श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ सैयाद..”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३९ ☆
☆ # “सैयाद…” # ☆
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चारों तरफ छाई धुंध है
पवन भी बह रहा मंद मंद है
वाटिका में अजीब सी कशमकश है
पराग तो बहुत है लेकिन
भ्रमरों के रास्ते बंद है
खुशबू पर पहरा है
प्रतिबंध गहरा है
खिलने वाली कलियां है
वक्त मिलने के लिए ठहरा है
जालिम सैयाद मंद मंद मुस्काता है
अपने प्रतिबंधों पर गुर्राता है
शायद वह बन गया है खुदा
अपने अहंकार पर इतराता है
वह जो बोले वही सत्य है
वह जो करें वही दुरुस्त है
वह जो चाहे वही होना है
वह अपने अहंकार में मस्त हैं
वाटिका में कालिया मिलने को तरस रही है
भंवरों पर सख्ती बरस रही है
छोटे पशु पक्षी उसके उन्माद के शिकार है
शक्तिशाली जिवो पर उसकी कृपा बरस रही है
वाटिका में अब बेचैनी बढ़ गई है
उसकी हरकतें दिलों में कांटों सी गड़ गई है
धीरे-धीरे सब एक हो रहे हैं
विद्रोह की आग सबके आंखों में चढ़ गई है
यह हवाएं जब तूफान लाएगी
सूखे पेड़ों में चिंगारी जलाएगी
जल जाएगा सैयाद का महल
बस वाटिका में राख रह जाएगी /
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© श्याम खापर्डे
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