।

पुस्तक केवल समस्याओं को नहीं गिनाती, बल्कि उन कारणों पर भी प्रहार करती है जो व्यक्ति को ‘बेईमान’ बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

‘ईमान का बोझा’ आज के दौर का यथार्थ पाठ है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो व्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं और जो ईमानदारी का बोझ ढोकर भी मुस्कान बनाए रखना चाहते हैं।

डॉ. अनुराग वाजपेयी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि व्यंग्यकार का काम केवल व्यवस्था को कोसना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर छिपे उस जागरूक नागरिक को जगाना है, जो शोर-शराबे में कहीं खो रहा है।

यह संग्रह व्यंग्य साहित्य के प्रेमियों और  अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

किताब खरीद कर पढ़ने की सलाह है। ये 100 पृष्ट एक दस्तावेज हैं। 34 आलेख हैं, सभी एक दूसरे से बेहतर सुगठित ललित साहित्यिक मूल्यों पर खरे हैं।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मानित लेखक, समालोचक, समीक्षक, व्यंगयकार

(लंदन से, ई बुक पढ़कर)

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१० ☆ “परिपाटी (कहानियां)” – लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री जनक कुमारी सिंह बघेल जी द्वारा लिखित  “संपरिपाटी (कहानियां)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१० ☆

☆ “परिपाटी (कहानियां)” – लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : परिपाटी (कहानियां)

लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

समाहित कहानियाँ : 21

☆ समय की संवेदनाओं का दस्तावेज़ : परिपाटी – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(पारिवारिक संबंध, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ और जीवन-मूल्य की कहानियों का संग्रह)

हिन्दी कहानी का वर्तमान परिदृश्य अनेक दिशाओं में विकसित हो रहा है। एक ओर प्रयोगधर्मी लेखन है तो दूसरी ओर जीवन के साधारण अनुभवों से असाधारण अर्थ खोजने वाली पारंपरिक कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं। जनक कुमारी सिंह बघेल का कहानी-संग्रह परिपाटी इसी दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करता है। संग्रह की इक्कीस कहानियाँ किसी बड़े वैचारिक विमर्श का शोर नहीं मचातीं, बल्कि परिवार और समाज के भीतर घटित होने वाले उन सूक्ष्म परिवर्तनों को दर्ज करती हैं, जिनसे आज का मनुष्य प्रतिदिन गुजर रहा है। यही कारण है कि इन कहानियों का संसार पाठक को अपरिचित नहीं लगता। वह स्वयं को इन कहानियों के पात्रों और परिस्थितियों के बीच खड़ा पाता है।

संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय विविधता है। यहाँ बुज़ुर्गों की उपेक्षा है, रिश्तों में आती औपचारिकता है, स्त्री की मौन पीड़ा है, बच्चों का मनोविज्ञान है, सामाजिक रूढ़ियों से टकराती मानवीय संवेदना है और बदलती जीवन-शैली से उत्पन्न अकेलापन भी नजर आता है। लेखिका इन विषयों को किसी आंदोलनकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। उनकी दृष्टि आरोपित नहीं करती वह अनुभवजन्य लेखन है। इसलिए कथाएँ सहज विश्वसनीय बन पड़ी हैं।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘परिपाटी’ की वैचारिक धुरी कही जा सकती है। कहानी उस त्रासद सामाजिक सत्य को उद्घाटित करती है कि परिवारों में बुज़ुर्गों के प्रति अपनाई गई उपेक्षा धीरे धीरे एक परंपरा बनती जा रही है। आज जो व्यवहार हम अपनी पूर्व पीढ़ी के साथ करते हैं, वही कल अगली पीढ़ी हमारे साथ दोहराती है। कहानी का शीर्षक इसी विरासत में मिलती अमानवीयता की ओर संकेत करता है। बिना किसी भाषण या नाटकीयता के यह कहानी पाठक के भीतर यह गहरा नैतिक प्रश्न उठाती है।

‘अनकहे जज़्बात’ संग्रह की भिन्न और स्मरणीय कहानियों में है। इसमें पुस्तकों को मानवीय संवेदनाओं का रूप देकर लेखिका ने अत्यंत मौलिक शिल्प अपनाया है। अलमारी में सजी पुस्तकें  अपने पाठकों की प्रतीक्षा करती,  चेतन पात्र बन जाती हैं। यह कहानी केवल पुस्तकों के उपेक्षित होने की नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति के क्षीण होते जाने की कथा है जो किसी भी समाज की आत्मा होती है। पुस्तक-प्रेमियों के लिए यह कहानी विशेष आत्मीयता और कसक उत्पन्न करती है। प्रयोग नवाचारी है।

अन्य कहानियाँ भी अपने-अपने स्तर पर सामाजिक यथार्थ को विविध आयाम देती हैं। कहीं पुनर्विवाह के प्रश्न के माध्यम से जीवन को दूसरा अवसर देने की बात है, कहीं आत्मग्लानि से उपजे प्रायश्चित का भाव है। कुछ कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि मनुष्य के भीतर करुणा  समाप्त नहीं हुई है, तो कुछ कथानक आधुनिक जीवन की विडंबनाओं को उजागर करते हैं ,जहाँ सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर आत्मीयता सिकुड़ती चली गई है।

रिश्तों की ऊष्मा, विश्वास, संवाद और नैतिक उत्तरदायित्व इन कहानियों में बार-बार लौटने वाले मूल्य हैं।

भाषा की दृष्टि से लेखिका का लेखन सरल, संप्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण है। वे अनावश्यक अलंकरण या भाषिक चमत्कार से बचती हैं। उनकी कलम में सहज भाव संप्रेषण की कला है, वे सामर्थ्यवान लेखिका हैं।संवाद पात्रों के स्वभाव के अनुरूप हैं और कथानक बिना कृत्रिमता  के आगे बढ़ते हैं। यह सादगी ही उनकी शक्ति है, क्योंकि पाठक का ध्यान भाषा की सजावट पर नहीं, कथा के भाव पर केंद्रित रहता है। कहीं-कहीं भावुकता का पुट अवश्य मिलता है, किंतु वह कथ्य की संवेदनात्मक प्रकृति से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है।

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो संग्रह की कुछ कहानियाँ अपने अंत को और अधिक खुला तथा बहुअर्थी बन सकती थीं। कई स्थानों पर आदर्शवादी समाधान यथार्थ की जटिलताओं को अपेक्षाकृत सरल बना देते हैं। फिर भी यह कमी संग्रह की मूल संवेदनात्मक शक्ति को कम नहीं करती। इन कहानियों का उद्देश्य पाठक को चमत्कृत करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सोई हुई मानवीय संवेदना को स्पर्श करना है, और इस उद्देश्य में वे पर्याप्त सफल हैं।

आज जब साहित्य का बड़ा हिस्सा बाज़ार, उपभोक्तावाद और तात्कालिक सनसनी के दबावों से जूझ रहा है, किसी न किसी “वाद” का लबादा ओढ़कर प्रस्तुत हो रहा है।परिपाटी जैसे कहानी संग्रह यह विश्वास दिलाते हैं कि मनुष्य और उसके संबंध अभी भी हिन्दी कहानी के केंद्र में हैं। यह संग्रह पाठक को अपने परिवार, अपने व्यवहार और अपने सामाजिक दायित्वों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। इसकी यही विशेषता इसे केवल कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि समकालीन सामाजिक जीवन की संवेदनात्मक दस्तावेज़ के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

परिपाटी ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि पढ़ने के बाद देर तक महसूस किया जाता है। रिश्तों की ऊष्मा, मानवीय करुणा और नैतिक चेतना में विश्वास रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए संग्रह की लगभग हर कहानी एक सार्थक और पठनीय कृति है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ मुंबई, बंबई, बॉम्बे (काव्य संग्रह) – कवि : बालासाहेब लबडे – अनुवादक : भारत वेडे ☆ समीक्षक – सुश्री इन्दिरा किसलय☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

 

पुस्तक चर्चा ☆ मुंबई, बंबई, बॉम्बे (काव्य संग्रह) – कविकवि : बालासाहेब लबडे – अनुवादक : भारत वेडे ☆ समीक्षक – सुश्री इन्दिरा किसलय

काव्य संग्रह — मुंबई, बंबई, बॉम्बे

कवि — बालासाहेब लबडे

अनुवादक –भारत वेडे

समीक्षक –इन्दिरा किसलय

प्रकाशक –लिटिल बर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली

मूल्य — रु 399/-

☆ “मुंबई, बंबई, बॉंम्बे” – स्याह रंग की अनसुनी आवाजें इन्दिरा किसलय ☆

 हजार चेहरे मुंबई के, फिर भी बेचेहरा। इसके वजूद की पहचान इतनी आसान भी नहीं। “बालासाहेब लबडे “द्वारा प्रणीत यह कृति, मुंबई की धड़कनों का कोलाज है। इसमें समुद्र का खारापन, जल की नमी है, तो लहरों का संगीत कम, उत्पात ज्यादा सुनाई देता है। एक मोहाविष्ट दर्शक की दृष्टि से परे, कवि ने मुंबई में दिन के बहुरंगी ऐश्वर्य को नहीं, रात की कालिमा में ढँकी कितनी ही अस्फुट, कातर और अनसुनी आवाजों को समेटा है।

अनेक भाषा, धर्म, जाति वर्ग, और विश्वास एवं सियासी ताने बाने से बुना यह महानगर, कवि के शब्दों में “महा मिथक””एक स्वप्न नगरी”, “महामाया” ही है, जो तिलिस्मी है और भयावह भी। कृति में इलिट क्लास का भद्रलोक तो है, लेकिन उस जीवनशैली के पीछे जो अप्रिय सत्य छिपा है, उसका अनावरण किया गया है।

मुंबई से कवि का 40 वर्षों का नाता है। यही कारण है कि उनकी सूक्ष्म ग्राही द्रृष्टि की पकड़ में हर वो दृश्य, व्यक्ति और घटना है, जो अक्सर साहित्यकारों की नज़र से छूट जाता है, इसलिए कि “लोग क्या कहेंगे.”

यह कृति मुंबई पर बनाई गई किसी फिल्म का हिस्सा लगती है. भाषा ने कैमरे का काम किया है।

उपभोक्तावाद, रफ्तार, महत्वाकांक्षा और द्रव्य के पीछे दौड़ने को विवश करती मुंबई समूचे देश को लुभाती है। कवि ने इसे एहसास के तल पर जिया है। जानकारी विस्फोट के दौर में शहर का हर रंग तलाशना बहुत आसान है पर कवि ने उसे आत्मीय और निर्विकल्प सच्चाई के तल पर अनुभव किया है।

एक संतृप्त अभिमान अपने शहर को लेकर कुछ इस तरह व्यक्त हुआ है–

” मुंबई हमारे हक की,

नहीं किसी के बाप की,

जय महाराष्ट्र”

मुंबई के दावेदार इस कविता में वे कहते हैं–

” एकता का बांध कभी बांधती है मुंबई माझी। “

वहां की यांत्रिक जीवन शैली का एक सचल चित्र पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है–

एशिया खंड की सबसे बड़ी फन लैंड–

“संवेदना, गुम हुआ शहर, अधिकाधिक होता जाता है नटखट गो हाई के अंतरंग में।। “

धारावी, एशिया की सबसे बड़ी झोपड़ पट्टी पर पाठकों ने कई बयान सुने होंगे, पर कवि मन के उद्गार कुछ ऐसे हैं–

“मरूस्थल में धारावी की झोंपड़ियां क्यों भूखी,

छलती यह पेटेश्वरी,

 जीवन्तता की एकादशी।। “

नैतिकता की सभी कल्पनाएं, सभी मानदंड यहां रोटी हेतु शरण जाते हैं और कहीं खो जाते हैं। यह विश्व का सबसे अंतिम छोर है, आश्चर्य का स्थान है।

शिवाजी पार्क, लोकल, सी-एस-टी, डांस बार, हफ्ता वसूली, कचरा बीनते बच्चे, चौपाटी, धारापुरी, ऐसे कितने ही शीर्षक हैं, जो मुंबई के विषय में जिग्यासा जगाते हैं।

 एक कविता जिसे कहीं और पढ़ा जाना असंभव है,

” नियर सहारा एयरपोर्ट” घृणा और जुगुप्सा उपजाती है। कभी-कभी उनकी कविता के अंत में सुभाषित भी हासिल होते हैं।

 “समय का चेहरा कभी किसी को पकड़ में आया है क्या?”

**

 “इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता। “

दृश्य समाज की अदृश्य परतों को शब्दशः उधेड़ते हुए, कवि इस बात की गवाही देते हैं कि आत्मीयता सिर्फ रंग, रूप और सौंदर्य की मुखापेक्षी नहीं होती। उनके अनुभव पाठकों के लिए एक सवाल बनकर उपस्थित होते हैं, जिसकी गूँज क्षितिज तक पहुँचती है।

“मीठी नदी” की दुर्दशा भी उन्हें चिंतित करती है।

 इन सर्वथा गद्यात्मक कविताओं के बिंब इतने सघन और गरिष्ठ हैं कि मूल कथ्य तक पहुँचने में कवायद करनी पड़ती है। रूपक, प्रतीक, प्रतिमान, बिंब कहीं भी पारंपरिक नहीं हैं। कविता को मुक्त कर दिया है उन्होंने किसी भी शास्त्रीय बंधन से, जो भावावेग को संभाल न सके।

 कृति अनुवादित है.। अनुवादक हैं  “भारत वेडे”। मूल मराठी में इसका आस्वाद जरा भिन्न ही होगा। कविता का मौलिक अंदाज़ सुरक्षित होगा। हर भाषा का अपना स्वभाव, सरोकार, लय और बरतने का तरीका होता है।

 शहर के गत्यात्मक, चाक्षुष बिंबों को स्थिर शब्दों के हवाले करना आसान नहीं है। मुंबई के सांस्कृतिक स्पंदन से उपजी स्थानीय बोलियां, शब्द, गालियां, पारिभाषिक शब्द सिर्फ मुंबई में ही पाये जा सकते हैं, जिसे कवि ने अचूक दर्ज किया है।

 शहर जब नायक की भूमिका में है, तो उसके आचरण का रेशा-रेशा खुलता ही चला जाता है, हर्फ दर हर्फ। मूल बंबईया शब्दों ने अभिव्यक्ति को प्रामाणिकता दी है। सब कुछ ऑर्गेनिक, कहीं मिलावट नहीं.। कुछ शब्द जैसे सुमड़ी, खोका, राड़ा, मुलुख, टाली, टपोरी, बेवड़ा, तथा कुछ अंग्रेजी के मिश्रित शब्द भी धड़ल्ले से चलते हैं।

 अनैतिकता या महानगरों के यौनिक स्याह चेहरे– जैसे मालिश सेंटर, मेगा ब्लॉक में डान्स बार—इनके पीछे छिपी विवशताएं झाँक रही हैं।

इस विश्व में बिकता नहीं ऐसा कुछ भी नहीं

शाश्वत ऐसा कुछ भी नहीं होता।।”

“प्रॉपर्टी डीलर” शीर्षकवाही कविता में उनकी व्यंजना दृष्टव्य है–

“तो खरीदा जा सकता है जनतंत्र,

केवल ये जनतंत्र के बिल्डर हैं।। “

 जिन्होंने मुंबई की जीवन रेखा की वक्र सरलता नहीं देखी, उसे जिया नहीं, वे पढ़ते ही चौंक जाएंगे। अधिकांशतः अभिव्यक्ति अगम ही रही आएगी।

 कथ्य, भाषा, शिल्प, हर दृष्टि से बेहद अनोखी है यह कृति, इसे अपूर्व ही कहेंगे।

 हिंदी अनुवाद में वर्तनी यदा कदा प्रश्न बन सकती है। अंततः कवि एक द्वन्द्व उपस्थित करते हैं–

कवि अर्थात् हम,

ले सकते हैं क्या बंदूक हाथ में,

क्या बैठ सकते हैं अनशन को

यह कृति हिंदी और मराठी के बीच ऐसा पुल बनाती है, जो हर मौसम, हर आघात के बीच भी अटूट रहेगा। अरब सागर, वैश्विक एवं पहचान, तकनीकी औद्योगिक विकास का लोहा मनवाती हुई मुंबई, अपनी ही सतह के नीचे एक अनाम लोक से अनजान प्रतीत होती है, और वही कवि का उपजीव्य है।

यह साहित्य के इतिहास में साहस का प्रतिमान है। अनुभूति की तीक्ष्णता और अनूठी अनगढ़ शैली इसे साहित्य विश्व में क्रान्तिकारी सिद्ध करती है। लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली का यह अनुवादित शाहकार पाठकों के मन को निश्चय ही आंदोलित करेगा और एक स्थायी स्मृति बनकर हृदय में सुरक्षित रहेगा। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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